राजद-जद(यू) ने 40 सीटें भाजपा को 'तोहफ़े' में दीं?

लालू यादव और नीतीश कुमार

बिहार विधानसभा के चुनाव के लिए राजद-जद(यू) गठबंधन के सीट बंटवारा फार्मूले से कांग्रेस का ख़ुश और संतुष्ट होना स्वाभाविक है लेकिन शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस इस कदर नाख़ुश है कि वह अपना अलग रास्ता खोज रही है.

उसके लिए गठबंधन में मात्र 3 सीटें छोड़ी गई थीं. फार्मूले के तहत राजद-जद(यू) को चुनाव लड़ने के लिए 100-100 और कांग्रेस को 40 सीटें मिली हैं.

बिहार में स्वयं कांग्रेसी भी 40 सीटों पर लड़ने की अपनी हैसियत नहीं देखते. पिछले विधानसभा चुनाव में उनके महज 4 ही प्रत्याशी जीते थे, जबकि उसने राज्य की सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे. तो क्या राजद-जद (यू) का कांग्रेस के लिए 40 सीटें छोड़ना, इन सीटों को भाजपा की झोली में डालने जैसा है.

राजनीतिक अनुकूलता

कांग्रेस का किसी दल से गठबंधन नहीं था. सवाल उठना स्वाभाविक है, फिर लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे मंझे हुए सियासतदानों ने इस बार अपने गठबंधन के तीसरे घटक कांग्रेस पर इतनी मेहरबानी क्यों की?

सीटों के ऐलान से पहले तीनों पार्टियों के अंदरूनी हलकों में चर्चा थी कि गठबंधन में अपना प्रत्याशी खड़ा करने के लिए कांग्रेस को 25 से 30 सीटें मिलेंगी. पर कांग्रेस 40 सीटें पा गई.

कांग्रेस पर नीतीश-लालू की दरियादिली को लेकर बिहार के सियासी मैदान में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं.

एक अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि 40 में कुछेक सीटों पर राजद-जद (यू) के ऐसे नेता उम्मीदवार बनाये जा सकते हैं, जिन्हें कांग्रेसी चुनाव चिह्न पर लड़ाना राजनीतिक रूप से ज्यादा अनुकूल होगा.

समीकरण

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सामाजिक समीकरण और क्षेत्र-विशेष की स्थिति के मुताबिक़ इस तरह की कुछ सीटों पर फ़ैसला किया जा सकता है. यह कोरी अटकल इसलिए नहीं क्योंकि पिछले दिनों विधान परिषद के चुनाव के दौरान कांग्रेस को लड़ने के लिए तीन सीटें दी गईं.

लेकिन उम्मीदवार गैर-कांग्रेसी पृष्ठभूमि के थे और चुनाव से ठीक पहले वे कांग्रेस में शामिल किए गए. लोकसभा के पिछले चुनाव में गठबंधन के तहत राजद ने कांग्रेस को लड़ने के लिए 12 सीटें छोड़ीं, पर इनमें कुछेक सीटों पर राजद-पृष्ठभूमि से आए लोग कांग्रेस प्रत्याशी बनाए गए.

हालांकि उनमें किसी को कामयाबी नहीं मिली. पार्टी महज दो सीटें- किशनगंज और सुपौल ही जीत सकी. दोनों की जीत निजी प्रभाव और स्थानीय समीकरणों के चलते हुई.

कांग्रेस को अपेक्षाकृत ज्यादा सीटें मिलने के पीछे दूसरा कारण भी हो सकता है.

नज़रअंदाज

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बताया जाता है कि इस बार राहुल गांधी अड़े हुए थे कि बिहार में कांग्रेस को निकट भविष्य में अपना खोया जनाधार वापस लाना है तो गठबंधन के तहत कम से कम 50 सीटों पर लड़ना चाहिए, वर्ना उसे पिछली बार की तरह अकेले ही लड़ना चाहिए.

लेकिन बाद के दिनों में वह कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के इस सुझाव पर सहमत हो गए कि 50 से कुछ कम सीटें मिलें तो भी पार्टी को गठबंधन में जाना चाहिए क्योंकि इस बार बिहार का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है. यहां की जीत-हार का पूरे देश पर असर पड़ेगा.

सीटों के आवंटन के पीछे जो भी सियासी समीकरण हों, लालू-नीतीश ने इस दौरान एक बड़ी ग़लती जरूर की है. वह है-वाम खेमे को पूरी तरह नज़रअंदाज करना.

बिहार में वाम खेमे की तीन पार्टियां चुनाव लड़ती हैं- भाकपा, माकपा और भाकपा(माले). हालांकि बिहार में वाम खेमा अब पहले की तरह प्रभावी नहीं है. पर राज्य के कुछेक इलाकों में भाकपा और माले के अपने आधार बचे हुए हैं.

कांग्रेस को कुछ कम सीटें मिलतीं तो वाम खेमे को भी गठबंधन में मिलाया जा सकता था. जद(यू)-राजद में कुछेक नेता इस आशय का नेतृत्व को सुझाव भी दे रहे थे.

तुष्टीकरण

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भाकपा और माले के समर्थक या मतदाता आमतौर पर मध्य और उत्तर बिहार के गरीब और दलित-पिछड़े वर्ग के लोग ही हैं. जाहिर है, इनके अलग लड़ने से कुछेक सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय होगा और उसका फायदा भाजपा खेमे को मिल सकता है.

भाजपा का मुख्य जनाधार सवर्ण और व्यापारी समुदाय हैं. लेकिन हाल के वर्षों में उसने दलित-पिछड़ों के वोट में भी सेंध लगाई है. ऐसे में दलित-पिछड़ों के वोटों का जितना विभाजन होगा, वह अंततः भाजपा के फ़ायदे में जाएगा.

ज्यादा सीटों के लिए लिए कांग्रेस का तुष्टीकरण गठबंधन के लिए नुक़सानदेह साबित हो तो कोई आश्चर्य नहीं!

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