'समस्या जनसंख्या है, मुस्लिम जनसंख्या नहीं'

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किसी आम आदमी से पूछिए कि भारत में मुसलमानों की कितनी आबादी है तो आपको इसके अजीबोग़रीब जवाब मिलेंगे.

कुछ लोग कहेंगे कि वो बहुसंख्यक हैं, तो कुछ लोग कहेंगे कि उनकी संख्या बहुत ज़्यादा है.

हिंदू-मुस्लिम आबादी की पेचीदगी को समझें

जिनके पास थोड़ी ज़्यादा सूचना होगी, साथ ही वो दूर की सोच रखने वाले होंगे वो कहेंगे कि वो बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं और एक दिन उनकी आबादी देश में सबसे ज़्यादा हो जाएगी.

अगर आप उनसे पलटकर यह पूछ लेंगे कि आपको ऐसा क्यों लगता है कि मुसलमानों की संख्या बहुत ज़्यादा है तो वो कहेंगे, मैं जिस शहर में रहता हूँ वहाँ हर जगह मुसलमान दिखाई देते हैं.

यक़ीन बनाम सच

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जब ऐसी ही समझ बहुत सारे लोगों में मौजूद पाई जाती है तो कई बार लगने लगता है कि यही सच है.

मुझे इस बात की ख़ुशी है कि जनगणना के ताज़ा आंकड़ों को जो लोग देखेंगे और उसका अध्ययन करेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि वो अबतक जो सोचते थे वो ग़लत था.

इन आंकड़ों से यह बात साफ़ है कि मुसलमान भारत में अल्पसंख्यक हैं. लेकिन साल 2011 की जनगणना पर आधारित इन आंकड़ों को जिस तरह से पेश किया गया है उससे भारत के एक तबक़े की इस सोच (जो ग़लत सूचना पर आधारित है) को शायद बल मिले कि मुसलमान जल्द ही इस देश में बहुसंख्यक हो जाएँगे.

ताज़ा आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक में मुसलमानों की जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर 24.6 प्रतिशत रही है. ये दर हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि की दर (16.7 प्रतिशत) से क़रीब आठ प्रतिशत ज़्यादा है.

जनसंख्या बढ़ने की दर

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इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की दर हिन्दुओं की तुलना में ज़्यादा है. यह बात जनगणना के ताज़ा आंकड़ों से भी जाहिर होती है.

लेकिन ये आंकड़े इस बात को बहुत साफ़ नहीं करते कि मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की दर में पिछले कुछ दशकों में बहुत तेज़ी से कमी आई है.

2001-11 के दौरान न सिर्फ़ जनसंख्या वृद्धि दर में भारी कमी आई है बल्कि इस दौरान मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ोतरी दर में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है.

इस दौरान हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि की दर में भी कमी आई है लेकिन मुसलमानों और हिंदूओं की जनसंख्या वृद्धि दर में जो फ़ासला पहले था वो काफ़ी कम हुआ है.

मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की दर में आई इस कमी से उन लोगों को ज़रूर राहत मिलनी चाहिए जिन्हें यह डर सताता है कि आने वाले समय में भारत में मुसलमानों की जनसंख्या हिन्दुओं से ज़्यादा हो जाएगी.

असल समस्या

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असल मुश्किल यह है कि भारत में जनसंख्या बढ़ने को एक समस्या की तरह देखने के बजाय केवल मुसलमानों की जनसंख्या में बढ़ोतरी को समस्या की तरह देखा जाता है.

इससे भी बड़ी मुश्किल मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने को एक सोची-समझी साजिश के रूप में देखना है, ताकि मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं से अधिक हो जाए.

यह सच है कि पिछले एक दशक में हिन्दुओं की कुल जनसंख्या में 0.7 प्रतिशत की कमी आई है. हिन्दुओं की जनसंख्या देश की कुल आबादी का 79.8 प्रतिशत है.

वहीं मुसलमानों की कुल जनसंख्या का प्रतिशत 13.4 से बढ़कर 14.2 हो गया है. यानी उनकी जनसंख्या में पहले के मुक़ाबले 0.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. लेकिन ध्यान रहे कि एक या दो या उससे अधिक बच्चे पैदा करना पति और पत्नी का निजी निर्णय होता है.

बच्चे का फ़ैसला निजी

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Image caption भाजपा के सांसद साक्षी महाराज

कोई वैवाहिक दंपति कितने बच्चे पैदा करना चाहता है इसका निर्णय वो शायद ही धार्मिक आधार पर लेता हो. और कम से कम ये किसी मज़हब के लोगों की बहुत बड़ी साज़िश का हिस्सा तो क़तई नहीं.

और भाजपा सांसद साक्षी महाराज की तरह तो शायद ही कोई करता हो जिन्होंने कुछ समय पहले कहा था कि हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए हर हिन्दू को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए.

जनसंख्या वृद्धि और संसाधनों पर पड़ने वाले उसके दबाव की समस्या से निपटने के लिए सरकार लोगों को कम बच्चे पैदा करने के लिए शिक्षित और प्रेरित करने की कोशिश करे.

सरकार कम बच्चे पैदा करने वालों को विशेष रियायत वगैरह देकर इसे बढ़ावा दे सकती है लेकिन बेहतर यही होगा कि इसका फ़ैसला परिवारों के ऊपर ही छोड़ दिया जाए, चाहे उनका तालुक़्क़ किसी मज़हब से हो.

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