महिलाओं के डिब्बे में पुरुष नहीं चाहिए

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पश्चिम बंगाल की एक ट्रेन महिलाओं और पुरुषों के बीच टकराव की वजह बन गई है.

2010 में ममता बनर्जी ने रेल मंत्री रहते महिलाओं के लिए कोलकाता में मातृभूमि लेडीज़ स्पेशल लोकल चलाने का एलान किया था. लेकिन हाल ही में इस ट्रेन के नौ में से तीन कोच को जनरल बना कर उनमें पुरुष यात्रियों को सफ़र करने की अनुमति दे दी गई थी.

रेलवे की दलील थी कि इसके कई डिब्बे ख़ाली रहते हैं. लेकिन महिला यात्रियों ने इसका जमकर विरोध किया है.

उन्होंने कई स्टेशनों पर पुरुष यात्रियों के साथ दो-दो हाथ तो किए ही, पटरियों पर धरना भी दिया. नतीजा ये हुआ कि मातृभूमि लोकल को फिर से लेडीज़ स्पेशल बना दिया गया है.

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इसके बाद अब पुरुष इस फ़ैसले का जमकर विरोध कर रहे हैं. इस हंगामे और पथराव में कई लोग घायल भी हुए और एक दिन तो छह घंटे तक ट्रेनों की आवाजाही ठप रही.

इस ट्रेन में सवारी को लेकर महिला और पुरुष यात्रियों की अपनी-अपनी दलीलें हैं.

इसलिए हमने विरोध में शामिल एक महिला और एक पुरुष यात्री से बात करके उनका पक्ष जानने की कोशिश की.

कावेरी मंडल, कामकाजी महिला

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Image caption कावेरी मंडल

इस समय कामकाजी महिलाओं की तादाद लगातार बढ़ रही है. रोज़ाना उपनगरों से मुझ जैसी हज़ारों महिलाएं नौकरी और दूसरे कामकाज के सिलसिले में सुबह-सुबह इसी ट्रेन से कोलकाता पहुंचती हैं.

यह हमारी ट्रेन है. इसमें सफ़र करने की स्थिति में हमें सीट या खड़े होने की जगह के लिए पुरुषों के साथ जूझना नहीं पड़ता.

लेडीज़ स्पेशल ट्रेन होने की वजह से हमलोगों को आवाजाही में कोई परेशानी नहीं होती. हम मनचलों की चुभती निगाहों और छेड़छाड़ की परवाह किए बिना आराम से सफ़र पूरा करते हैं.

ऐसे में रेलवे की ओर से इसमें पुरुषों को सवारी की अनुमति देने का फ़ैसला उचित नहीं था. अभी उनके लिए तीन डिब्बे आरक्षित किए गए थे. कल को भीड़ के बहाने वे हमारे लिए आरक्षित डिब्बों में भी घुसने लगते.

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लोकल ट्रेनों में कुछ लोग तो हमेशा ऐसे ही मौक़ों की तलाश में रहते हैं. इस ट्रेन के शुरू होने से पहले हमें रोज़ाना छेड़छाड़ का शिकार होना पड़ता था और हम पर फ़ब्तियां कसी जाती थीं.

अब लेडीज़ स्पेशल के कुछ डिब्बों को जनरल बनाने की स्थिति में इसका हश्र भी दूसरी लोकल ट्रेनों की तरह ही हो जाता. इसलिए हमने एकजुट होकर इस फ़ैसले का विरोध किया.

प्रदीप सिकदर (पुरुष यात्री)

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Image caption प्रदीप सिकदर

भारी भीड़ की वजह से हम रोज़ाना सुबह लोकल ट्रेनों में झूलते हुए जान हथेली पर लेकर दफ़्तर पहुंचते हैं. लेकिन मातृभूमि स्पेशल के कोच ख़ाली रहते हैं और महिलाएं आराम से पांव फैला कर सफ़र करती हैं.

ऐसे में अगर उस ट्रेन के तीन डिब्बों में पुरुष यात्रियों को सवारी की अनुमति दे दी गई तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?

एक ओर तो महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों से बराबरी का दावा करती हैं जबकि दूसरी ओर उनको लेडीज़ स्पेशल के अलग डिब्बों में पुरुषों की सवारी पर भी आपत्ति है. आख़िर ऐसा विरोधाभास क्यों?

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मातृभूमि के तीन डिब्बे ही पुरुषों के लिए थे. बाक़ी छह तो महिला यात्रियों के लिए ही आरक्षित थे. लेकिन उनको इस पर भी एतराज़ था.

सभी पुरुषों को एक ही तराज़ू पर तौलना ठीक नहीं है. अच्छे-बुरे लोग हर जगह होते हैं. आख़िर दूसरी लोकल ट्रेनों में तो भी महिलाएं सफ़र करती हैं. क्या उन सबके साथ छेड़छाड़ होती है?

दरअसल, छेड़छाड़ तो एक बहाना है. कुछ महिला यात्रियों ने इसे नाक का सवाल बना लिया था. उन्होंने बाक़ी यात्रियों को भड़का कर बेवजह इस मुद्दे को तूल दे दिया था.

रेलवे की दलील

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पूर्वी रेलवे के मुख्य जन संपर्क अधिकारी रवि महापात्र के मुताबिक़ सर्वेक्षण से पता चला था कि मातृभूमि के 30 फ़ीसदी सीटें ख़ाली रहती हैं.

सुबह दफ़्तर के समय दूसरी लोकल ट्रेनों में काफ़ी भीड़ रहती है.

इसलिए प्रयोग के तौर पर इस ट्रेन के तीन कोचों को जनरल में बदल कर पुरुषों को इसमें सफ़र करने की अनुमित दी गई थी. लेकिन इस मुद्दे पर विवाद के बाद हमने यह फ़ैसला वापस ले लिया है.

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