कैसे किया जाता है लाई डिटेक्टर टेस्ट

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Image caption कथित पाकिस्तानी चरमपंथी मोहम्मद नोमान उर्फ नावेद.

कश्मीर में हाल ही में एक चरमपंथी नावेद को लोगों ने पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया था.

नावेद को पाकिस्तान का रहने वाला बताया जा रहा है. मंगलवार को नावेद को लाई डिटेक्टर टेस्ट के लिए दिल्ली लाया गया.

जांच एजेंसियां नावेद से चरमपंथी हमले को लेकर पुख्ता सबूत पाने की कोशिश कर रही हैं.

लेकिन क्या इस तरह से जो सूचनाएं मिलती हैं, उनकी कोई क़ानूनी मान्यता होती है?

बीबीसी से खास बातचीत में ट्रुथ लैब्स के संस्थापक चेयरमैन केपीसी गांधी कहते हैं कि अगर अनुभवी विशेषज्ञ इस टेस्ट को करें तो इससे मिली जानकारी कोर्ट में भी मान्य होती है.

पॉलीग्राफ़ और नार्को टेस्ट

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पॉलीग्राफ़िक टेस्ट झूठ पकड़ने वाली तकनीक है जिसमें आदमी की बातचीत के कई ग्राफ़ एक साथ बनते हैं और इससे हर संभावित झूठ को पकड़ने की कोशिश की जाती है.

दूसरा तरीक़ा होता है ट्रुथ सीरम या नार्को टेस्ट का इस्तेमाल. इसमें उस आदमी को एक दवा (जैसे सोडियम पेंटाथॉल) दी जाती है.

इससे अभियुक्त बेहोशी की हालत में बात करता है और सच बातें उगल देता है.

इस दूसरे तरीक़े को भारत में कभी कभी इस्तेमाल किया जाता है, हालांकि भारत में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है और अन्य किसी दूसरे देश में इसकी इजाज़त नहीं है.

लेकिन दुनिया के क़रीब डेढ़ सौ देशों में पॉलीग्राफ़ टेस्ट अभी भी चलन में है, क्योंकि यह सौ साल पुराना भरोसेमंद टेस्ट है.

इस टेस्ट को विशेषज्ञ करते हैं और वही नतीजों का विश्लेषण करते हैं.

लेकिन ये कैसे पता चलता है कि जिस इंसान की जांच हो रही है वो सच बोल रहा है या झूठ.

चंद सवाल

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असल में जिस इंसान पर टेस्ट होना है उसकी धड़कन, सांस और रक्तचाप के उतार चढ़ाव को ग्राफ़ के रूप में दर्ज किया जाता है.

शुरू में नाम, उम्र और पता पूछा जाता है और इसके बाद अचानक उस विशेष दिन की घटना के बारे में पूछ लिया जाता है.

इस अचानक सवाल से उस इंसान पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ता है और ग्राफ़ में बदलाव दिखता है.

अगर बदलाव नहीं आता है तो इसका मतलब है कि वो सच बोल रहा है.

इस तरह से उस व्यक्ति से 11 सवाल पूछे जाते हैं जिनमें चार या पांच उस घटना से संबंधित होते हैं.

जिन जिन सवालों पर ग्राफ़ में बदलाव आता है, उसका विशेषज्ञ विश्लेषण करते हैं.

लेकिन अगर इसमें विशेषज्ञता नहीं है तो इससे ग़लत नतीजे भी निकल सकते हैं.

इसीलिए अनुभवी विशेषज्ञों द्वारा ही इसे कराया जाना चाहिए. अगर किसी खास घटना के बारे में कोई सबूत है और पॉलीग्राफ़ी टेस्ट में झूठ बोला गया है तो वहीं उसका झूठ पकड़ा जाता है. और इसे कोर्ट में मान भी लिया जाता है.

निर्दोष साबित

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हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने एक मर्डर के मामले को पॉलीग्राफ़ी टेस्ट के लिए भेजा. पुलिस ने एक व्यक्ति को संदेह के आधार पर जेल भेज दिया.

लेकिन उस आदमी ने अपील की कि वो निर्दोष है और चाहे तो उसका पॉलीग्राफ़ी टेस्ट भी कराया जा सकता है.

उस व्यक्ति की जांच हुई और पाया गया कि वो निर्दोष है. एक महीने के बाद जिसने असल में हत्या की थी उसने अपना अपराध कबूल कर लिया.

हालांकि इसके अलावा भी झूठ पकड़ने की जांच की जाती है जैसे ब्रेन मैपिंग लेकिन ये सब बहुत भरोसेमंद जांच नहीं है.

इस तरह की अन्य जांच विधियां वैज्ञानिक रूप से बहुत सटीक नहीं पाई गई हैं इसलिए इन पर प्रतिबंध लगा हुआ है.

(केपीसी गांधी से बीबीसी संवाददाता अनुराग शर्मा की बातचीत के आधार पर)

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