डागरवाणीः उस्ताद से सुर मिलाएं श्रोता भी

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गुरु शिष्य परंपरा प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धती का अहम हिस्सा रही है.

पिछले दिनों दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में इसकी झलक दिखी. 'ध्रुपद सोसायटी' ने गुरु शिष्य परंपरा पर 'डागरवानी' नाम से एक संगीत बैठक का आयोजन किया.

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उस्ताद फ़ैयाज़ वसीफ़ुद्दीन डागर का यह प्रयास था कि ध्रुपद संगीत प्रेमी प्राचीन गुरु शिष्य परंपरा से अवगत हों और नई पीढ़ी ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय शास्त्रीय संगीत में रुचि ले.

गुरु शिष्य परंपरा का महत्व आज भी है, बस तकनीक के दौर में कुछ धूमिल पड़ गई है.

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भारतीय शास्त्रीय संगीत में ध्रुपद संगीत शैली को सबसे प्राचीन शैली माना गया है. माना जाता है, ध्रुपद गायन शैली छह सौ साल पुरानी है.

डागर घराने ने ध्रुपद शैली को ज़िंदा रखने में अहम भूमिका निभाई है. फ़ैयाज़ वसीफ़ुद्दीन डागर स्वर्गीय उस्ताद नासिर फ़ैयाज़ुद्दीन डागर के बेटे हैं.

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इस संगीत बैठक में कोई औपचारिकता नहीं थी, दर्शक भी इस रियाज़ का हिस्सा बन सकते थे.

पुराने समय में इस तरह की संगीत बैठकें आम थी, पर वक़्त के साथ इसका चलन कम होता चला गया.

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उस्ताद वसीफ़ुद्दीन कहते हैं, "इस तरह संगीत प्रेमी गुरु शिष्य परंपरा को देख समझ सकते हैं और उसका उनुभव भी ले सकते हैं और इन बैठकों के ज़रिए नई पीढ़ी इस परंपरा का महत्व भी समझेगी."

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पहले इस परंपरा के चलते शास्त्रीय संगीत के दस्तावेज़ नहीं रखे जाते थे, क्योंकि शिष्य गुरुकुल में ही रहकर संगीत साधना किया करते थे.

इससे अध्ययन के साथ-साथ उन्हें संगीत से जुड़ी और बारीकियां भी सीखने को मिलती थीं.

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अब व्यस्त जीवन शैली के चलते यह संभव नहीं हो पाता, पर कई संगीत घराने अब भी इस परंपरा को क़ायम रखे हुए हैं.

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गुरु शिष्य परम्परा में संगीत के विद्यार्थी अध्ययन, नियम और संयम का पालन करते हुए अपने गुरु का सम्मान करना सीखते हैं और गुरु भी हर विद्यार्थी पर विशेष ध्यान देते हैं.

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बैठक की आयोजक क़मर डागर बताती हैं, "ध्रुपद सोसाइटी इस तरह की बैठक व गुरु शिष्य परंपरा का आयोजन करती रहती है ताकि यह परंपरा फिर से चलन में आ सके."

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