'वन रैंक वन पेंशन बिल्कुल ही नाजायज़ है'

वन रैंक वन पेंशन आंदोलन

वन रैंक वन पेंशन के लागू होने से दो-तीन तरह के आर्थिक बोझ सामने आएंगे हालांकि भारत सरकार ने इस संबंध में कोई आधिकारिक आंकड़ा अभी पेश नहीं किया है.

कुछ लोग इसे वन टाइम आठ हज़ार करोड़ का बोझ बता रहे हैं, तो कोई इसे 10 और 12 हज़ार करोड़ का बोझ बता रहा है.

लेकिन भविष्य में वेतन आयोग के लागू आने के बाद हर साल ये रक़म बढ़कर नौ से 10 हज़ार करोड़ भी हो सकती है.

वन रैंक वन पेंशन पर नितिन गोखले

इसलिए इसे लेकर अभी स्पष्टता नहीं आई है.

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दूसरे लोग भी इसकी मांग कर सकते हैं. रेलवे यूनियनों ने भी वन रैंक वन पेंशन की मांग शुरू कर दी है.

पुलिस और सीआरपीएफ़ वाले भी यह मांग कर सकते हैं इसलिए सरकारी ख़ज़ाने पर यह बोझ बहुत अधिक हो सकता है.

बुरा हाल

दूसरा, फ़ौज में लोग 35 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं. इसके बाद उन्हें नौकरियों में कई जगहों विशेष सुविधाएं भी मिलती हैं.

तो मेरी नज़र में तो यह वन रैंक वन पेंशन बिल्कुल ही नाज़ायज है.

एक बात यह भी है कि चाहे भारत सरकार वन रैंक वन पेंशन स्वीकार करे या ना करे लेकिन उसे मौजूदा बेंच स्कीम भविष्य में होने वाली बहालियों के लिए ख़त्म करनी होगी.

इस स्कीम से सरकार दिवालिया हो सकती है. इसलिए 2004 में सरकार ने दूसरे विभाग के कर्मचारियों के लिए पेंशन स्कीम को रद्द कर दिया और उसकी जगह दूसरी पेंशन स्कीम कंट्रीब्यूट्री पेंशन स्कीम ले आई.

अब सभी के लिए ये कंट्रीब्यूट्री पेंशन स्कीम लाना होगा नहीं तो बहुत बुरा हाल होने वाला है.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस के मैनेजिंग एडिटर सुनील जैन की बातचीत पर आधारित)

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