'मैं क्यों भारतीय नहीं हूँ?'

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आमफहम नज़रिए में अगर आप भारतीय हैं तो आपका रुझान इन तीन में से कम से कम दो की तरफ होना चाहिए. ये हैं चाय, क्रिकेट और बॉलीवुड.

मुझे इनमें से कुछ भी उत्साहित नहीं करता. अपने चारों तरफ इनके लिए दूसरों की दीवानगी को देखकर मैं खुद को बाहरी शख्स जैसा महसूस करता हूँ.

ढेर सारे दूध और चीनी की मिलावट वाली चाय हिंदुस्तानी ऐसे पीते हैं मानो वो इसे पांच हज़ार साल से पी रहे हों.

लेकिन ये 1830 के दशक की बात है जबकि ब्रिटेन के लोगों ने बंगाल और असम की पहाड़ियों पर चाय की खेती शुरू की.

ये सही है. भारत का सबसे बड़ा टाइम पास चाय गरम चाय औपनिवेशिक दौर का तोहफा है.

मैंने चाय की चुस्कियां लगाते परंपरावादियों के औपनिवेशिक दौर, अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी सभ्यता के खिलाफ लंबे प्रलाप सुने हैं.

चाय पिएंगे?

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मैं जब तक पत्रकार नहीं बना था, तब तक मैंने चाय पीना शुरू नहीं किया था.

मैं जब इंटरव्यू करने लोगों के घर या दफ़्तर जाता तो वो मुझे चाय की पेशकश करते. मेरा जवाब होता जी नहीं, शुक्रिया, मैं चाय नहीं पीता. इस पर वो कहते, "थोड़ी सी? आधा कप?"

"मैं चाय नहीं पीता" क्या लोग इसका मतलब नहीं समझते हैं. अगर मैं इसे दोहराता तो वो अपमानित महसूस करते. उन्हें लगता कि मैं 'उनकी' चाय नहीं पीना चाहता. ठीक है, थोड़ी सी चलेगी.

जल्दी ही मैंने महसूस किया कि चाय के एक प्याले की रस्म के जरिए भाईचारा बढ़ाना पत्रकार के लिए फायदेमंद है.

जब कोई आपसे बात नहीं करना चाहता, आप वहां पहुंचें और बिना झिझक पूछें कि क्या आपको थोड़ी सी चाय मिल सकती है?

ये वो ही पल होता है जबकि आप उस व्यक्ति को शर्मिंदा कर देते हैं, जिसके घर या दफ्तर में आप उसकी मर्जी के बिना दाखिल हुए हैं.

क्या आप मुझे थोड़ी चाय भी नहीं पिलाएंगे? यही वो तरीका था जिसके जरिए गुजरात के पत्रकारों ने नरेंद्र मोदी से अलग हो चुकीं उनकी रहस्यमयी पत्नी को पहली बार बोलने के लिए तैयार किया.

दर्द है क्रिकेट

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चाय मेरे लिए बेमतलब है लेकिन मुझे इसे पीना पड़ता है. जहां तक क्रिकेट की बात है, ये गर्दन और जिस्म के दूसरे हिस्सों के लिए दर्द सरीखा है.

आप एक टेलीविजन स्क्रीन के सामने बैठे हैं और सब्र के साथ घंटों मैच के दिलचस्प बनने और इसके नतीजे का इंतज़ार करते हैं. ऐसे मैचों में शायद ही कभी बराबरी का मुक़ाबला देखने को मिलता है.

जब मैंने (सचिन) तेंदुलकर के रिटायरमेंट के इर्दगिर्द बने उन्माद की आलोचना की तो कुछ लोगों ने मुझे ट्विटर पर अनफॉलो कर दिया.

मैं अपनी अंसवेदनशीलता को स्वीकार करता हूँ और मुझे यकीन है कि आम भारतीय को ये बेवकूफीभरा लगेगा लेकिन कृपया इसे मेरे नजरिए से देखने की कोशिश कीजिए.

आरक्षण मिले

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एक ऐसा शख्स जिसे क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं है, वो यहां एलियन की तरह महसूस करता है. हम जैसे लोग जो क्रिकेट फैन नहीं हैं, उन्हें नौकरियों में आरक्षण मिलना चाहिए.

जब मेरे आसपास की दुनिया भारत-पाकिस्तान का मैच देखते हुए थम सी जाती है, तब मुझे महसूस होता है कि अल्पसंख्यक होने के मायने क्या हैं.

अपने अलग-थलग होने पर ध्यान नहीं दिए जाने से निराश होकर मैं पाकिस्तान को चीयर कर लोगों को उकसाने की कोशिश करता हूँ लेकिन तब भी कोई मुझे तवज्जो नहीं देता.

बॉलीवुड का खुमार

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चाय और क्रिकेट की ही तरह सिनेमा भी इस देश में औपनिवेशिक दौर की देन है. बॉलीवुड के साथ दिक्कत ये है कि उसे आज ज़्यादा ही गंभीरता से लिया जाता है.

2015 के भारत में कश्मीर के अलग होने का मामला उठाना अपेक्षाकृत आसान है लेकिन बॉलीवुड पर उंगली उठाना नहीं.

तहज़ीब पर बॉलीवुड का इस कदर प्रभाव है कि इसकी आलोचना पर लोगों की तीखी नाराजगी झेलनी होगी. आपको नकचढ़ा कहा जाएगा और कहा जाएगा कि आप लोकप्रिय चलन की तारीफ नहीं कर सकते.

मानो बॉलीवुड से ज्यादा प्रचलन में कुछ हो ही नहीं. ठीक है, चेतन भगत भी हैं. लेकिन ठहरिए, वो भी बॉलीवुड के स्क्रिप्ट राइटर बन गए हैं.

दिक्कत फिल्मों से उतनी नहीं है, जितनी मार्केटिंग और हाइप से है. फिल्मों को तो आप आसानी से नज़रअंदाज कर सकते हैं.

प्रचार से पस्त

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बॉलीवुड की एक फिल्म का मार्केटिंग और विज्ञापन का बजट आज करोड़ों में होता है. आलम ये है कि अगर आप जंगल में भी जा बसें तो भी बॉलीवुड की मार्केटिंग से नहीं बच पाएंगे.

बॉलीवुड की किसी आने वाली फिल्म को लेकर ऐसा जबरदस्त प्रचार होता है कि उस फिल्म को नहीं देखने पर आप अलग-थलग महसूस करने लगेंगे.

जैसे कि चाय नहीं पीने और टीवी पर क्रिकेट नहीं देखने पर होता है. पैमाना इस कदर कमजोर है कि फिल्मों के प्रशंसक एक औसत सी फिल्म के भी दीवाने हो जाते हैं और धमकी देने लगते हैं कि अगर उसे भारत की तरफ से ऑस्कर में नहीं भेजा गया तो वो खुदकुशी कर लेंगे.

अब अगर आप मुझसे पूछें कि दक्षिण भारत के बारे में क्या कहेंगे? मैंने अफवाहें सुनी हैं कि दक्षिण भारत के लोग कॉफी पीते हैं, शतरंज खलेते हैं और क्षेत्रीय सिनेमा देखते हैं.

मेरा सीधा सा जवाब होगा कि मैं नहीं जानता कि दक्षिण भारत कहां है.

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