भारत के पास क्या अन्य विकल्प हैं?

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रविवार को भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच होने वाली बातचीत से पहले भारत के मीडिया में एक लड़ाई सी छिड़ी हुई है.

पिछले कुछ वर्षों से एक नई प्रवृति यह पैदा हुई है कि भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता शुरू होने से पहले ही उनके टूटने के हालात पैदा हो जाते हैं.

इस बार भी बातचीत शुरू होने तक विश्वास के साथ यह कहना मुश्किल है कि यह बातचीत हो सकेगी या नहीं.

दोनों देशों के बीच लंबे समय से बातचीत नहीं हो रही थी और संबंध भी तनावपूर्ण थे. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच वार्ता का दिन क़रीब आते-आते स्थिति पहले से भी ज़्यादा तनावपूर्ण हो गई है.

भारतीय मीडिया में बातचीत और कश्मीरी अलगाववादियों को लेकर जिस तरह की बहस और चर्चा चल रही है और जिस तरह के आक्रामक बयान सामने आ रहे हैं हालिया दशकों में इतनी कड़वाहट कभी देखने को नहीं मिली.

एक टीवी चैनल पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के एक प्रवक्ता ने वार्ता का समर्थन करने वाले बाक़ी सभी पैनलिस्टों को पाकिस्तान के प्रवक्ता और भारत विरोधी क़रार दिया.

सामंजस्य और वार्ता का समर्थन करने वाले पर्यवेक्षकों और बुद्धिजीवियों को अगर देशद्रोही नहीं तो कम से कम उन्हें राष्ट्र दोस्त भी नहीं माना जा रहा.

इशारों-इशारों में

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कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि परमाणु हथियारों की क्षमता के बावजूद युद्ध की स्थिति में परमाणु हथियारों के उपयोग की आवश्यकता नहीं होगी.

उनका इशारा इस बात से है कि भारत को अब युद्ध और सैन्य कार्रवाई के विकल्प पर भी विचार करना चाहिए.

हालिया वर्षों में भारत के सैन्य विश्लेषकों में यह विचार आम हुआ है कि पाकिस्तान आर्थिक और सैन्य दृष्टि से काफ़ी कमज़ोर हुआ है. जबकि इसके विपरीत भारत की आर्थिक शक्ति के साथ उसके सैन्य बल में भी कई गुना वृद्धि हुई है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति इसी अवधारणा पर आधारित है. मोदी सरकार का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर के संबंध में माहौल भारत के पक्ष में है. भारत मज़बूत स्थिति में है और वह अपना पक्ष स्वीकार करने के लिए पाकिस्तान को मजबूर कर सकता है.

दो तरफ़ा नीति

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मोदी सरकार ने एक तरफ़ पाकिस्तान की नवाज़ शरीफ़ सरकार से बातचीत का रास्ता खुला रखा है और दूसरी ओर नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ और गोलीबारी के जवाब में पाकिस्तानी सेना को आक्रामक रूप से इंगेज कर रखा है.

भारत के सुरक्षा हलक़ो का मानना है कि अफ़ग़ान सीमा पर पाकिस्तानी सेना की बड़ी संख्या में तैनाती से पाकिस्तान की सैन्य शक्ति विभाजित है.

कश्मीरी अलगाववादियों को किसी बातचीत से बाहर रखने और अपनी शर्त पर बात करने के अपने रुख़ से भारत पाकिस्तानी सेना की प्रतिक्रिया की तीव्रता का अनुमान लेना चाहता है.

भारत के कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सरकार का यह रुख़ जोखिम पर है और देश के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है.

लेकिन वर्षों के आतंकवाद, हाफ़िज़ मोहम्मद सईद और दाऊद इब्राहिम जैसी कठोर हकीकत से भारत में बुद्धिजीवियों और मौजूदा सरकार और उसके समर्थकों का एक बड़ा तबक़ा पाकिस्तान के साथ एक निर्णायक समाधान की कामना कर रहा है.

विश्लेषकों के मुताबिक वर्षों से जारी वार्ता प्रक्रिया का परिणाम भारत देख चुका है और अब दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर रहा है.

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