'तलाक़, तलाक़, तलाक़' के विरूद्ध मुस्लिम औरतें

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महिलाओं की एक ग़ैर-सरकारी संस्था ने मुस्लिम महिलाओं के बीच किए गए एक सर्वे में पाया है कि 90 फ़ीसदी से ज़्यादा महिलाएं 'ज़ुबानी तलाक़़' पर बैन चाहती हैं.

ज़ुबानी तलाक़ यानि तीन बार लगातार तलाक़ शब्द कहकर शादी ख़त्म कर देना. लंबे समय से भारत के मुस्लिम समुदाय में तलाक़़ के लिए इस तरीक़े का इस्तेमाल किया गया है.

पर सर्वे में 88 फ़ीसदी महिलाओं ने तलाक़ के लिए 'तलाक़-ए-अहसन' का रास्ता सही बताया. तलाक़-ए-अहसन में एक बार तलाक़ की मंशा ज़ाहिर करने पर पति और पत्नी को कम-से-कम तीन महीने तक तलाक़ के बारे में सोचने और सुलह का रास्ता निकालने का समय दिया जाता है.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन का ये सर्वे भारत के 10 राज्यों में 4,700 से ज़्यादा महिलाओं से बातचीत पर आधारित है.

संस्था की संस्थापक नूर सफिया नियाज़ ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “क़ुरान में एकदम ऐसे कहकर तलाक़़ देने के बारे में कुछ लिखा ही नहीं है, बल्कि तलाक़-ए-अहसन को ही तलाक़ का तरीका बताया गया है, लेकिन आम लोगों को इसकी जानकारी नहीं है.”

भारत में कई धर्म के लोगों को शादी, तलाक़ और परिवार से संबंधित जैसे मामलों में अपने धर्म के क़ानून और रीति रिवाजों को मानने की आज़ादी है.

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ग़रीबी और घरेलू हिंसा

महिला आंदोलन के ज़रिये किया गया सर्वे ज़्यादातर ग़रीब तबके की महिलाओं से बातचीत पर आधारित है. इनमें से ज़्यादातर महिलाएं घरेलू हैं और काम के लिए नौकरी या व्यापार नहीं करती हैं.

इनमें से क़रीब 50 फ़ीसदी की शादी 18 साल की उम्र से पहले कर दी गई और क़रीब 50 फ़ीसदी ने घरेलू हिंसा का सामना किया है.

नूर सफिया नियाज़ के मुताबिक कई महिलाएं ज़ुबानी तलाक़ दिए जाने के बाद हुई परेशानियां लेकर उनके संगठन के पास आई हैं.

उन्होंने कहा, “इनमें से कई कामकाजी नहीं है और इनके मां-बाप भी पुरानी सोच रखते हैं, नतीजा ये कि तलाक़़ के बाद ये एकदम सड़क पर आ जाती हैं, बच्चों की ज़िम्मेदारी भी रहती है और कमाने-रहने के साधन नहीं होते.”

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क़ानून

सर्वे में 95 फ़ीसदी से ज़्यादा महिलाओं ने कहा कि उन्होंने ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ का नाम तक नहीं सुना था.

भारत में इस्लाम के बड़े और रसूख़दार धार्मिक नेताओं के संगठन ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ के सदस्यों को चुना नहीं जाता. पर ये संगठन खुद को देश के मुसलमानों का प्रतिनिधि मानता है और बाबरी मस्जिद जैसे बड़े धार्मिक मुद्दों में आगे बढ़कर अहम भूमिका निभाता है.

सर्वे में 80 फ़ीसदी से ज़्यादा महिलाओं ने परिवारों से जुड़े इस्लामी नियमों को क़ानून की शक्ल देने की मांग की.

जानकारों के मुताबिक इन नियमों पर भारतीय क़ानून में मुस्लिम पर्सनल लॉ पहले से ही मौजूद है. पर इसकी पूरी जानकारी आम लोगों, ख़ास तौर पर अनपढ़ या ग़रीब तबके के लोगों को नहीं है.

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