'महाराष्ट्र के मांझी' 57 साल सड़क बनाते रहे

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महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के गुंडेगाव गांव में रहने वाले भापकर 'महाराष्ट्र के मांझी' के तौर पर सामने आए है.

भापकर ने अहमदनगर में अपनी निजी कोशिशों से 40 किलोमीटर लंबी सड़क बनाआई है.

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साल 1957 में शुरू किए इस काम को पूरा करने में उन्हें पूरे 50 साल लग गए. उन्हें इस दौरान सात पहाड़ियों में 11 घाट काटने पड़े.

साठ साल की कोशिशों के बाद राज्य सरकार अब उनकी मदद करने सामने आ रही है.

दशरथ मांझी पर बनी फिल्म के बाद लोगों की उनमें रुचि बढ़ी है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस शनिवार को उनका सम्मान करेंगे.

मज़ाक बना

भापकर उन दिनों को याद कर कहते हैं, “लोगों ने मेरा खूब मज़ाक उडाया, मुझे दीवाना कहा. लेकिन जब रास्ता बनकर तैयार हुआ तो वही लोग उसका इस्तेमाल करने आगे आए. बिना दीवानगी के भी कोई काम होता है भला!”

पेशे से प्राथमिक शिक्षक रहे भापकर गांव और आसपास में ‘गुरुजी’ के नाम से जाने जाते है. जब उन्होंने पत्थर तोड़ना शुरू किया, उन्हें गांव वालों की फ़ब्तियां झेलनी पड़ीं.

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वे कहते हैं, "वो मुझे 'वेडा मास्तर' (दीवाना मास्टर) कहते थे. उनका मानना था कि मैं उन्हें धोखा दे रहा हूं. जहां लोग पैदल नहीं जा सकते, वहां कोई रास्ता कैसे बनाएगा. लेकिन मैंने कभी किसी का जवाब नही दिया और अपना काम जारी रखा."

पूरे 57 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद भापकर गुरूजी ने 40 किलोमीटर के रास्ते अपने बूते बनाए. इस वजह से उनके गांव और देऊल गांव के बीच की दूरी 29 किलोमीटर से घट कर 10 किलोमीटर हो गई.

मज़दूरी दी

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बीबीसी से बात करते हुए भापकर कहते हैं, "आज़ादी के समय पड़ोस के गांव तक जाने का रास्ता तक नहीं था. वहां तक पैदल जाकर हमें घोड़ों पर बैठकर जाना पड़ता था. उस समय कोई साईकिल तक ले नहीं जा सकता था. माता-पिता का आशीर्वाद लेकर मैंने रास्ते की खुदाई शुरू की. पहले अकेले काम किया और फिर मज़दूरों की मदद से उसे पूरा किया. उन्हें अपने वेतन और खेती की कमाई से मज़दूरी दी. आज तक मैंने सरकार का एक पैसा तक नहीं लिया है."

भापकर के सामने और भी अडचनें थीं. रास्ते के लिए ज़रूरी कुछ ज़मीन वन विभाग के पास थी, कुछ निजी मिल्कियतें थीं. धीरे धीरे ज़मीन और लोगो की अनुमति लेकर काम आगे बढ़ते गया. इस बीच आसपास के इलाके में उनकी साख बढ़ती गई, लेकिन उनके अपने परिवार की अनदेखी हुई.

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भापकर के तीन बेटे और एक बेटी है. सबसे छोटे बेटे रमेश कहते है, "पिताजी अक्सर गांव के कामों में लगे रहते थे. इसलिए परिवार के लिए वे अधिक समय नहीं दे पाए. उन्होंने हमारी नौकरी के लिए भी कभी ध्यान नहीं दिया. अब मैं केवल खेती करता हूं."

पहाड़ी को काट कर रास्ता बनाने के अलावा भापकर ने गांव में दूसरे काम भी किए हैं. गुंडेगांव के एक युवा दादासाहेब आगले कहते है, "जब मैं स्कूल में जाता था, तब मैंने गुरुजी को झाडू लगाते हुए और नशा मुक्ति अभियान से जुड़े देखा था. हमें लगता था कि रास्ता बनाने का काम कभी पूरा नहीं होगा. लेकिन गुरुजी की लगन के कारण वह पूरा हुआ."

चिट्ठी से सम्पर्क

महाराष्ट्र के मांझी कहलाने वाले भापकर का असली मांझी से चिट्ठी से संपर्क भी हुआ था.

भापकर कहते हैं, "उन्होंने मुझे अख़बार की कुछ कतरनें भेजी थीं, जिसके जवाब में मैंने अपना काम देखने के लिए उनको न्योता दिया था."

पर इन दोनों की मुलाकात कभी नहीं हुई.

मान्यता नहीं

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भापकर के भतीजे संतोष उनके साथ मिलकर बस सेवा शुरू करने की कोशिश कर रहे है.

वे बताते हैं, "बचपन में चाचाजी हमें अपने साथ ले जाते थे और अपना काम दिखाते थे. उस तरह से उन्होंने युवाओं को नए संस्कार दिए.”

इसके बावजूद भापकर को अपना काम पूरा नहीं हुआ लगता है. उनके बनाए रास्ते को सरकारी स्तर पर आज भी मान्यता नहीं है. आज भी इस रास्ते पर राज्य परिवहन की बसें नही चलती.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "जब यह बस यहां से दौड़ेगी तभी मुझे असली खुशी होगी."

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