देश की 10 ट्रेड यूनियनों की हड़ताल

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श्रम क़ानूनों में प्रस्तावित संशोधन के विरोध में देशभर के मज़दूर बुधवार को हड़ताल पर हैं.

सरकार ने मज़दूर संगठनों से हड़ताल पर न जाने की अपील की थी, जिसे ट्रेड यूनियनों ने अनसुनी कर दी.

हड़ताल की वजह से बिजली, परिवहन, बैंक और गैस आपूर्ति जैसी ज़रूरी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं. हालांकि सरकार ने इससे इनकार किया है.

बीएमएस बाहर

हड़ताल में 10 ट्रेड यूनियन शामिल हैं लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का मज़दूर संगठन भारतीय मज़दूर संघ (बीएमएस) इस हड़ताल में शामिल नहीं है.

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Image caption सरकार ने कहा है कि हड़ताल की वज़ह से ज़रूरी सेवाएं प्रभावित नहीं होंगी.

बीएमएस का कहना है कि सरकार ने कुछ मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिया है इसलिए हड़ताल पर जाने से पहले उसे कुछ समय दिया जाना चाहिए.

श्रम क़ानूनों में सुधार को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली के नेतृत्व वाले मंत्री स्तरीय समूह के साथ बैठक में कोई नतीजा न निकल पाने के बाद ट्रेड यूनियनों ने हड़ताल पर जाने का फ़ैसला लिया था.

ट्रेड यूनियनों के मुताबिक़ देश में उनके क़रीब 15 करोड़ सदस्य हैं. इनमें बैंकों और बीमा कंपनियों के कर्मचारी भी शामिल हैं.

सरकार ने कहा है कि हड़ताल का असर आवश्यक सेवाओं पर नहीं पड़ेगा. समाचार एजेंसियों के मुताबिक़ केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने ट्रेड यूनियनों से हड़ताल वापस लेने की अपील की है.

सरकार का इनकार

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वहीं सीपीआई नेता अमरजीत कौर ने बीबीसी संवाददाता समीरात्मज मिश्र को बताया कि 26 मई को आयोजित सम्मेलन में सभी ट्रेड यूनियनों ने हड़ताल पर जाने का फ़ैसला किया था.

उन्होंने बताया कि ट्रेड यूनियनों ने न्यूनतम वेतन 15 हज़ार करने समेत कुछ नीतिगत मसलों पर सुझाव दिए थे. इनमें महंगाई रोकने के उपाय करने, रेलवे, बीमा जैसे क्षेत्रों में एफ़डीआई रोकने और मुनाफ़े में चल रही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में विनिवेश रोकने की मांग की थी, जिसे सरकार ने नकार दिया.

उन्होंने कहा कि पिछली सरकार ने न्यूमतम वेतन 15 हज़ार करने की दिशा में कुछ क़दम उठाए थे. लेकिन यह सरकार इसे और कम करना चाहती है.

कौर ने बताया कि रेलवे को छोड़कर माइनिंग, बंदरगाह और पोत परिवहन, रक्षा, दूरसंचार, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के परिवहन और फ़ाइनेंस क्षेत्र इस हड़ताल में शामिल हैं.

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