बसपा की ओर तेज़ी से गोलबंद होते दलित

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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोक सभा सीटों में से 73 सीटों पर भाजपा गठबंधन को विजय मिली थी.

राजनीतिक विश्लेषकों ने इस विजय की व्याख्या करते हुए यह पाया था कि इसमें उत्तर प्रदेश में दलित मतों का भाजपा के पक्ष में झुकाव भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा है.

हालांकि इस पर राजनीतिक विश्लेषकों के मध्य दो खेमे बन गए थे. एक खेमे का मानना था कि दलित मत अब भी मायावती के पक्ष में गोलबंद हैं. हुआ सिर्फ यह है कि इस गोलबंदी का कसाव थोड़ा ढीला हुआ है.

वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का दूसरा वर्ग अपने आंकड़ों के खेल से यह साबित करने में जुटा हुआ था कि दलित मत भाजपा की ओर अच्छी संख्या में झुका हुआ है.

मायावती की चुप्पी

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उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की नेता मायावती 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न पाने के बावजूद भी यह मानने के लिए तैयार नहीं थी कि दलित मत भाजपा की ओर गए हैं.

मायावती ने इस विषय पर अनेकों बार चुप्पी ही साधे ही रही न ज्यादा बोला, न ज्यादा इसकी व्याख्या की.

इधर दलितों के मध्य, मीडिया में और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी यह राय बनने लगी है कि दलितों की गोलबंदी फिर से मायावती और बसपा के पक्ष में मजबूत हो रही है.

इसका एक महत्वपूर्ण कारण उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का दलितों के प्रति रवैया माना जा रहा है.

यूं तो समाजवादी पार्टी के शासन में कानून-व्यवस्था की स्थिति सामान्यतः सबके लिए खराब है, किंतु दलितों के प्रति अधिपत्यशाही समूहों का अन्याय बढ़ा है, साथ ही राज्य दलित कल्याण के मुद्दे पर या तो उदासीन है या ऐसी नीतियां लागू कर रही है, जिन्हें दलित हितों के ख़िलाफ़ माना जा रहा है.

प्रमोशन में कोटा

अभी हाल ही में समाजवादी पार्टी सरकार ने राज्य सरकार की नौकरी में प्रमोशन में एससी-एसटी कर्मचारियों के लिए नौकरी में निर्धारित किए गए कोटा को समाप्त करने का निर्णय लिया है.

साथ ही राज्य सरकार ने अपने एक ऑफिस आर्डर के तहत नौकरी में प्रोन्नत किए गए एससी-एसटी कर्मचारियों को पदावनत(डिमोशन) करने का निर्णय लिया है.

इस आदेश से लगभग 2 लाख एससी-एसटी कर्मचारियों को पदावनत होने का ख़तरा सामने है.

उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग ने इस ऑफिस आर्डर को ध्यान में रख पूर्व में प्रोन्नत किए गए एससी/एसटी कर्मचारियों को पदावनत करने का आदेश दे दिया है.

दलित समाज में समाजवादी पार्टी सरकार के इस पहल का काफी विरोध हो रहा है. दलितों में वर्तमान सरकार के प्रति गुस्सा और नाराजगी बढ़ रही है.

ज़मीन की बिक्री-ख़रीद का मुद्दा

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दलितों के प्रति बढ़ती असुरक्षा उन्हें फिर बसपा और मायावती के पक्ष में तेजी से गोलबंद कर रही है. मायावती स्वयं भी इस राजनीतिक अवसर का लाभ लेने में पीछे नही रहना चाहतीं.

समाजवादी पार्टी सरकार का एक और निर्णय दलितों के हितचिंतकों को रास नहीं आ रहा है. ख़ुद दलितों में भी एक बड़ी संख्या इस निर्णय से खफा है.

असल में समाजवादी पार्टी सरकार ने हाल ही में दलितों की भूमि खरीद और विक्रय संबंधी क़ानून में एक बड़ा परिवर्तन किया है.

1950 का भूमि कानून गैर दलितों द्वारा दलितों की भूमि के खरीद की इजाज़त तो देता था, किंतु 1.26 हेक्टेयर से ज्यादा होने वाली भूमि ही खरीदी या बेची जा सकती थी.

दलितों की भूमि 1.26 हेक्टेयर से कम होने पर किसी दलित को ही बेची जा सकती थी, पर वह भी जिला प्रशासन द्वारा कड़ी छानबीन के बाद ही.

तेज़ होती गोलबंदी

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समाजवादी पार्टी सरकार ने अपने हालिया कैबिनेट फ़ैसले में दलितों के भूमि विक्रय संबंधी इस रक्षा कवच को हटाकर लिया है कि अगर किसी दलित के पास न्यूनतम 1.26 हेक्टेयर भूमि भी है तो वह भी खरीदी और बेची जा सकती है. कोई गैर-दलित भी उसे ख़रीद सकता है.

इस नियम परिवर्तन के कारण भूमि माफियाओं का उत्साह बढ़ा है तो दूसरी ओर दलितों में असहायता बढ़ी है.

समाजवादी पार्टी के इन दो फैसलों ने दलितों में असुरक्षा बोध विकसित किया है. इस असुरक्षा बोध ने उन्हें फिर बसपा की ओर तेज़ी से गोलबंद किया है.

भूमि कानून परिवर्तन संबंधी इस निर्णय से कुछ दलित अपनी जमीन किसी को भी बेचने की छूट में लाभ भी देख रहे हैं, पर इनकी संख्या कम है. ज्यादातर दलित इस निर्णय से असहमत ही हैं.

बसपा सुप्रीमो मायावती ने इन दोनों निर्णयों की आलोचना तो की है, पर वे इस राजनीतिक अवसर को आंदोलन का रूप देने के लिए आगे नहीं आई हैं.

परिवर्तन का खेल

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दलित तबका, दलित मतदाता, स्वयं मायावती की ओर बढ़ रहा है और चाह रहा है कि मायावती सत्ता में आएं ताकि इन दोनों दलित विरोधी निर्णयों को बदला जा सके.

जब दलितों के एक वर्ग को उनसे अलग होने की चर्चा थी, तब भी मायावती इस मुद्दे पर कम बोलती थीं और आज भी जब दलितों को उनके पक्ष में तीव्र हुई गोलबंदी की चर्चा है, कम ही बोल रही हैं. वे राजनीतिक अवसर के इस परिवर्तन के खेल को देख रही हैं.

2017 का रंगमंच सज रहा है, नया राजनीतिक समीकरण विकसित होने लगा है, यह देखना रोचक होगा कि आगे और क्या क्या होता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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