'जज भी दबाव और प्रभाव से मुक्त नहीं'

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हाल की कुछ घटनाओं ने भारत की दंड न्याय व्यवस्था को लेकर ऐसे सवाल खड़े किए हैं जिन पर विचार करना ज़रूरी है.

इस व्यवस्था में तीन अलग-अलग संस्थाएं शामिल हैं - जांच संस्थाएं, अभियोजन और अदालतें.

अदालतों को मुक़दमों में सबूत, क़ानून और न्यायशास्त्र के आधार पर फ़ैसला करना होता है.

जांच करने वाली संस्थाएं अपने तरीक़ों से सबूत जमा करती हैं और ये तरीक़े हमारे लिए रहस्मयी हैं.

अभियोजन जिनता संभव हो, उतना निष्पक्ष तरीके से अपने केस को पेश कर अदालत की मदद करता है.

लेकिन जांच एजेंसियां सबूत जमा करने के काम में कितनी सजग, ईमानदार, सावधान और निष्पक्ष होती हैं?

क्या वे सही हैं, या दबाव के तहत काम करती हैं? क्या वे भ्रष्ट हैं, पक्षपातपूर्ण हैं, पूर्वाग्रही हैं या प्रभावित होने वाली हैं?

इन सवालों के जवाब से ही जमा किए गए सबूतों की सच्चाई, सटीकता और विश्वसनीयता तय होगी.

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दूसरा चरण, इन सबूतों को अदालत में पेश किया जाना है. अभियोजन पक्ष कितनी ईमानदारी से अपना काम करता है?

अभियोजक को लेकर भी यही सवाल उठाए जा सकते हैं जो सबूत जमा करने वाली एजेंसी के मामले में किए गए हैं.

क्या वह भ्रष्ट है, क्या वह दबाव या लोकप्रियता के आगे झुक जाता है? क्या वह सबूतों में फेरबदल करता है, गवाहों को धमकाता है या धौंस देता है?

अभियोजक के लिए तैयार आचार संहिता उसे बताती है कि उसकी ज़िम्मेदारी वृहद समाज के प्रति बनती है, न कि सरकार या अभियोजन पक्ष के प्रति.

यह उसका काम नहीं है कि वह सबूतों को दबाकर या गढ़कर हर हाल में किसी को दोषी साबित कराए.

अगर कोई विश्वसनीय सबूत नहीं हैं या उसे यक़ीन है कि अभियुक्त व्यक्ति दोषी नहीं है तो यह उसका कर्तव्य बनता है कि वह इस बारे में अदालत को सूचित करे और उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा न लड़े.

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यह उसकी समाज के प्रति न्यूनतम नैतिक और पेशेवर ज़िम्मेदारी है.

क्या अभियोजक इस मूलभूत नैतिक वचन का पालन करते हैं?

उनमें से ज़्यादातर लोग अपनी तरक्क़ी को उन लोगों की संख्या से आंकते हैं जिनको उन्होंने दोषी क़रार दिलाया, भले ही इसके लिए उन्हें कोई भी तरीका अपनाना पड़ा हो.

न्यायाधीश

इसमें कोई संदेह नहीं कि जज भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं. आख़िरकार वह भी इंसान हैं और इंसानी कमज़ोरियों, विफलताओं और प्रभाव के शिकार हो सकते हैं.

लेकिन उन्हें इस बात का प्रशिक्षण दिया जाता है कि वह न्याय करते समय अपने सारी निजी धारणाएं हटा दें और सख़्ती से सबूत को जमा करने और परखने के नियमों, क़ानून और इसके तत्वों और बाध्यकारी मिसालों का पालन करें.

अदालतों के फैसलों पर अपील करने और उनकी समीक्षा की अर्ज़ी देने का रास्ते हमेशा खुले रहते हैं.

सबसे ऊंची अदालतों के फैसलों की भी समीक्षा की जा सकती है. इस तरह न्यायपालिका में आंतरिक जवाबदेही है.

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अदालतों को अपने सामने रखे गए सबूतों के आधार पर निर्णय करना होता है. अगर सबूत सही नहीं हैं, पर्याप्त नहीं हैं या उनसे छेड़छाड़ की गई है और फिर न्याय नहीं हो पाता तो इसके लिए अदालतों को दोष नहीं दिया जा सकता.

ऐसे में ग़लती जांच या अभियोजन संस्था की है.

आम आदमी को इस पूरी प्रक्रिया की जटिलता का पता नहीं होता, इसलिए वो अक्सर न्याय न मिल पाने की स्थिति में न्यायपालिका को दोषी ठहराता है.

इसका अर्थ यह नहीं कि जज उन मुक़दमों के निर्णयों पर अपना कोई प्रभाव नहीं डालते, जिनका वह फ़ैसला करते हैं.

मुक़दमे को लेकर उनका नज़रिया और प्रवृत्ति उनकी समाज के प्रति सोच से तय होती है.

यह मानना अव्यवहारिक होगा कि जजों के निजी पूर्वाग्रह और झुकाव उनके फैसलों को प्रभावित नहीं करते होंगे.

इसके अलावा सभी जज दबाव और प्रभाव से मुक्त नहीं होते.

उसी समाज में रहते हुए और उसी सामाजिक माहौल का हिस्सा होते हुए उनसे ये उम्मीद नहीं की जा सकती है कि उन पर इसका कोई असर नहीं होगा.

इसीलिए हम एक जैसे तथ्यों और कानूनी पहलुओं के साथ अलग-अलग फ़ैसले देखते हैं.

उम्रकैद क्यों नहीं

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मृत्युदंड जैसी कड़ी सज़ाओं को ख़त्म करने के तर्क मुख्यतः मानवीय भूल के इन्हीं कारकों की संभावना से निकलते हैं.

इस तरह मौत की सज़ा पर प्रश्न उठ खड़ा होता है. यह प्रश्न भी अक्सर पूछा जाता है कि जब हम ज़िंदगी दे नहीं सकते तो उसे छीनने का हक़ हमें कहां से मिलता है?

हर अपराध अलग होता है. जिन परिस्थितियों में यह हुआ, इसके पीछे का उद्देश्य, इसे करने की उत्तेजना, हमलावर और पीड़ित का चरित्र, उनके जीवन की अवस्था, अपराध की प्रवृत्ति और वजह, यह तात्कालिक था या योजनाबद्ध था, ये बातें हर अपराध के मामले में अलग-अलग होती हैं.

इसीलिए चाहे सज़ा जो भी दी जाए, अपराध रुकते नहीं हैं. इसलिए हम क्यों न उम्रकैद को अंतिम और निर्णायक सज़ा मान लें?

इस प्रश्न का उत्तर तलाशते समय हमें सामूहिक उन्माद पर ध्यान दिए बिना शांत और निश्चल तरीके से विचार करना चाहिए.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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