रक्षा ख़रीद में बिचौलियों को मिलेगी मंजूरी?

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भारत सरकार हथियार और रक्षा उपकरण बनाने वाली कंपनियों को सौदे तय करने के लिए आधिकारिक तौर पर अपना प्रतिनिधि या एजेंट रखने की छूट देने पर विचार कर रही है.

यह छूट दे दी गई तो इस मामले में दशकों से चली आ रही कमी दूर हो जाएगी.

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर रक्षा ख़रीद नीति में कुछ बड़े बदलाव ला रहे हैं. इन बदलावों के तहत रक्षा कंपनियों के प्रतिनिधि अब क़ानूनी रूप से काम कर सकेंगे.

पिछले महीने विशेषज्ञों के 10 सदस्यों के एक पैनल ने रक्षा ख़रीद संबंधी नियमों को अंतिम रूप दिया.

पैनल ने हथियार ख़रीद संबंधी नीति में अहम बदलाव की सिफ़ारिश की है.

इन बदलावों में रक्षा कंपनियों को आधिकारिक रूप से प्रतिनिधि तैनात करने की छूट देना भी शामिल है.

अंदेशा

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पिछले हफ़्ते मनोहर पर्रिकर ने कहा, "कंपनियों को पहले ही अपने प्रतिनिधियों के नामों की घोषणा करनी होगी. उन्हें मिलने वाले कमीशन का इससे कोई संबंध नहीं होगा कि सौदे की बातचीत का अंतिम नतीजा क्या होता है."

हथियारों की ख़रीद-फरोख़्त से जुड़े 'बिचौलियों' को भारत में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता.

इसकी वजह अस्सी के दशक में बोफ़ोर्स सौदे से जुड़ा विवाद है. राजीव गांधी सरकार को इसकी वजह से काफ़ी बदनामी झेलनी पड़ी थी.

तीन दशकों तक रक्षा संबंधी ख़रीद इस मामले से बुरी तरह प्रभावित होते रहे.

यूपीए सरकार ने बेतरतीब ढंग से दर्जन भर कंपनियों को 'ब्लैकलिस्ट' कर दिया था. इस वजह से तीनों सेनाओं के हथियार हासिल करने के विकल्प सीमित हो गए थे.

उदाहरण के लिए, तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने घूस देने और ग़लत तरीके अपनाने के संदेह में साल 2006 से 2013 के बीच चार बड़ी कंपनियों से सामान ख़रीदने पर रोक लगा दी थी.

ये चार कंपनियां सिंगापुर टेक्नोलॉजी काइनेटिक्स (एसटीके), रेनमेटल एअर डिफेंस, इसराइल मिलिट्री इंडस्ट्री और डेनेल हैं.

चार कंपनियां ब्लैकलिस्ट

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एसटीके पर प्रतिबंध की वजह से तोपों को आधुनिक बनाने की 20,000 करोड़ रुपए की प्रक्रिया फिर से शुरू की गई.

इसका नतीजा यह हुआ कि तोपों के आधुनिकीकरण के काम में कम से कम चार साल की देरी हुई.

उसी तरह रेनमेटल पर प्रतिबंध लगाने की वजह से विमान भेदी तोपों के आधुनिकीकरण की योजना को धक्का पहुंचा.

विशेषज्ञों का मानना है कि दोषी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने से बेहतर होता उन पर जुर्माना लगाना और उनसे नुक़सान की भरपाई करवाना.

कंपनियों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा देने से भारत के पास विकल्प सीमित हो गए.

यह साफ़ है कि सिंगापुर, स्विट्ज़रलैंड, इसराइल और दक्षिण अफ़्रीका की इन कंपनियों को काली सूची में डालने के बावजूद भारत में भ्रष्टाचार नहीं रोका जा सका.

फ़रवरी 2013 में यूरोपीय कंपनी अगस्तावेस्टलैंड की 3000 करोड़ से ज़्यादा क़ीमत की 12 वीवीआईपी हेलिकॉप्टर की ख़रीद पर संदेह के बादल छा गए थे.

प्रतिबंध की ताक़त

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इस सौदे में कथित रूप से घूस देने का पता चला था और इसमें कुछ भारतीयों के शामिल होने की आशंका भी थी.

उस समय रक्षा मंत्री ने इस सौदे को ख़ारिज कर दिया और फ़िनमेक्केनिका समूह की दूसरी कंपनियों के साथ व्यापार को रोक दिया.

इससे भारतीय नौसेना की हथियारों की ख़रीद पर बुरा असर पड़ा था.

नई नीति के तहत इन रक्षा कंपनियों को पहले पूरी तरह से ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सकेगा.

अधिकारियों का कहना है कि किसी समूह की एक कंपनी अगर किसी ग़लत काम में शामिल पाई जाती है तो दूसरी कंपनी को व्यापार की इजाज़त दी जा सकती है.

रक्षा मंत्रालय असाधारण मामलों में ही किसी कंपनी पर पूरी तरह से पाबंदी लगाएगा.

सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय कुछ शर्तों के साथ प्रतिबंधित रक्षा कंपनियों को फिर व्यापार करने की इजाज़त दे सकता है.

एजेंटों को क़ानूनी मान्यता देकर रक्षा मंत्रालय पारदर्शिता लाना चाहता है. अभी ये एजेंट गुपचुप काम करते हैं, क्योंकि क़ानूनी स्थिति साफ़ नहीं है.

'बेचने वालों के साथ सहयोग'

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Image caption बोफोर्स सौदे से जुड़े विवाद के कारण राजीव गांधी की सरकार को काफी बदनामी का सामना करना पड़ा था.

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का कहना कि वो व्यवस्था को बदलना चाहते हैं, क्योंकि ये व्यवस्था पुरानी हो चुकी है.

उन्होंने कहा, "हमने ब्रितानी व्यवस्था को अपनाया हुआ है. सरकार में हर शख़्स दूसरों पर शक करता है. संदेह का माहौल बना हुआ है. रक्षा एक ऐसा मसला है जहां कुछ बोलना भी ग़लत समझा जाता था."

उनका मानना है कि माहौल धीरे-धीरे बदला जा रहा है.

उनका कहना है कि वे पहला बदलाव यह करना चाहते हैं कि हथियार बेचने वालों के साथ सहयोगी की तरह व्यवहार किया जाए.

उन्होंने कहा, "शक़ का माहौल कम से कम उन कंपनियों के लिए ख़त्म होना चाहिए जिनके साथ पहले कभी सौदा हो चुका है."

ज़ाहिर है, पर्रिकर भारत के पुराने पड़ चुके सिस्टम से वाकिफ़ हैं. चुनौती यह होगी कि वो इन बदलावों को जल्दी से जल्दी लागू करवा सकें.

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