'शरीफ़ पाकिस्तान के अकेले मालिक नहीं हैं'

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भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच बैठक के रद्द होने के बाद भारतीय सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान रेंजर्स की महत्वपूर्ण बैठक हो रही है.

13 सितंबर तक चलने वाली इस बैठक में संघर्ष विराम के उल्लंघन, तस्करी और कच्छ के रण में घुसपैठ जैसे मुद्दों पर बातचीत होनी है.

भारत और पाकिस्तान के बीच बनते बिगड़ते रिश्तों का विश्लेषण कर रहे हैं पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक इरफ़ान हुसैन

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भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच बैठक का हाल ही में रद्द होना, दोनों देशों के बीच 'एक क़दम आगे, तीन क़दम पीछे' की प्रक्रिया का ही ताज़ा उदाहरण था.

यह एटमी हथियारों से संपन्न दो पड़ोसी मुल्कों के बीच कूटनीतिक खींचतान को भी दिखाता है.

हालांकि यह उन लोगों के लिए निराशाजनक हो सकता है जिन्हें इस बैठक से कोई उम्मीद थी, लेकिन आख़िरी वक़्त पर ऐसा होना आश्चर्यजनक भी नहीं था.

बैठक का कार्यक्रम नई दिल्ली में तय करना थोड़ी अलग घटना थी और यह भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की इच्छा का संकेत था.

लेकिन इस बैठक का रद्द होना यह भी दिखाता है कि शरीफ़ पाकिस्तान के अकेले मालिक नहीं हैं.

इस बैठक के दौरान कश्मीर के मुद्दे को शामिल करने की पाकिस्तान के अड़ियल रुख से साफ था कि जब भारत से जुड़ी कोई बात होती है तो हमेशा की तरह पाकिस्तानी सेना ही वहां फ़ैसला लेती है.

भारत एक 'विलेन'

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पाकिस्तान में यह आम धारणा है भाजपा के शासन में भारत ख़तरनाक़ रूप से आक्रामक हुआ है.

बॉर्डर पर हर रोज़ होने वाली गोलाबारी को भी भारत द्वारा उकसावे की कार्रवाई के रूप में देखा जाता है.

और कई पाकिस्तानी यह भी मानते हैं कि भारतीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ उनके सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान में राष्ट्रवादी विद्रोह को बढ़ावा दे रही है.

वहीं भारतीय नज़रिए की बात करें तो यहां लोगों को लगता है कि 1993 में मुंबई में हुए बम विस्फोट के लिए ज़िम्मेदार दाउद इब्राहिम को पाकिस्तान ने पनाह दे रखी है.

वहीं 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले में सुनवाई भी बहुत धीमे चल रही है. इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाने वाला संगठन लश्कर-तैयबा के प्रमुख ज़कीउर रहमान लख़वी को ज़मानत पर छोड़ दिया गया है.

इस तरह के आरोप-प्रत्यारोपों से भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी का माहौल और गहराता जा रहा है.

जैसे-जैसे गुस्सा बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे शांति की उम्मीद कम होती जाएगी.

आर्थिक फायदा

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संबंधों को बेहतर करने की इच्छा के पीछे वो आर्थिक फायदा है, जो शांति के कारण मिल सकता है.

सबसे पहली बात यह कि नवाज़ शरीफ़ एक व्यवसायी हैं और वो इस बात को समझते हैं कि पाकिस्तान की कमज़ोर अर्थव्यवस्था अपने से मज़बूत अर्थव्यवस्था से हमेशा टक्कर नहीं लेती रह सकती.

इसके साथ ही पाकिस्तानी सेना का अपने घर में ही तालिबान के ख़िलाफ़ कार्रवाई में लगे रहने से भी समीकरण में बदलाव लाया है.

कबायली इलाकों में सेना को तालिबान के ख़िलाफ़ सफलता तो मिली है, लेकिन उसे बहुत नुक़सान भी उठाना पड़ा है.

पूर्वी सीमा पर सशस्त्र लड़ाई में उसे पूरे ताक़त लगाने की ज़रूरत है, इसलिए इस बात के आसार कम ही हैं कि वो भापत पाक नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी के स्तर को बढ़ाए.

अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति बिगड़ना, तालिबान का और ख़तरनाक होना और नाटो सेना के वहां से जाने के बाद यह बहुत ही ज़रूरी हो गया है कि भारत और पाकिस्तान वहां की बिगड़ती स्थिति के बारे में बातचीत करें.

भारत आक्रामक

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हालांकि भारत सरकार में शीर्ष पदों पर मौजूद लोगों के बयानों से लगा रहा है कि भारत आक्रामक मूड में है.

पिछले कुछ समय से ऐसा लगा रहा है कि भारत कोई भी रियायत देने को तैयार नहीं है क्योंकि उसे लगता है कि पाकिस्तान समस्याओं से घिरा है जल्दी ही हार मान लेगा.

दोनों ही तरफ से इस तरह के रवैये से लगता नहीं है कि वो आने वाले समय में दोस्ती नहीं तो सद्भाव से भी रहने को तैयार होंगे.

दोनों देशों में ऐसे ताक़तवर लोग हैं जो 'युद्ध नहीं, शांति नहीं' की मौजूदा स्थिति को बनाए रखना चाहते हैं.

युद्ध से आर्थिक नुकसान

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लेकिन रक्षा प्रतिष्ठानों का भारी भरकम खर्च, दोनों ही देशों के आर्थिक विकास पर बुरा असर डाल रहा है.

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि दोनों ही देशों का अहम, इतिहास और अंधराष्ट्रवाद उन्हें एक-दूसरे से बातचीत करने से रोकता है.

अगर परिपक्वता और सौहार्द नहीं बन पाया तो डर है कि पाकिस्तान और भारत हमेशा ही दुश्मन रहेंगे.

दोनों ही देशों के पास परमाणु हथियारों का ज़खीरा भी मौजूद है जिसके चलते अगर कोई गलतफ़हमी और गलत अनुमान लगा तो दोनों को ही नुक़सान उठाना पड़ेगा.

हालांकि तनाव कम करने के लिए और आगे फिर ऐसा न हो ये सुनिश्चित करने के लिए बातचीत के आलावा और कोई रास्ता भी नहीं है.

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