'मोदी कनेक्टिविटी, स्पेक्ट्रम की चिंता करें'

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16 अगस्त, 1995 को वीएसएनएल के दिल्ली मुख्यालय के सामने कुछ लोग खड़े थे. सबके हाथों में पाँच-पाँच हज़ार रुपए के चेक थे.

मैं तब युवा पत्रकार था. मेरे आगे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खड़े थे. मेरे पीछे छात्र, घरेलू औरतें और कॉलेज के टीचर थे.

हम सभी बेसब्री से वीएसएनएल का काउंटर खुलने का इंतजार कर रहे थे. सभी को इंटरनेट अकाउंट खुलवाने के लिए फॉर्म चाहिए था.

15 अगस्त, 1995 यानी स्वतंत्रता दिवस पर भारत में पहली सार्वजनिक इंटरनेट सेवा गेटवे इंटरनेट एक्सेस सर्विस (जीआईएएस) शुरू करने की घोषणा की गई थी.

एकाउंट शुरू होने में एक दिन लगा. इसके लिए मुझे अपने कम्प्यूटर में एक मोडम लगाकर वीएसएनएल से मिला फ़ोन नंबर डायल करना था. नेट की स्पीड थी, 9.6 केबीपीएस.

नई दुनिया का दरवाज़ा

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इंटरनेट ने मेरे लिए एक बिल्कुल ही नई दुनिया के दरवाज़े खोल दिए.

मैं ऑनलाइन समाचार पढ़ सकता था. इंटरनेट पर सर्च के लिए मैं अल्टाविस्टा सर्च इंजन का प्रयोग करने लगा था. छोटे-छोटे प्रोग्राम डाउनलोड कर लेता था. तब गूगल का कहीं नामोनिशान भी नहीं था.

आज अगर आप सबसे सस्ता ब्रॉडबैंड भी ख़रीदें तो उस समय के इंटरनेट से कई सौ गुना तेज़ होगा.

मेरी आठ साल की बेटी को तो यकीन ही नहीं होता कि तब इंटरनेट की वैसी हालत थी.

आज वो फ़ाइबर-ऑप्टिक से जुड़े इंटरनेट से हाई क्वालिटी यूट्यूब वीडियो टीवी के बड़े पर्दे पर देखती है. इस इंटरनेट की रफ़्तार मेरे 1995 वाले वीएसएनएल वाले इंटरनेट से 1100 गुना तेज़ है.

आज मेरा इंटरनेट हमेशा चालू रहता है इसलिए मेरी बेटी को डायल अप फ़ोन नंबर की भी ज़रूरत नहीं पड़ती.

मोबाइल पर इंटरनेट

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इस समय भारत में क़रीब 30 करोड़ लोग इंटरनेट प्रयोग कर रहे हैं. इनमें हर 10 में से 9 लोग मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं.

इनमें से बहुत से लोग अपने सुस्त 2-जी इंटरनेट पर ही फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप का इस्तेमाल करते हैं.

क़रीब नौ करोड़ लोग ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल करते हैं. भारत में ब्रॉडबैंड होने का मतलब है 512 केबीपीएस से अधिक की स्पीड.

जी हाँ, पिछले 20 साल में भारत में इंटरनेट ने एक लंबा सफ़र तय कर लिया है. लेकिन अगले पाँच सालों में उसे अभी और लंबा सफ़र तय करना बाक़ी है.

एशिया प्रशांत में सबसे सुस्त इंटरनेट

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एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे सुस्त इंटरनेट भारत में है. दुनिया में इंटरनेट की स्पीड के मामले मे भारत का 115वां स्थान है.

अकामाइज़ स्टेट ऑफ़ द इंटरनेट रिपोर्ट के अनुसार भारत में इंटरनेट की औसत रफ़्तार 2 एमबीपीएस से कम है. ये रफ़्तार भी ब्रॉडबैंड का औसत है.

भारत में दो-तिहाई यूज़र्स मोबाइल पर 2-जी कनेक्शन का प्रयोग करते हैं जिसकी रफ़्तार 62 केबीपीएस से कम होती है.

दुनिया में सबसे तेज़ रफ़्तार इंटरनेट एक एशियाई देश में ही मिलती है. दक्षिण कोरिया में दुनिया का सबसे तेज़ इंटरनेट है जिसकी औसत ब्रॉडबैंड स्पीड 24 एमबीपीएस है.

पिछले साल एक आरटीआई से पता चला था कि भारतीय प्रधानमंत्री के कार्यालय में 34 एमबीपीएस वाला इंटरनेट कनेक्शन है.

अगर कोरिया, अमरीका और दूसरे कई देशों में आम नागरिकों के लिए उपलब्ध 1 जीबीपीएस तक की स्पीड को ध्यान में रखें तो प्रधानमंत्री कार्यालय का इंटरनेट मझोले दर्जे का ही लगेगा.

असली समस्या

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भारत की असल समस्या ये नहीं है कि यहाँ ब्रॉडबैंड की औसत स्पीड एशिया-प्रशांत में सबसे कम 2 एमबीपीएस है.

असली दिक्कत ये है कि ये 2 एमबीपीएस स्पीड भी यहाँ के 10 प्रतिशत से भी कम लोगों को उपलब्ध है.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महत्वाकांक्षी डिजिटल इंडिया प्रोग्राम इंटरनेट स्पीड पर टिका है. लेकिन भारत में 10 में से नौ आदमी फ़ोन पर इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं.

जिन शहरों में तेज़ रफ़्तार ब्रॉडबैंड इंटरनेट उपलब्ध है वहाँ भी मोबाइल पर इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की तादाद ज़्यादा है.

भारत में और 20 करोड़ हाई-स्पीड मोबाइल ब्रॉडबैंड कनेक्शन देने के लिए भारतीय ऑपरेटरों के पास पर्याप्त वायरलेस स्पेक्ट्रम नहीं है.

आगे का रास्ता

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इसका एक उपाय तो ये हो सकता है कि सरकार हज़ारों जगहों पर मुफ़्त या सस्ता वाई-फ़ाई इंटरनेट उपलब्ध कराए. सरकार का इरादा भी यही है.

लेकिन इसके लिए आर्थिक संसाधन कैसे जुटाए जाएंगे इसको लेकर स्थिति साफ़ नहीं है.

एक बड़ा उपाय ये हो सकता है कि सरकार 3जी और 4जी मोबाइल डेटा कनेक्टिविटी के लिए ज़्यादा स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराए.

नरेंद्र मोदी के लिए असली चुनौती ये जानना नहीं है कि एशिया में सबसे सुस्त इंटरनेट भारत में क्यों है, बल्कि उन्हें ये सोचने की ज़रूरत है कि अगले पाँच सालों में भारत के 50 करोड़ लोगों तक 2 एमबीपीएस वाला ब्रॉडबैंड इंटरनेट भी कैसे पहुँचेगा.

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