हार्दिक पटेल, पाटीदार आंदोलन और चार सवाल

हार्दिक पटेल इमेज कॉपीरइट AFP

गुजरात के उभरते हुए युवा नेता हार्दिक पटेल के नेतृत्व में आरक्षण की मांग को लेकर चलाए जा रहे पटेल समुदाय के आंदोलन के पीछे किसका हाथ है? आंदोलन क्यों और कैसे शुरू हुआ?

गुजरात आमतौर पर हिन्दू-मुस्लिम दंगों के लिए जाना जाता है. जातीय अशांति के लिए नहीं. तो अब ये पटेल समुदाय जाति अशांति क्यों फैला रहा है?

अहमदाबाद में 25 अगस्त की रैली में पांच लाख लोग (हार्दिक पटेल और उनके समर्थकों पर यक़ीन किया जाए तो) कैसे आ गए? राज्य सरकार ने रैली की न केवल इजाज़त दी बल्कि जिस मैदान में रैली हुई उसका किराया भी नहीं लिया?

अगर सवाल कई हैं तो जवाब भी अनेक और विचार भी अलग-अलग.

1. आंदोलन के पीछे कौन?

इमेज कॉपीरइट ANKUR JAIN

हार्दिक पटेल का ये तर्क कि पटेलों को आरक्षण दो या अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) का आरक्षण वापस लो. उनकी यह मांग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आरक्षण से संबंधित विचारों से मेल खाती है.

मोदी और संघ परिवार जाति के बजाय आर्थिक पिछड़ेपन को आरक्षण का मानदंड बनाने के पक्षधर हैं.

(पढ़ें : सियासी तुष्टीकरण से उपजा पाटीदार आंदोलन)

लेखक और पत्रकार विष्णु पांडिया को इस आंदोलन के पीछे कोई साज़िश नज़र नहीं आती है. लेकिन वो ये स्वीकार करते हैं कि ये आंदोलन एक रणनीति है ब्राह्मण, क्षत्रिय और रघुवंशी जैसे छोटे समुदायों को साथ जोड़ने की.

पांडिया कहते हैं, "अगर ये समाज जुड़ जाते हैं तो ये प्रभावशाली हो सकता है. 25 अगस्त की रैली में केवल पाटीदार (पटेल) नहीं थे बल्कि अन्य ऊंची जाति के लोग भी मौजूद थे."

आरक्षण का मानदंड जाति की बजाय आर्थिक हो ऐसा माहौल बनाने में ये आंदोलन मदद कर सकता है.

मानवाधिकार कार्यकर्ता मनीष जानी के विचार में पटेलों के आंदोलन के पीछे ज़रूरी नहीं किसी का हाथ हो.

जानी कहते हैं, "हमारे देश में धर्म और जाति के नाम पर लोगों को जुटाना कोई मुश्किल काम नहीं है."

2. अचानक आंदोलन क्यों?

इमेज कॉपीरइट AFP

इस आंदोलन के पीछे आर्थिक कारण से इंकार नहीं किया जा सकता. इसमें कोई शक नहीं कि ख़ुशहाल समझा जाने वाला पटेल समुदाय इन दिनों कई तरह की आर्थिक कठिनाइयों का शिकार है.

पटेल समुदाय में किसान हैं, हीरे के व्यापारी हैं और उद्योग से जुड़े लोग हैं. हीरों के व्यापार में मंदी है. किसान मुश्किल में हैं. आत्महत्या के दर्जनों मामले सामने आए हैं और राज्य सरकार पर इल्ज़ाम है कि वो केवल बड़े उद्योगपतियों की मदद करती है. इसके अलावा पटेल समुदाय की युवा पीढ़ी में बेरोज़गारी बढ़ी है.

विष्णु पांडिया राज्य में जाति की राजनीति पर गहरी नज़र रखते हैं. उनका कहना है कि आंदोलन अचानक नहीं शुरू हुआ.

पांडिया कहते हैं, "हार्दिक अचानक नेता नहीं बने हैं. मई में और इससे पहले उसने कई सभाएं की थीं जहाँ पटेलों ने आरक्षण की मांग का समर्थन किया था."

एक अंदाज़े के मुताबिक़ हार्दिक पटेल ने 25 अगस्त की महारैली से पहले छोटी-छोटी 100 रैलियां की थीं. पटेल समाज पूरी तरह से इन सभाओं में शामिल था.

3. जातिय अशांति क्यों?

पिछले 15-20 सालों में गुजरात से बाहर राज्य सांप्रदायिक दंगों के लिए अधिक जाना जाता रहा है जातीय अशांति के लिए नहीं. लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो गुजरात में जाति के आधार पर आंदोलन पहले कई बार हो चुके हैं.

विष्णु पांडिया कहते हैं 1981 और 1985 में पटेल समुदाय ने बड़े आंदोलन किए थे जिनमें दर्जनों लोगों की मौत हुई थी.

पांडिया कहते हैं, "आज वो आरक्षण की मांग के लिए आंदोलन कर रहे हैं. उस समय वो आरक्षण के विरोध में आंदोलन कर रहे थे."

पांडिया कहते हैं कि इस बार के आंदोलन में पटेल समुदाय की युवा पीढ़ी ज़्यादा शामिल है. वो कहते हैं, "इन्हें शिक्षा तो मिलती है नौकरियां नहीं. सरकारी नौकरियां तो हैं ही नहीं. ये ग़ुस्सा इनके मन में चला आ रहा था."

मनीष जानी कहते हैं कि गुजरात में जाति प्रथा पहले से मौजूद है. वो कहते हैं, "गुजरात में जाति प्रथा का हाल ये है कि अब भी 116 जगहों पर दलितों को प्रोटेक्शन मिली हुई है."

जानी के विचार में ये आंदोलन वही चला रहे हैं जो सांप्रादायिक भी हैं.

वो कहते हैं, "आदिवासी विरोधी, महिला विरोधी, दलित विरोधी और मुस्लिम विरोधी होना यहाँ के मध्यम वर्ग के हिन्दुओं की सोच है. जब 1985 का आंदोलन शुरू हुआ तो ये आरक्षण विरोधी था लेकिन बाद में मुस्लिम विरोधी हो गया."

4. 25 अगस्त की रैली की इजाज़त क्यों?

यहाँ आम धारणा ये है कि राज्य सरकार ने 25 अगस्त की रैली का पर्दे के पीछे से पूरा साथ दिया. रैली की इजाज़त दी गई जबकि ये ज़ाहिर है गया था कि हिंसा भड़क सकती है. रैली के लिए दिए गए सरकारी मैदान का किराया नहीं लिया गया.

रैली में अहमदाबाद के बाहर से आने वाले लोगों को नहीं रोका गया. बल्कि संकेत ये मिले कि राज्य सरकार रैली को रोकने की बजाय रैली कराने में मदद कर रही है. लेकिन फिर अचानक शाम आठ बजे हिंसा उस समय भड़क उठी जब पुलिस ने हार्दिक पटेल को हिरासत में ले लिया.

हिंसा शुरू होने के एक घंटे बाद उन्हें रिहा कर दिया गया. ये किसी को नहीं समझ में आ रहा है कि 8 बजे शाम ऐसा क्या हुआ कि अचानक पुलिस हिंसा पर उतारू हो गई? इसका जवाब किसी के पास नहीं है.

हार्दिक पटेल जाति के नाम पर आंदोलन चला रहे हैं. जाति के आधार पर ये पहला आंदोलन नहीं है. ये शायद आख़िरी भी न हो.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार