'ज़मीन के काग़ज़ से हमारी इज़्ज़त बढ़ेगी'

ओडिशा, ज़मीन का पट्टा पाने वाली अकेली महिलाएँ इमेज कॉपीरइट Amitabh Patra

“इस 0.4 एकड़ ज़मीन के एक हिस्से में हम अपना घर बनाएंगें, कुछ साग-सब्ज़ी उगाएंगें, खाने पीने के जो लाले पड़े हुए हैं, उससे कुछ रहत मिलेगी. ज़मीन के काग़ज़ात होने से हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा और इज़्ज़त भी बढ़ेगी.”

ये छोटे छोटे ख़्वाब हैं तुलसी, सरला और भानुमती के जो ओडिशा में रहने वाली एकाकी महिलाएँ या सिंगल वूमन हैं. उनके जैसी कई अकेली महिलाओं को ज़मीन के पट्टे के काग़ज़ राज्य में दिए जा रहे हैं.

ओडिशा के मयूरभंज ज़िले की जशिपुर तहसील आबादी का एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है. सदियों से इसी मिट्टी में रहते हुए भी ज़मीन का मालिकाना का हक़ बहुत सारे लोगों के पास नहीं है, ख़ासकर महिलाओं के पास.

अकेली महिलाओं को राहत

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विश्व बैंक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार ओडिशा में सिर्फ़ 3.3 प्रतिशत महिलाओं के पास ज़मीन का मालिकाना हक़ है. इस स्थिति में ज़मीन का पट्टा मिलना इन अकेली महिलाओं के लिए बहुत बड़ी राहत है.

ग़ैर सरकारी संस्था लान्देसा, सरकार के साथ मिल कर ओडिशा के केंदुझर, मयूरभंज, कोरापुट और कलाहांडी ज़िलों में घर-घर सर्वे कर के असहाय महिलाओं की पहचान कर रहा है और पट्टे बांटने का काम जारी है .

ऐसे अकेली महिलाओं को ख़ुद की पहचान और ठिकाने तक के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है – फिर वो भाई, बहन हो या माता-पिता. इनसे मदद न मिलने की स्थिति में इन महिलाओं के लिए जीना दूभर हो जाता है. इसमें विधवाएँ और शादी टूटने के बाद अकेली रहने वाली महिलाएं शामिल हैं.

एकाकी माँओं के लिए स्थिति और गंभीर होती है, जब उन्हें कोई सरकारी काग़ज़ात की ज़रूरत होती है - जैसे बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र, आवासिक प्रमाण, या रोज़गार प्रमाणपत्र. बच्चों को स्कूल में दाख़िला तक मिलने में दिक़्क़त होती है.

गुज़ारा मुश्किल

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ओडिशा की सुमित्रा तिरिया अपने पति से अलग होने के बाद अपने दो बच्चे के साथ अकेली रहती हैं. मज़दूरी से सालाना आमदनी है दस हज़ार से बारह हज़ार, यानी महीने में सिर्फ़ एक हज़ार रुपया.

बड़ी मुश्किल से अपना और बच्चों के पेट पाल रही सुमित्रा बताती हैं, “जब सामाजिक सुरक्षा योजना में बैंक खाते खोलने के लिए कहा गया, तो ख़ुद का कोई रिहाइशी काग़ज़ात न होने के कारण खाता खोलने में बहुत दिक़्क़त आई. इन प्रमाणपत्रों के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाने के बावजूद कई बार ये ज़रूरी काग़ज़ात नहीं मिल पाते. (इंदिरा आवास) या “मो कुडिया” योजना का घर हमें नहीं मिलता.

सुमित्रा तिरिया को उम्मीद है कि हैं कि ज़मीन मिलने के बाद उन्हें और उनके बच्चे को अपना हक़ मिल सकता है और बच्चों के स्कूल दाख़िले में ज़्यादा दिक़्क़त नहीं आएगी.

लान्देसा के इसके राज्य सहयोगी प्रणति दास कहती हैं, “पूरे राज्य में अब तक क़रीब दो लाख ऐसे महिलाओं की पहचान हो चुकी है और क़रीब 40 हज़ार महिलाएँ ऐसे पट्टा पाने के लायक़ पाई गई हैं.”

बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद

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ज़मीन मिलने से इन महिलाओं के मन में बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद जगी है. इन महिलाओं को इनके गाँव के पास ख़ाली सरकारी जगह में ज़मीन दी जाएगी.

योजना ये है कि इन्हें मनरेगा और दूसरे सरकारी कार्यक्रमों के तहत सहायता भी दी जाएगी और सामाजिक सुरक्षा योजना के साथ इन्हें जोड़ा जाएगा .

वैसे तो कई और जगहों पर पहले भी भूमिहीन लोगों को सरकारी अधिकारिओं ने पट्टे बाँटे हैं, पर 20-30 साल गुज़र जाने के बाद भी ज़मीन को चिन्हित न करने की वजह से ज़मीन का अधिकार सिर्फ़ काग़ज़ात तक सीमित है.

लेकिन इन अकेली महिलाओं को उम्मीद है कि सरकारी कर्मचारी इनके हिस्से की ज़मीन की पहचान जल्द करवाएँगे जिससे इनकी ज़िंदगी बेहतर हो सके.

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