'रिलीफ़ कैंप में औरत का नहाना आसान नहीं'

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Image caption अपने परिवार के साथ अब्दुल मजीद

'अगर उस दिन मौत ही आई होती तो अच्छा होता.' यह कहते हुए अब्दुल मजीद डार की आंखों में आँसू छलक आते हैं.

भारत प्रशासित कश्मीर के कुलगाम में गुंड़गाँव के रहने वाले अब्दुल उस दिन को कभी भूल नहीं पाते. ठीक एक साल पहले आई बाढ़ में उनका घर बह गया था.

मजीद की उम्र 55 वर्ष है और वे बीते आठ महीनों से टीन के बने सरकारी आश्रय में अपने परिवार के साथ रह रहे हैं.

बाढ़ की वजह से वो ज़मीन खेती लायक नहीं बची जहां मजीद धान उगाते थे.

सात सितम्बर 2014 को आई भयानक बाढ़ में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और भारी आर्थिक नुकसान हुआ था.

तभी से मजीद के परिवार जैसे 37 परिवार कुलगाम के सरकारी राहत शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं. इसके अलावा 15 परिवार श्रीनगर के तारिमपुरा में भी शिविरों में रह रहे हैं.

मजीद कहते हैं, "यहां इस रिलीफ़ कैंप में एक ही कमरे में पूरे परिवार को रहना पड़ता है. कैंप के पास शौचालय के लिए ट्रेंच (खंदक) बनाए गए हैं, जिनकी बदबू से हमारे बच्चे बीमार हो जाते हैं."

वह कहते हैं, "अभी तक हमारे मकानों के लिए सरकार ज़मीन ढूंढने में भी नाकाम रही है. हमारी जिंदगी तो यहां जहन्नुम बन गई है. जब कभी हम अपने गाँव जाते हैं तो वहां अपने मकानों को खंडहर में तब्दील देख वापस आ जाते हैं."

कैसे बने मकान?

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मजीद कहते हैं, "सरकार की तरफ से अभी तक 1,75,000 रूपए की रक़म मुआवज़े के तौर पर मिली है. लेकिन इतनी कम रक़म से मकान कैसे बनेगा?"

हालांकि सरकार का दावा है कि उन्होंने हर बाढ़ पीड़ित की मदद की है.

कुलगाम के डिप्टी कलेक्टर सईद आबिद के मुताबिक़, "ज़िले में बाढ़ पीड़ितों को अभी तक छह करोड़ रुपए से अधिक की रक़म दी गई है.''

'13 हज़ार ही मिले'

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अनंतनाग के रहने वाले बशीर अहमद वाणी का घर भी पिछले साल सितम्बर में आई बाढ़ से महफूज़ न रह सका.

बशीर का दावा है कि सरकार ने अभी तक मुआवज़े के तौर पर 13,000 हज़ार रूपए ही दिए हैं.

बशीर कहते हैं, "मेरा तीन मंज़िला मकान था. बाढ़ के बाद ज़िंदगी के बुरे दिन देखने पड़ रहे हैं. हम पिछले एक साल से पड़ोसियों के घर सोने जाते हैं."

वो बताते हैं, "मेरे बच्चे रिश्तेदारों के घरों में हैं, पिता कहीं और रह रहे हैं. सरकार ने भी कोई मदद नहीं की.''

औरतों की मुश्किल

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Image caption राहत कैंप में अपने परिवार के साथ गुलाम मोहम्मद

गुंड़गाँव के रिलीफ़ कैंप में 22 साल की क़ौसर जान की कहानी भी ऐसी ही है. वे अपने एक बच्चे और पति के साथ टीन के शेड में रहती हैं.

अपने परिवार की हालत से दुखी और सरकार से नाराज़ क़ौसर कहती हैं, "अगर हम भी उस दिन बाढ़ में बह जाते तो अच्छा होता. हमारे पास कुछ भी नहीं बचा. एक औरत के लिए रिलीफ़ कैंप में नहाना आसान नहीं है."

यहाँ रिलीफ़ कैंप में रहने वाले कुछ बच्चों ने अपनी पढ़ाई भी छोड़ दी है. उनका कहना है कि हालात ऐसे नहीं कि वह अपनी पढ़ाई जारी रख पाते.

श्रीनगर में कभी सब्ज़ी बेचने वाले गुलाम मोहम्मद एक झोपड़ी में अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ रहते हैं. बाढ़ के कुछ दिनों बाद उनका मकान भी गिर गया था.

सरकार ने उन्हें 1,90,000 रूपए का मुआवज़ा दिया लेकिन वह कहते हैं कि 10 लाख से कम में मकान नहीं बनेगा.

गुलाम मोहम्मद कहते हैं, "अब एक ही सपना है कि मेरा मकान बन जाए. क़र्ज़ लेकर मकान के लिए पत्थर और सीमेंट लाया हूं लेकिन अब आगे सरकारी मदद के बिना कुछ नहीं कर सकता."

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