समझौता धमाका केस कमज़ोर किया जा रहा है?

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भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली ट्रेन समझौता एक्सप्रेस में नौ साल पहले हुए बम धमाके के दस से अधिक गवाह पिछले कुछ हफ्तों में अपने पहले के बयानों से मुकर गए हैं.

इससे यह संदेह होने लगा है कि कहीं यह केस कमज़ोर तो नहीं हो रहा है.

समझौता एक्सप्रेस में 2007 में बम धमाका हुआ था. इसमें 68 लोग मारे गए थे.

गवाहों के मुकरने का सिलसिला ऐसे समय में शुरू हुआ है जब कथित हिंदू चरमपंथ के एक दूसरे मामले मालेगांव धमाके की सरकारी वकील रहीं रोहिणी सालियां ने यह आरोप लगाया कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अभियुक्तों के प्रति नरम रवैया अपनाने के लिए दबाव डाल रही थी.

समझौता एक्सप्रेस मुकदमे में एनआईए के वकील आरके हांडा ने बीबीसी से कहा, “गवाहों के मुकरने से इस केस पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा.”

उन्होंने कहा, “केस इस तरह का है कि इसमें परिस्थितिजन्य सबूत अधिक महत्वपूर्ण है. हम 137 गवाहों के बयान ले चुके हैं और कुछ बाकी हैं. हमारा केस मजबूत है.”

उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं, “जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है तबसे ये कोशिश की जा रही है कि जिन मामलों में हिंदू चरमपंथी घटनाओं में अभियुक्त हैं, उन मामलों को रफ़ा-दफ़ा किया जाए.”

जांच में दबाव

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Image caption समझौता एक्सप्रेस धमाके के मुख्य अभियुक्त असीमानंद.

हालाँकि वकील आरके हांडा इससे इनकार करते हैं कि इन मामलों में सरकार की ओर से कोई दबाव पड़ रहा है.

वो कहते हैं, “मैंने इससे भी संवेदनशील मामले देखे हैं, लेकिन कभी किसी भी मामले में कोई दबाव नहीं पड़ा है.”

समझौता एक्सप्रेस बम धमाका मामले में स्वामी असीमानंद मुख्य अभियुक्त हैं.

वो पहले ही अपने बयान से मुकर चुके हैं. उन्हें ज़मानत मिली चुकी है.

स्वामी के वकील रणबीर सिंह राठी ने बीबीसी को बताया, “इन सभी को फंसाया गया है. ये राजनीतिक भेदभाव के शिकार हैं. ये अभियुक्त नहीं राजनीतिक आतंकवाद के शिकार हैं. समझौता एक्सप्रेस में धमाके के लिए सिमी और लश्कर-ए-तैयबा ज़िम्मेदार थे.”

राठी भी मानते हैं कि सरकार की तरफ से कोई दबाव नहीं है.

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Image caption पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अगस्त 2014 में असीमानंद को सशर्त ज़मानत दी थी.

उन्हें पूरा विश्वास है कि स्वामी और इस मामले में दूसरे अभियुक्त भी बरी हो जाएंगे.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी गहरी छानबीन के बाद इस केस की तह तक पहुंच सकी थी.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समझौता एक्सप्रेस धमाके के अभियुक्त क़ानून और न्याय की पकड़ से बच निकले तो इससे न केवल एनआईए की ईमानदारी शक के घेरे में आएगी बल्कि एक लोकतंत्र के तौर पर भारत की छवि को भी काफ़ी नुकसान होगा.

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