क्यों है बिहार अब मोदी की रणभूमि?

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पिछले साल आम चुनाव जीतने के बाद केंद्र की सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अगला बड़ा इम्तेहान है बिहार विधानसभा चुनाव.

बिहार में अभी सरकार नीतीश कुमार की है और भाजपा से उनका अलगाव अब पुराना हो गया है.

जनता दल (यूनाइटेड) नेता नीतीश का तो अब लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से एक 'महागठबंधन' भी हो चुका है जिसमें 'गाँठ बांधने' के लिए कांग्रेस भी शामिल हो गई.

कुल 243 सीटों में से 100-100 सीटों पर जदयू-राजद लड़ेंगे और कांग्रेस की झोली में आईं 40 सीटें.

ज़ाहिर है, इनके एकमात्र बड़े विपक्ष में एनडीए है जिसमें 'अंकल सैम' की भूमिका भाजपा को ही निभानी है.

'सत्ता की भूख'

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अक्तूबर-नवंबर में होने वाले चुनावों को भाजपा ने भी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना रखा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और अन्य बड़े भाजपा नेता प्रचार में जुटे हैं और सरकार बनाने का दम भर रहे हैं.

प्रदेश के भाजपा नेता राम कृपाल यादव के अनुसार, जदयू-राजद समझौते का कोई असर नहीं पड़ने वाला.

उन्होंने कहा, "बिहार की जनता इन पर भरोसा नहीं कर रही और इन दलों को भाजपा से भय है. नीतीश जी को सत्ता की भूख है जबकि लालूजी को बच्चों का भविष्य सुनिश्चित करना है. बिहार की जनता दस वर्ष तक नीतीश को झेल चुकी है."

हालांकि राम कृपाल यादव इस सवाल पर असहज हो बैठे कि नीतीश की दस वर्षों की सरकार में सात वर्ष तो भाजपा भी उनकी सहयोगी थी.

हाशिए पर लाने का दावा

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उधर, नीतीश कुमार और लालू यादव ने भी नरेंद्र मोदी की भाजपा की राह में रोड़े डालने की ठान रखी है.

सीटों के बंटवारे का जो भी मतलब निकाला जाए, सच्चाई यही है कि ये दोनों दुश्मन बने दोस्त भाजपा को सत्ता पर क़ाबिज़ नहीं होने देना चाहते.

राजद प्रवक्ता मनोज झा के मुताबिक़ प्रदेश में भाजपा का भविष्य ख़तरे में है.

मनोज झा ने कहा, "ऐतिहासिक मतभेदों को दरकिनार करते हुए राजद, जदयू और कांग्रेस साथ आए हैं. हमारे सामने विकल्प था कि या तो हम अपने मतभेदों में उलझे रहते और या बिहार की जनता के समक्ष एक समावेशी प्रगतिशील गठबंधन का विकल्प रखते. हमने जनता की आवाज़ सुनी है."

जदयू के प्रवक्ता पवन वर्मा का भी मानना है कि ये महागठबंधन इसलिए बना है क्योंकि बिहार में इसकी मांग थी.

लेकिन इस बात का जवाब देने से वो थोड़ा कतराए कि आख़िर लालू और नीतीश कितने दिन कदमताल कर सकेंगे.

उन्होंने कहा, "भाजपा पहले भी इसी बात को उठाती रही है और हमने तो महागठबंधन बनाकर भी दिखा दिया है. अब वो लालू और नीतीश के साथ पर कयास लगा रहे हैं जो महज़ अटकलबाज़ी है."

मोदी की चुनौती

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इसी वर्ष हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में 'मोदी मैजिक' धराशाई हो गया था और बिहार के ज़रिए इसे वापस जगाने की कोशिश में पार्टी लगी हुई है.

दूसरे, राष्ट्रीय राजनीति के स्तर पर भाजपा को बिहार जीतने की लालसा इसलिए भी है, क्योंकि राज्यसभा में पकड़ मज़बूत करने के लिए उसे अगले कई विधानसभा चुनाव जीतने होंगे.

तीसरा ये कि ख़ुद मोदी और नीतीश में दूरियाँ अब इस क़दर बढ़ गई हैं कि मामला एक-दूसरे पर सीधा कटाक्ष करने पर पहुँच चुका है.

मोदी को भी याद ही होगा कि कैसे उनके प्रधानमंत्री पद के दावे का नीतीश ने खुले आम विरोध किया किया था.

ज़ाहिर है ये चुनाव मात्र राजनीति तक नहीं रहने वाले और इसमें भावनाओं के साथ-साथ 'शब्द वापसियां' भी काफ़ी होंगी.

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