तो गुज़ारा भत्ते के लिए तलाक़शुदा 'सेक्स' न करे

कैरिकेचर

दक्षिण भारत की एक अदालत ने हाल ही में फ़ैसला दिया कि एक तलाक़शुदा महिला अपने पूर्व पति से तभी गुज़ारा भत्ता पाने की हक़दार है जब वह किसी और से यौन संबंध न बनाए.

मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एस नागमुथु क़ानूनी रूप से सही हो सकते हैं, लेकिन फ़ैसले की भाषा चिंता में डालने वाली है.

जस्टिस नागामुथु का मानना है कि गुज़ारा भत्ते के लिए, एक महिला को ‘यौन अनुशासन’ कायम रखना चाहिए.

अपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत विवाहेत्तर संबंध बनाने पर महिला गुज़ारा भत्ते का दावा नहीं कर सकती. हाईकोर्ट ने कहा कि क्योंकि महिला को तलाक देते समय फैमिली कोर्ट ने माना था कि महिला के विवाहेत्तर संबंध हैं, इसलिए वह अपने पूर्व पति से गुज़ारा भत्ता पाने की स्पष्ट रूप से हक़दार नहीं है.

लेकिन जिन परिस्थितियों के तहत तलाक़ दिया गया, उन पर भी सवाल उठते दिखाई देते हैं- फैमिली कोर्ट का आदेश ‘एकपक्षीय’ सुनवाई के आधार पर था, जिसका मतलब वह कभी मुकदमा नहीं लड़ी और ना ही कभी कोर्ट में हाज़िर हुई.

मुक़दमा

1998: कनिमोझी का विवाह तमिलनाडु के मदुरई में एक निचली श्रेणी के सरकारी कर्मचारी चिन्ना करुप्पास्वामी से हुई.

2009: करुप्पास्वामी ने मदुरई के फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल की. उन्होंने पत्नी पर विवाहेत्तर संबंध बनाने का आरोप लगाया और तलाक़ की मांग की. कनिमोझी ने फ़ैसले को चुनौती नहीं दी.

2010: कनिमोझी ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में अपनी याचिका दाखिल करते हुए 2500 रुपए महीने के गुज़ारा भत्ते की मांग की. उन्होंने विवाहेत्तर संबंधों के आरोपों से इनकार करते हुए अपने पति पर ही अवैध संबंधों का आरोप लगाया.

मार्च 2010: फैमिली कोर्ट ने पत्नी के ‘विवाहेत्तर संबंधों’ में रहने को आधार बनाते हुए तलाक़ मंज़ूर किया.

2011: मजिस्ट्रेट कोर्ट ने कनिमोझी के गुज़ारा भत्ता के दावे को ख़ारिज किया और उन्होंने इस निर्णय को ऊपरी अदालत में चुनौती दी.

2012: प्रमुख ज़िला और सत्र न्यायाधीश ने करुप्पास्वामी को 1000 रुपए महीने का गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दिया.

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जुलाई 2015: मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने कहा कि कनिमोझी गुज़ारा भत्ते की हक़दार नहीं है यदि उसने, “उस यौन अनुशासन का पालन नहीं किया है, जिसका पालन वह वैवाहिक संबंध के दौरान करती रही थी”.

ख़बरों में कहा गया है कि कनिमोझी बहुत ग़रीब हैं और वो भारतीय क़ानून व्यवस्था की जटिलताओं को नहीं समझतीं. साथ ही किसी अच्छे वकील से पैरवी करवाने में भी वो सक्षम नहीं हैं.

वास्तव में, उनकी अपील को सुनते वक्त हाईकोर्ट को उनके लिए एक क़ानूनी सलाहकार को नियुक्त करना पड़ा क्योंकि वो वकील की फीस भी नहीं दे सकती थीं.

क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि विवाहेत्तर संबंधों को साबित कर पाना बेहद मुश्किल है और अगर वो सुनवाई की शुरू से ही किसी अच्छे वकील को पैरवी के लिए रख पाती तो उनके ख़िलाफ़ आरोप शायद टिकते ही नहीं.

परिस्थितिजन्य सबूत

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दिल्ली के जाने-माने वकील प्रभजीत जौहर का कहना है कि शहरों में तो लोग अपने पति या पत्नी के ख़िलाफ़ सबूत जुटाने के लिए जासूस रखते हैं, तस्वीरें, मोबाइल फोन डाटा, टेलीफोन बातचीत रिकॉर्ड करते हैं. इसके बावजूद आरोपों को साबित कर पाना मुश्किल होता है और अक्सर जज परिस्थतिजन्य सबूतों पर भरोसा करते हैं.

जौहर कहते हैं, “एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने विवाहेत्तर संबंधों के आरोपों को स्वीकार करते हुए कहा था कि यदि एक महिला और एक पुरुष एक कमरे में मिलें तो, निश्चित तौर पर वो बाइबिल तो नहीं पढ़ रहे होंगे. एक अन्य मामले में देर रात एक महिला की किसी पुरुष के साथ बातचीत को कोर्ट ने विवाहेत्तर संबंध माना था.”

कनिमोझी से जुड़े एक वकील ने बीबीसी को बताया कि उनका मानना है कि यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ कि उनके विवाहेत्तर संबंध थे.

इस फ़ैसले का इस मायने में भी बड़ा प्रभाव है- क्योंकि जज ने अपने आदेश में ज़ोर देकर कहा कि तलाक़ के बाद यदि महिला को गुज़ारा भत्ता चाहिए तो उसे यौन अनुशासन का पालन उसी तरह करना होगा, जैसा कि वह वैवाहिक संबंध के दौरान करती थी.

कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा, “अन्य शब्दों में, वैवाहिक संबंध निभाते हुए पत्नी विवाहेत्तर संबंध नहीं बना सकती, और अगर वो ऐसा करती है तो वह अपने पति से गुज़ारा भत्ता पाने का हक़ खो देती है. इसी तरह से, तलाक़ के बाद भी, यदि वह उसी यौन अुनशासन का पालन करती है जो उसने वैवाहिक संबंधों के दौरान बना रखे थे, तभी उसे गुज़ारा भत्ता पाने का हक़ है. अगर ऐसा नहीं कर पाती है तो वह गुज़ारा भत्ते का हक़ खो देती है.”

गुज़ाराभत्ता क़ानून क्या है

सीआरपीसी की धारा 125 में गुज़ारा भत्ता का जिक्र है, इसमें स्पष्ट किया गया है कि किन तीन परिस्थितियों के तहत ‘पत्नी’ गुज़ारा भत्ता पाने की हक़दार नहीं है.

- यदि वह विवाहेत्तर संबंधों में रह रही हो

- यदि उसने बिना पर्याप्त कारण दिए अपने पति को छोड़ दिया हो

- यदि वे आपसी सहमति से अलग-अलग रह रहे हों

महिला अधिकार कार्यकर्ता अदालत के इस फ़ैसले को भयावह और उपदेशात्मक बताते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता कविता कृष्णन कहती हैं, “ये एक बात है कि विवाहेत्तर संबंध रखने का मतलब है गुज़ारा भत्ता गंवा देना, लेकिन तलाक़ के बाद भी इसी परिभाषा की बात करना पूरी तरह अलग बात है.”

उन्होंने कहा, “जज ने कहा कि वह उस व्यक्ति से गुज़ारा भत्ता मांग सकती है, जिसके साथ संबंधों में रह रही है. आप यौन संबंधों को गुज़ारा भत्ते से कैसे जोड़ सकते हैं? क्या अदालत ये कह रही है कि आप उस आदमी से पैसा लो जिसके साथ सो रही हो.”

कृष्णन ने कहा, “ये स्पष्ट रूप से पितृसत्तात्मक और सेक्सिस्ट विचार हैं जिन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है. मुझे लगता है कि उसके पास इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का मजबूत आधार है.”

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