भारत फिर चरमपंथ की आग में झुलस सकता है?

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पिछले कुछ महीनों से भारत में चरमपंथी हमलों में साफ़ बढ़ोतरी दिख रही है.

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर राज्य की कश्मीर घाटी तक सीमित रहने वाले चरमपंथी हमले अब जम्मू इलाक़े तक पहुंच चुके हैं.

इसके अलावा पंजाब के गुरदासपुर ज़िले में हुआ चरमपंथी हमला भी भारत के लिए चिंता का सबब है.

अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या ये हमले भारत में चरमपंथ की आग भड़कने के संकेत हैं?

ऐसे में, दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की रविवार को होने वाली बैठक ख़ासी अहम है जिसमें चरमपंथ पर मुख्य तौर पर चर्चा होनी है.

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ज़्यादातर हमलों के तार पर पाकिस्तान से जुड़े हैं. पाकिस्तान की सरकारी संस्थाओं और गैर-सरकारी तत्वों पर इन चरमपंथी हमलो के आरोप लगते रहे हैं. इनमें बढ़ोतरी और विस्तार ने भारत में ख़तरे की घंटी बजा दी है.

भारत में चरमपंथ की पहली लहर 1980 में आई थी. पहले पंजाब, उसके बाद जम्मू-कश्मीर इसकी आग में झुलसे थे, जिस पर 2005-06 में जाकर क़ाबू पाया जा सका था.

ऐसे में, अगर भारत चरमपंथ की दूसरी लहर की चपेट में आने के कगार पर है, तो यह ख़तरकनाक संकेत है.

भारत और पाकिस्तान के संबंध साल 2013 में नवाज़ शरीफ़ की सरकार बनने के समय से ही ख़राब होते नज़र आ रहे हैं.

आश्चर्य तो इस बात पर है कि नवाज़ शरीफ़ की विदेश नीति की प्रथामिकता भारत और अफ़ग़ानिस्तान से रिश्ते सुधारने की होने के बावूजद ऐसा हो रहा है.

लेकिन सच तो यह है कि नवाज़ शरीफ़ ने बयानबाज़ी से बाहर निकल कोई ठोस पहल नहीं की, जिससे यह लगे कि वे सचमुच भारत से रिश्ते सुधारना चाहते हैं.

इसके उलट, नवाज़ शरीफ़ वह हर कोशिश कर रहे हैं, जिससे कश्मीर मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में लाया जा सके.

वे कश्मीर मुद्दे को न सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा रहे हैं, बल्कि पश्चिमी देशों में शांत पड़ी कश्मीर लॉबी को भी तेज़ कर रहे हैं.

कौन ज़िम्मेदार

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अगर नवाज़ शरीफ़ वाकई भारत से संबंध सुधारना चाहते तो उन्हें पता होता कि वे जिस तरह कश्मीर मुद्दे को उठा रहे हैं, उसे भारत में बिल्कुल भी पसंद नहीं किया जाएगा.

एक तरह से नवाज़ शरीफ़ ने हर उस कोशिश को पीछे धकेल दिया है जो उनके पहले जनरल परेवज़ मुशर्रफ़ और आसिफ़ ज़रदारी ने कश्मीर मुद्दे को ठंडा करने में की थीं.

इन कोशिशों की वजह से ही भारत के साथ संबंध कुछ बेहतर हुए थे.

भारत और पाकिस्तान के लगातार ख़राब होते रिश्तों की ज़िम्मेदारी नवाज़ शरीफ़ से हटा कर पूरी तरह पाकिस्तानी सेना पर डाल देना आसान है.

लेकिन सच यह है कि रिश्ते सुधारने की कोशिशों को सेना पीछे धकेले, उससे पहले ही नवाज़ शरीफ़ ने कश्मीर मुद्दे पर हमलावर रुख अख़्तियार कर लिया था.

पाकिस्तानी सेना के संबंध नवाज़ शरीफ़ से बेहतर होने के बाद कश्मीर मुद्दे पर स्थितियां फिर ख़राब होने लगीं.

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शरीफ़ ने पहले की तरह ही बढ़ा-चढ़ाकर बातें करते हुए कश्मीर को पाकिस्तान की गर्दन बताया. बयानबाज़ी के अलावा जम्मू-कश्मीर में अतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर लगातार युद्धविराम के उल्लंघन में भी दिखे.

'इकलौता हथियार'

ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी सेना ने यह निष्कर्ष निकाला था कि कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन फिर से तेज़ करने के ज़रूरत है, क्योंकि भारत के ख़िलाफ़ उनके पास यही एक हथियार है.

इसके अलावा खालिस्तानी आंदोलन को फिर ज़िंदा करने की भी सोची समझी कोशिश की जा रही थी. पिछले क़रीब एक साल में पश्चिमी देशों में खालिस्तानी तत्व एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं.

पाकिस्तान के लिहाज़ से यह बहुत अच्छा मौक़ा था क्योंकि अमरीकी सेना अफ़ग़ानिस्तान से वापस जा रही थीं और उस पर चरमपंथ पर लगाम लगाने का अमरीकी दबाव भी कम हो गया था.

दूसरी तरफ़ अफ़ग़ानिस्तान में नए राष्ट्रपति पाकिस्तान की ही राह पर चलने को तैयार हैं और चीन पाकिस्तान की मदद के लिए पैसा लगाने को तैयार है.

बदला हुआ भारत

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चरमपंथ में हाल ही में हुई बढ़ोतरी को इसी घटनाक्रम के संदर्भ में देखना चाहिए.

लेकिन अगर पाकिस्तान को लगता है कि 1980 और 90 की तर्ज पर वह कश्मीर और पंजाब में आग भड़का सकेगा, तो उसे इस पर फिर से सोचना होगा.

उस समय से अब तक बहुत कुछ बदल चुका है, जब भारत पंजाब और कश्मीर को लेकर आंखें मूंदे था.

पिछले दो दशकों में भारतीय सुरक्षा बलों ने दोनों सीमांत प्रदेशों में ऐसा कारगर सुरक्षा तंत्र तैयार कर लिया है, जो हालात को पहले की तरह नियंत्रण से बाहर नहीं होने देगा.

सुरक्षा तंत्र में दरार पाकर चरमपंथी अब भी कुछ हमले कर सकते हैं. लेकिन कुछ लोगों को मारने और कुछ समय तक समाचार में रहने के अलावा इन हमलों से कुछ और हासिल नहीं हो सकेगा.

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इसका अर्थ यह नहीं है कि पाकिस्तान हिंसा को बढ़ावा देने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने तरीके से मामले को बढ़ाने की कोशिश नहीं करेगा.

लेकिन इसकी संभावना कम ही है कि पाकिस्तान को इस बार पहले की तरह ही बढ़त हासिल होगी. भारत एक बदला हुआ देश है. अब यह 1990-91 की लाचार, असरहीन अर्थव्यवस्था नहीं रह गया है.

दूसरी ओर, सभी तरह के चरमपंथियों से नज़दीकी रश्तों की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की छवि ख़राब हुई है.

नई चुनौती

भारत अगर चरमपंथी हमलों को लेकर उदासीन बना रहता है, तो यह उसे महंगा पड़ेगा.

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चरमपंथियों के इरादों को नाकाम करने के लिए सुरक्षा तंत्र को मज़बूत करने और सुरक्षा बलों को पहले से बेहतर सुविधाओं से लैस करने की ज़रूरत है.

इसके अलावा ख़ुफ़िया विभाग को पहले ही संभावित हमलों के बारे में आगाह करने की और चरमपंथी गुटों को ठिकाने लगाने की ज़रूरत है.

इसके साथ ही यह भी समझने की ज़रूरत है कि पाकिस्तान-प्रायोजित चरपमंथ पूरी समस्या का सिर्फ़ एक पहलू है.

कश्मीर में एक नया और ख़तरनाक चलन दिख रहा है कि युवा कश्मीरी खुद ही कट्टरपंथी बन रहे हैं. वे अंतरराष्ट्रीय जिहादी अभियानों और संगठनों, ख़ासकर ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले गुट, की तरफ़ आकर्षित हो रहे हैं.

इस चलन को पाकिस्तान-प्रायोजित चरमपंथ के साथ मिलाना घातक होगा, हालांकि दोनों में कुछ बातें समान हैं.

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भारत को इस नए चरमपंथ को जड़ें जमाने से रोकने के लिए एक व्यवस्था कायम करनी होगी. इस चरमपंथ के बड़ा होने की आशंकाएं हैं, भले ही यह 1990 में कश्मीर में फैलने वाले चरमपंथ की तरह ख़तरनाक न हो.

यदि चरमपंथ 2.0 को रोकना है तो कश्मीर में पनप रहे चरमपंथी रुझान को रोकना वहां पाकिस्तान-प्रायोजित चरमपंथ को रोकने से ज्यादा चुनौती भरा होगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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