गीताप्रेस गोरखपुर में छिड़ी है 'महाभारत'

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दुनिया भर में सस्ते मूल्य पर हिंदू धर्म के साहित्य की छपाई और वितरण के लिए प्रसिद्ध और अपने क़िस्म के सबसे बड़े प्रकाशन गृह की पहचान रखने वाले गीता प्रेस के भव्य मुख्य द्वार पर उपनिषद के दो वाक्य अंकित हैं.- ‘सत्यं वद’ और ‘धर्मं चर’.

पिछले 25 दिनों से गीता प्रेस में काम ठप है. श्रमिक और प्रबंधन आमने-सामने हैं और मामला श्रम न्यायालय में तारीख़ पर तारीख़ वाली शैली में खिंचता चला जा रहा है.

हर दिन औसतन 14 लाख रुपये मूल्य की 65 हज़ार से ज़्यादा किताबों की बिक्री करने वाले इस प्रेस का प्रबंध तंत्र अब इस बात पर भी विचार कर रहा है कि प्रेस का कामकाज महाराष्ट्र या गुजरात ले जाया जाए.

हालांकि प्रबंधन से जुड़े लोग ख़ुद मानते हैं की यह ‘आख़िरी विकल्प’ है.

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ताज़ा विवाद की शुरुआत बीते 8 अगस्त को 17 कर्मचारियों के निलंबन और सामूहिक वेतन कटौती के आदेश के बाद हुई.

गीता प्रेस प्रबंधन के मुताबिक़, कर्मचारियों ने सहायक प्रबंधक मेघ सिंह चौहान के साथ दुर्व्यवहार और हाथापाई करने की कोशिश की थी, जबकि कर्मचारी इसे ग़लत बताते हैं.

कर्मचारियों का कहना है कि पहले प्रबंधन ने बिना शर्त वार्षिक वेतन वृद्धि लागू करने की बात कही थी, लेकिन सात अगस्त को जब पता चला की इसके साथ अगले पांच साल वेतन वृद्धि की मांग न करने और मुक़दमों को वापस लेने जैसी शर्तें हैं तो कर्मचारियों ने चौहान से इस बारे में बात की और उनका इस्तीफ़ा माँगा.

कर्मचारियों का दावा है की उनके द्वारा कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ, लेकिन अगले दिन दोपहर बाद नोटिस बोर्ड पर निलंबन और सामूहिक वेतन कटौती की नोटिस लगा दी गई.

पुरानी है विवाद की जड़ें

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अपनी स्थापना के 92 वर्ष पूरी कर रही इस संस्था में हालांकि 1983 में भी 41 दिनों लम्बी हड़ताल चली थी, लेकिन इस बार तल्ख़ी ज़्यादा है.

विवाद की शुरुआत उत्तर प्रदेश के निजी मुद्रणालयों में नियोजित कर्मचारियों से सम्बंधित आदेश से हुई थी. इसके अनुसार, महंगाई भत्ते की गणना कर्मचारी के मूल वेतन पर होनी चाहिए.

कर्मचारियों के मुताबिक़, 1992 के इस आदेश को गीता प्रेस ने नहीं माना. सरकार ने 2006 में नया आदेश जारी किया तो प्रबंधन ने 2008 में इसे आंशिक रूप से लागू किया.

कर्मचारी लेबर कोर्ट चले गए. कर्मचारी चाहते हैं कि उन्हें एक समान वेतन और अवकाश तो दिया ही जाए, साथ ही प्रबंधन द्वारा ऋषिकेश में संचालित संस्थाओं के कर्मचारियों की तरह उन्हें भी पूरे वेतन पर 10 प्रतिशत वृद्धि, 100 रुपए की विशेष वृद्धि और 10 प्रतिशत एचआरए दिया जाए.

कर्मचारी सालाना वेतन वृद्धि को लेकर भी नाराज़ हैं. कर्मचारी नेता मुनिवर मिश्र कहते हैं, “अकुशल-अर्धकुशल और कुशल कर्मचारियों को आज तक 10 से 20 रुपए तक का इनक्रीमेंट मिल रहा है. महंगाई की मार से हम मुक्त हैं क्या?”

पिछले साल दिसंबर में विवाद बढ़ गया और 16 दिसंबर को गीता प्रेस के दरवाज़ों पर ताले लटक गए थे पर दोनों पक्षों के लचीले रुख़ के बाद वहां काम फिर से शुरू हो गया.

प्रबंधन के तर्क

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प्रबंधन के मुताबिक़, पहला आदेश आते ही सभी कर्चारियों के मूल वेतन का निर्धारण कर दिया गया था. 22 वर्षों तक किसी ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की.

2014 में जब विवाद शुरू हुआ तो लेबर कोर्ट ने श्रमिकों को अदालत में मुकदमा दायर करने की सलाह दी थी मगर आज तक कोई वाद भी दायर नहीं किया गया.

प्रबंधन का यह भी दावा है कि अधिकाँश कर्मचारियों को निर्धारित वेतन से अधिक का भुगतान किया जा रहा है क्योंकि उन्हें प्रवर्तनीय महंगाई भत्ते का लाभ भी मिल रहा है.

प्रेस के ट्रस्टी और प्रबंधन के प्रतिनिधि ईश्वर पटवारी कहते हैं, “हम कर्मचारी हितों को लेकर हमेशा से सकारात्मक हैं. हमने इस साल वार्षिक वेतन वृद्धि की मांग भी मानी मगर कुछ लोग विवाद बरकरार रखना चाहते हैं.”

मौजूदा गतिरोध के पेंच

लेबर कोर्ट में दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी है. उम्मीद की जा रही थी कि 1 सितम्बर को गतिरोध दूर हो जाएगा मगर ऐसा नहीं हुआ.

भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार, निलंबित 17 में से 12 स्थाई कर्मचारियों की बहाली पर दोनों पक्षों में सहमति लगभग बन चुकी है लेकिन 5 अस्थायी कर्मचारियों पर गतिरोध बरकरार है.

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अब उन्हें एकमुश्त भुगतान के साथ सेवामुक्त किए जाने के एक विकल्प पर प्रबंधन विचार कर रहा है. हालांकि कर्मचारी इसे लेकर अभी भी अड़े हैं. अब इस मुद्दे पर 4 सितम्बर को वार्ता प्रस्तावित है.

समाधान की राह चाहे जब निकले मगर इसका बुरा असर यहाँ के 200 स्थायी और 337 अस्थायी कर्मचारियों पर ज़रूर पड़ रहा है.

पटवारी कहते हैं, “यह दुखद है मगर काम बंद करने का फैसला कर्मचारियों ने ही लिया था. हम सिर्फ यही चाहते हैं कि अपनी शताब्दी यात्रा के अंतिम वर्षों में यहाँ विवाद का स्थायी साया न रहे.”

उधर मुनिवर मिश्र और उनके साथी चाहते हैं कि हर साल श्रीरामचरित मानस की हज़ारों प्रतियाँ छापने वाला प्रबंधन उसकी एक पंक्ति –‘राम सदा सेवक रुचि राखी‘- पर विचार करें तो वर्षों से यहाँ की यांत्रिक खटपट में ही जिंदगी की लय ढूंढ चुके कर्मचारियों को राहत मिल जाएगी.

और जब तक गतिरोध नहीं टूटता तब तक मुख्य द्वार पर लिखा वह वाक्य अदृश्य प्रश्नवाचक चिह्न बना रहेगा.

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