शीना हत्याकांड पर शशि थरूर की खरी-खरी

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भारतीय मीडिया पिछले कुछ दिनों से एक रहस्यमय हत्याकांड के पीछे पड़ा हुआ है, लेकिन यह अंधाधुंध कवरेज अनुमानों और संकेतों पर आधारित है जो परेशान करने वाला है.

एक जले हुए कंकाल को खोदकर निकाला गया है. माना जा रहा है कि यह कंकाल एक युवती का है जिसे उसकी माँ ने ही तीन साल पहले गला दबाकर मार दिया था.

इस रईस माँ की तीन बार शादी हुई थी और वो एक टीवी चैनल की मुख्य कार्यकारी अधिकारी थीं. इस महिला ने अपने वर्तमान पति से अपनी बेटी का परिचय बहन बताकर कराया था.

इस कहानी ने 24 घंटे चलने वाले चैनलों पर परोसी जा रही अफवाहों को और मसालेदार बना दिया. लेकिन क्या यह हत्या रहस्य भी है? अगर आप मीडिया पर भरोसा करें तो बिल्कुल नहीं.

पुलिस की ओर से लीक हुई सूचनाओं और 'भौंचक्के बेवफ़ा' दोस्तों से मिली जानकारियों को आधार बनाकर कथित हत्यारे को पहले ही हत्या का दोषी करार दे दिया गया है.

मीडिया ट्रायल

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भारतीय अख़बारों और टीवी चैनलों पर जारी इस कवरेज से आप शायद ही विश्वास करें कि जले हुए अवशेष में इस बात के सबूत नहीं है कि वे उस गायब महिला के हैं.

ये है भारत का असाधारण मीडिया, जिसमें लोकतंत्र का यह चौथा खंभा गवाह, अभियोजक, न्यायाधीश, ज्यूरी और जल्लाद की भूमिका में लगातार बना हुआ है. भारत में प्राचीन काल में अभियुक्त को एक अग्नि परीक्षा देनी पड़ती थी. आजकल ये काम मीडिया के जरिए किया जाता है.

भारत में अधिकांश टीवी न्यूज़ चैनल दर्शक और रेटिंग पाने के लिए दिन-रात प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. सही चीजों की जगह ब्रेकिंग न्यूज़ से सनसनी फैलाकर इन चैनलों ने सार्वजनिक सेवा का दिखावा करना तो बहुत पहले ही छोड़ दिया था.

दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि प्रिंट मीडिया का भी हाल बहुत अच्छा नहीं है. उनके पास टीवी से अलग किसी मामले का परिप्रेक्ष्य, गहराई और उसका विश्लेषण करने की क्षमता है और वो इसके दम पर उस कमी को पूरा कर सकते थे.

रेटिंग की लड़ाई

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लेकिन अख़बार भी मीडिया के कठिन वातावरण में प्रतिस्पर्धा करते दिखते हैं, जहाँ अख़बार नहीं बल्कि टीवी चैनल रफ़्तार तय करते हैं, हर सुबह उस व्यक्ति के पास अख़बार ज़रूर पहुंच जाना चाहिए, जिसने पिछले दिन टीवी देखा था.

लगता है कि कुछ अख़बार अपने प्रतिस्पर्धी टीवी चैनलों से आगे बढ़ने के प्रयास में ख़बर ब्रेक करना चाहते हैं. अधिकांश टीवी चैनल साल भर चलने वाले रेटिंग युद्ध में लगे रहते हैं.

अख़बार प्रतिदिन जागरुकता की जगह कामुकता और अराजकता बढ़ाने वाले बैनर हेडलाइन के जरिए टीवी से बने पाठकों तक पहुंचना चाहते हैं.

अगर नरम शब्दों में कहें तो नतीजे परेशान करने वाले हैं. ख़बरू को प्रसारित करने के प्रयास में हमारा मीडिया फैसला करने की जल्दबाज़ी में है.

यह अक्सर किसी ख़ास वज़ह से किए गए लीक और दुर्भावनापूर्ण आरोपों में जानबूझकर साझीदार बन जाता है, पत्रकारों के पास आज न तो समय है और न ही ख़बर को पुष्ट करने की इच्छा.

बेबुनियाद आरोप

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तथ्यों, अनुमानों, अटकलों, रिपोर्ट, अफ़वाहों, सूचना के स्रोतों और निराधार आरोपों में अंतर होता है. इसे दुनियाभर में पत्रकारिता के छात्रों को सिखाया जाता है. आज की भारतीय मीडिया में यह बहुत धुंधला दिखाई देता है.

मेरी पत्नी की असमय मौत के बाद पिछले डेढ़ साल में बार-बार अटकलें लगाई गईं, गॉसिप लिखे गए और दोषारोपण किया गया. इसके बाद से मैं भारतीय मीडिया की इन सीमाओं से परिचित हो गया हूं.

जिन मामलों में किसी की जिंदगी और मौत जुड़ी हुई है, उन मामलों में कोई व्यक्ति ज़िम्मेदार मीडिया से नियंत्रण और रोकथाम की उम्मीद कर सकता है. लेकिन ऐसा होता नहीं है और आप पर हत्या-आत्महत्या जैसे आरोपों की बौछार हो जाती है.

हमारे पास अवास्तविक और लंबे समय तक खिंचे मीडिया ट्रायल का तमाशा है, जो कि जानबूझकर किए गए 'खुलासों' पर आधारित हैं. इससे टीवी चैनलों पर बिना किसी सबूत या प्राथमिक जांच-पड़ताल के होने वाली परिचर्चा और अधिक भड़कती है.

पक्षपातपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण दावों को प्रामाणिकता पर सवाल उठाए बिना प्रसारित किया जा रहा है.

इस समस्या का एक हिस्सा यह है कि कोई किसी ख़बर को पुष्ट करने या उस पर शोध करने का जोखिम नहीं ले रहा है, ऐसे समय में जबकि बहुत से लोग कहानी का अपना संस्करण दिखाना चाहते हैं.

शेखीबाज़ एंकर

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तथ्यों को दुरुस्त करने को लेकर अनिच्छा की प्रवृत्ति है, जिससे मीडिया वर्ग पूर्णत: अनजान बना हुआ है.

ख्यालों को प्रसारित करना प्रसारण के घंटों को पूरा करने का सबसे सस्ता रास्ता है, इससे शेखी बघारने वाले एंकर सर्वोच्च रेटिंग हासिल करते हैं.

इसका परिणाम यह हो रहा है कि मीडिया में विश्वास खत्म हो रहा है. मेरे एक दोस्त ने इस समस्या को सारगर्भित रूप से संक्षेप में बताया, ''जब मैं युवा था तो मेरे पिता किसी बात पर तब तक विश्वास नहीं करते थे, जब तक कि वह खबर एक विशेष अख़बार में प्रकाशित न हो जाए. लेकिन अगर आज कोई ख़बर उसी अख़बार में छपती है तो वे उस पर विश्वास नहीं करते हैं.''

यह सही सोच वाले सभी भारतीयों के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र के लिए जीवन का आधार है.

वो ऐसी सूचनाएं उपलब्ध कराता है, जो लोगों को यह विकल्प बनाने के लिए सक्षम करता है कि उस पर कौन राज करेगा और कैसे. यह सत्ता में बैठे लोगों को उन लोगों के प्रति जवाबदेह बनाता है जिन्होंने उन्हें वहां बैठाया है.

यह मीडिया का काम है कि वह चुने हुए लोगों के कामकाज (या अकर्मण्यता) पर नज़र रखे, ना कि छोटी-छोटी बातों पर जिसका जनकल्याण पर कोई असर नहीं होता है.

कुंद कुल्हाड़ी नहीं आइना और छुरी

मीडिया सतही और सनसनीखेज महत्वहीन सार्वजनिक बहसों में लगा हुआ है और उसने सजग प्रहरी की भूमिका को स्वेच्छा से त्याग दिया है. लोकतंत्र में मीडिया को सजग प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए. इसने लोगों का ध्यान जवाबदेही के उन सवालों से भी हटा दिया है, जिसे जनता को अपने शासकों से करना चाहिए.

स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र में दोनों भूमिकाओं में है - एक उस मसाले की, जो ईंटों को आपस में जोड़ता है और दूसरा उस खुली खिड़की की, जो उन ईंटों में लगी हुई है. कोई भी लोकतांत्रिक व्यक्ति भारत में स्वतंत्र मीडिया पर प्रतिबंध या नियंत्रण की बात नहीं करेगा. हम कम पत्रकारिता नहीं बल्कि अच्छी पत्रकारिता चाहते हैं.

सरकार को एक स्वतंत्र और पेशेवर मीडिया की ज़रूरत है जो उसे ईमानदार और सक्षम बनाए रख सके जो आइना और छुरी दोनों का काम करे. इसकी जगह अगर हमारे पास एक कुंद कुल्हाड़ी होगी तो समाज की सही सेवा नहीं होगी.

अगर भारत चाहता है कि दुनिया में उसे एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में लिया जाए और 21वीं सदी के लोकतंत्र का मॉडल बनना चाहते हैं तो हमें ख़ुद को गंभीरता और ज़िम्मेदारी से लेना चाहिए. इसकी शुरूआत के लिए हमारा मीडिया एक अच्छा स्थान हो सकता है.

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