'बच्चों डरो मत, ख़ुदा को याद करो'

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Image caption समीना अख़्तर आठवीं की छात्रा हैं

नियंत्रण रेखा के निकट मेहदान गाँव के सरकारी मिडिल स्कूल में पड़ने वाली आठवीं कक्षा की समीना अख़्तर सात अगस्त का वो दहशत का पल नहीं भूलती जब उसने जीवन में पहली बार इतनी तेज़ गोलाबारी देखी.

उस पल को याद करते हुए वो कहती हैं, "हल्की हल्की सर्दी में हमारी कक्षा बाहर धूप में लगी हुई थी. हम लोग टीचर को सुन रहे थे कि एक दम से गोलियों की आवाज़ आई. बच्चे डर से कांपना शुरू हो गए और टीचर लोग परेशान कि अब क्या करें."

स्कूल के हेडमास्टर मेहराज ख़ालिद बांदे और टीचरों ने बच्चों को कमरों के अंदर इकट्ठा किया और उनको दीवार के साथ खड़ा होने को कहा.

समीना ने बताया, "हम सब एक दूसरे को डरे और सहमे हुए देख रहे थे. घबराये हुए टीचर हमसे कह रहे थे, 'बच्चों डरो मत ख़ुदा को याद करो.'"

मोर्टार की आवाज़

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धीरे-धीरे गोलियों की आवाज़ में काफ़ी गड़गड़ाहट आ गई. टीचर आपस में कहने लगे, "यह तो मोर्टार है."

समीना को मोर्टार के बारे में तब तक नहीं पता था. उस पल को याद करते हुए समीना ने बताया, "यह बहुत ही ख़ौफ़ज़दा मंज़र था. उस समय दिल काँप रहा होता है उन गोलों की गड़गड़ाहट से दिमाग़ में कोई होश नहीं रहता."

इन बच्चों ने इतनी तेज़ गोलाबारी पहली बार देखी थी.

नवंबर 2003 में भारत और पाकिस्तान के बीच अलिखित संघर्षविराम समझौते के बाद नियंत्रण रेखा और सीमा पर छिटपुट घटनाओं को छोड़ शांति ही बनी हुई थी.

पिछले दो-तीन सालों से संघर्षविराम उल्लंघन की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई थी लेकिन अब तो रिहाइशी इलाक़ों पर भी गोले दाग़े जाने लगे हैं जिनसे जान और माल की काफ़ी क्षति हुई.

भारत और पाकिस्तान दोनों एक दूसरे पर अकारण गोलाबारी शुरू करने का आरोप लगाते रहे हैं.

स्कूल में ही रहे

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उस दिन बच्चे गोलाबारी थमने तक स्कूल में ही रहे. "हमे अपने माता-पिता की याद आ रही थी. गोले तो पूरे इलाक़े पर गिर रहे थे. हम दुआ कर रहे थे कि घर में सब सलामत हो. "

गोलाबारी थमने पर समीना के पिता उसको लेने आए. "उन्हें देख कर मझे कुछ हौसला हुआ और हम जल्दी से घर की तरफ़ भागे जो स्कूल से क़रीब 200 मीटर दूर था. "

बाक़ी बच्चों के भी या तो माता पिता लेने आए या टीचरों ने उन्हें घर तक छोड़ा.

समीना ने बताया कि उस दिन से बंद उनका स्कूल सीधे 24 अगस्त को खुला जब गोलाबारी रुक गई. स्थानीय लोगों के अनुसार सात अगस्त के बाद यहाँ भारी गोलाबारी हुई थी.

समीना कहती हैं, "मेरे वालिद बताते हैं की इतनी सख़्त गोलाबारी नवंबर 2003 के पहले भी कभी नहीं होती थी."

समीना ने बताया की गोलाबारी के दौरान पूरा गाँव (क़रीब 150 लोग) पास में एक बहुत बड़ी चट्टान के पीछे पनाह लेते थे क्योंकि "वहां गोले नहीं पहुँचते थे."

पढ़ाई रुकने का डर

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समीना को इतने दिन स्कूल बंद रहने पर एक बहुत बड़ी चिंता सत्ता रही थी, "क्या मुझे भी पढ़ाई रोकनी पड़ेगी?"

उसके बड़े चचेरे भाई मजीद को भी पढ़ाई रोकनी पड़ी थी. वो पुलिस में भर्ती होना चाहता था परंतु उन दिनों भी भारत और पाकिस्तान के बीच गोलाबारी के कारण स्कूल सही तरह नहीं चलते थे और गोलाबारी के ख़ौफ़ से वो स्कूल जा भी नहीं पाते थे.

मजीद अब पास में स्थानीय ठेकेदार के यहाँ मज़दूरी करता है.

गोलाबारी के कारण नियंत्रण रेखा के निकट स्कूलों को कई दिन बंद रहना पड़ता है. इस से बच्चों की शिक्षा में रुकावट आ रही है.

समीना के पिता सब्जिआन गाँव में मज़दूरी करते हैं.

समीना कहती हैं, "मैं टीचर बनना चाहती हूँ लेकिन यह हाल रहा तो में पढ़ाई के लिए कहाँ जाऊँगी. मेरे वालिद की इतनी कमाई नहीं है कि मैं पूंछ स्कूल जा सकूं."

समीना ने दबी हुई आवाज़ और नम आँखों से कहा, उसका एक छोटा भाई और बहन भी हैं.

शिक्षा का भविष्य

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Image caption स्कूल में बने गोलियों के निशान दिखाते स्थानीय नागरिक

यहाँ के बच्चे हम से सवाल कर रहे थे कि यह गोलाबारी क्यों होती है. इन छूटे-छोटे बच्चों को हम गोलाबारी के पीछे दोनों देशों की राजनीति तो नहीं समझा पाए और न ही बता पाए कि उनकी शिक्षा सही तरह चलेगी या नहीं.

कारण कुछ भी हो इस भारी गोलाबारी के चलते यहाँ शिक्षा प्रभावित हो रही है , सीमवर्ती इलाक़ों में रह रहे बच्चों को अपना भविष्य डगमगाता दिख रहा है.

न केवल पढ़ाई परन्तु गोलाबारी के चलते इस गाँव के लोग लम्बे समय तक भूखे प्यासे रहते थे. गोलियों के चलते लोग खाना नहीं पका सकते थे.

समीना कहती हैं, "हम भूखे प्यासे चट्टान के पीछे छिप कर बैठे रहते थे."

हमने स्कूल के छोटे बच्चों के साथ बात करनी चाही लेकिन उनके चेहरे तो सहमे हुए थे. वो अपनी भावनाओं का इज़हार नहीं कर पाए.

छठी कक्षा का रियाज़ मोहम्मद केवल इतना कह पाया, "मुझे तो समझ नहीं आता कि यह गोलाबारी क्यों होती है."

जान में जान आई

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रियाज़ के दादा मोहम्मद अब्दुल्लाह ने बताया कि सब्जिआन में पिछले दिनों गोलाबारी के दौरान रियाज़ स्कूल में था. इस के माता-पिता किसी रिश्तेदार के घर पूंछ गए हुए थे.

अब्दुल्लाह ने कहा, "रियाज़ को लेकर मेरी मानो साँसे रुक गईं. सख़्त गोलाबारी में मैं तो न बाहर जाने की हालत में था और न ही घबराहट मुझे अंदर रहने दे रही थी. शाम को जब गोलीबारी थमी उस वक़्त मैं घर से बाहर निकला तो आधे रास्ते रियाज़ को एक टीचर के साथ आते देख मेरी जान में जान आई. तब से अब तक रियाज़ स्कूल नहीं गया."

इस गाँव में लोग अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर बहुत चिंतित हैं.

अब्दुल्लाह कहते हैं, "हिन्दुतान और पाकिस्तान दोनों अपनी-अपनी राजनीति में व्यस्त हैं और हम यहाँ बदहाली में जी रहे हैं."

45 स्कूलों में पढ़ाई ठप

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Image caption पूंछ के डिप्टी कमिश्नर निसार अहमद वानी

पूंछ के उपायुक्त निसार अहमद वाणी के अनुसार ज़िला में 90 गाँव गोलीबारी से प्रभावित हुए हैं जिनमें क़रीब 20,000 लोग रहते हैं.

वानी का कहना था "बाक़ी चीज़ों के साथ शिक्षा का निज़ाम भी काफ़ी प्रभावित रहा. लगभग 20 छोटे बड़े स्कूल गोलीबारी के दौरान बंद रहे. लेकिन हम इस में कुछ नहीं कर पाते."

पूरे जम्मू क्षेत्र में पाकिस्तान के साथ सीमा या नियंत्रण रेखा के पास पिछले दिनों गोलाबारी से लगभग 45 स्कूलों में पढ़ाई ठप रही और क़रीब 20 स्कूलों की बिल्डिंग को क्षति पहुँची है.

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