'फांसी की सज़ा से कोई डर नहीं पैदा होता'

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विधि आयोग ने फांसी की सज़ा को ख़त्म करने की सिफ़ारिश को सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील प्रशांत भूषण अच्छा मानते हैं.

उनका कहना है कि विधि आयोग ने यह साफ़ किया है कि जब न्यायधीश 'रेयरेस्ट ऑफ दि रेयरेस्ट' के अंतर्गत फांसी की सज़ा सुनाते हैं तो यह पूरी तरह से उनका फ़ैसला होता है.

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बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर कोई दया याचिका राष्ट्रपति के पास जाती है तो यह मौजूदा सरकार के रुख़ पर भी निर्भर करता है.

अफज़ल और याक़ूब

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भूषण का कहना है कि सरकार का चरमपंथी गतिविधियों में अफज़ल गुरु और याक़ूब मेमन को भी फांसी देना ग़लत था.

भूषण कहते हैं, "अफज़ल गुरु का हिंसा में कोई हाथ नहीं था. उस पर टाडा के तहत केस चलाया गया जिसमें षडयंत्र के लिए अधिकतम सज़ा उम्रक़ैद हो सकती है."

वो आगे बताते हैं, "लेकिन यहां समाज की सामूहिक चेतना के नाम पर उसे फांसी दे दी गई."

साथ ही उन्होंने याकूब मेमन मामले में भी हुई फांसी को ग़लत बताया.

उन्होंने कहा, "मेमन का भी हिंसा में कोई हाथ नहीं था और ऐसा लगता है कि मुख्य साज़िश में उसकी भूमिका के कोई पुख़्ता सबूत नहीं थे."

वो कहते हैं, "इसके बावजूद उसे फांसी दे दी गई. शायद सरकार को लगा कि इतना बड़ा हादसा हो गया और किसी न किसी को तो फांसी देना ज़रूरी है.

याक़ूब मेमन तो टाइगर मेमन का भाई है तो क्यों न इसी को फांसी दे दी जाए."

नज़ीर पेश करना मक़सद

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प्रशांत भूषण का कहना है कि सज़ा देने का मक़सद पीड़ित को न्याय देना नहीं होता है.

वो कहते हैं, "जब किसी दोषी को सज़ा दी जाती है तो उसका मक़सद यह होता है कि समाज में एक नज़ीर पेश हो जिससे आगे ऐसा कभी न हो."

उन्होंने आगे बताया, "विधि आयोग ने कहा है कि जितने भी अध्ययन किए गए हैं उनमें साफ़ है कि मौत की सज़ा देने से समाज में कोई अलग से डर नहीं बनता. इसी वजह से कई देशों ने इसे ख़त्म भी कर दिया है."

सरकार फांसी के हक़ में?

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फांसी को लेकर सरकार और आम जनता के रुख़ के बारे में उन्होंने कहा, "मौजूदा सरकार तो पूरी तरह से से फांसी के हक़ में है, लेकिन जनता क्या चाहती है यह कहना मुश्किल है, हो सकता है कि वो भी इसके हक़ में ही हो."

वो आगे कहते हैं, "फांसी की सज़ा का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दुष्प्रभाव यह होता है कि उससे समाज में हिंसा और भीड़ द्वारा न्याय करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है, इसे ख़ून के बदले ख़ून की प्यास भी कहा जाता है."

(प्रशांत भूषण के साथ बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य की बातचीत पर आधारित)

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