राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री की पाठशाला के सबक

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प्रधानमंत्री तो पिछले साल भी शिक्षक दिवस पर टीचर की भूमिका में थे, सोने पर सुहागा इस बार यह हुआ कि राष्ट्रपति के भीतर सोए पड़े शिक्षक को दिल्ली सरकार ने आवाज़ दी और उन्हें भी बच्चों को पढ़ाने को तैयार कर लिया.

प्रधानमंत्री के लिए दिल्ली में चुने हुए स्कूलों के चुने हुए बच्चे सेना के मानेकशॉ भवन में जमा किए गए. राष्ट्रपति को इतनी दूर भी नहीं जाना पड़ा. राष्ट्रपति भवन परिसर के ही सर्वोदय विद्यालय के ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के छात्र उनकी राजनीति शास्त्र की कक्षा के लिए मौजूद थे.

मानेकशॉ भवन तो पहले से ही सुसज्जित है, राष्ट्रपति की कक्षा देखकर देश के स्कूली बच्चों को रश्क हुआ होगा. उसमें खिडकियों पर पर्दे लगे थे और फ़र्श सिंथेटिक कालीन से ढँका हुआ था लेकिन इस सजी हुई कक्षा में राष्ट्रपति ख़ुद को महामहिम की जगह सिर्फ़ मुखर्जी सर कहलाने की प्यारी ज़िद कर रहे थे.

मानेकशॉ भवन में जमा बच्चों को तो प्रधानमंत्री को सशरीर देखने का सौभाग्य मिला लेकिन देश के बच्चे वंचित न हों, इसके लिए दूरदर्शन, आकाशवाणी और सरकारी एफ़एम को इसके सीधे और अबाधित प्रसारण के आदेश थे. वे तो ख़ैर, सरकारी ठहरे, लेकिन राष्ट्रीय प्रेरणा के वशीभूत लगभग सारे निजी टीवी चैनलों ने भी इसका सीधा और अबाधित प्रसारण किया.

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इस बार उन्होंने विज्ञापनों की भी परवाह नहीं की. लेकिन अगले साल से बच्चों की याददाश्त, उनकी लंबाई बढाने वाले ड्रिंक्स या स्टेशनरी और स्कूली किताबें छापने वाली कंपनियां विज्ञापन के बारे में सोच सकती हैं.

सवाल बच्चों वाले नहीं

प्रधानमंत्री ने एक प्रेरणादायी भाषण दिया, फिर देश के नौ राज्यों में जमा किए गए बच्चों के सवालों के जवाब दिए.

ऐसा लगा कि बच्चों के सवाल बच्चों वाले नहीं थे, वे सरकारी या राष्ट्रीय प्रश्न थे जिन्हें निश्चय ही सावधानी से पहले जांचा-परखा गया था.

मसलन, प्रधानमंत्री की नेतृत्व-क्षमता का राज़, स्वच्छता अभियान, कूड़ा-निपटारा या डिजिटल इंडिया या प्रधानमंत्री के जीवन पर पड़ने वाला सबसे बड़ा प्रभाव.

बच्चो के प्रश्न कैसे होते हैं, यह जानने के लिए बरसों पहले दूरदर्शन की श्रृंखला ‘टर्निंग प्वाइंट’ देखी जा सकती है, जिसमें वैज्ञानिक यशपाल से बच्चे तरह-तरह के सवाल पूछते थे.

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Image caption नरेंद्र मोदी बताते रहे हैं कि वे चाय बेचने वाले से प्रधानमंत्री बने हैं

हमारी स्कूली व्यवस्था वैसे भी बच्चों के सवालों को जगह नहीं देती, भले ही 2005 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या (नेशनल करिकुलम) में बच्चों को सवाल पूछने के लिए आज़ादी का अहसास दिलाना एक मुख्य बात है.

आरएसएस का ज़िक्र न किया

पिछले साल की तरह ही प्रधानमंत्री ने स्वामी विवेकानंद के प्रभाव को स्वीकार किया लेकिन दूसरी जगहों पर जिसे अपनी सबसे बड़ी मातृसंस्था कहते हैं, यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जहाँ उन्होंने असली शिक्षा ली, जिससे उन्होंने नेतृत्व का गुण सीखा, उसका कोई ज़िक्र उन्होंने नहीं किया. तो क्या वे नहीं चाहते कि उनके जैसे शील की शिक्षा के स्रोत तक देश के बाक़ी बच्चे भी जाएँ?

दिलचस्प बात ये भी है कि बच्चों को प्रेरणा देने के बाद प्रधानमंत्री उसी शाम मध्यांचल गए जहाँ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अपने मार्गदर्शकों को अपनी प्रगति से अवगत कराया.

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राष्ट्रपति ने देश के संविधान के बारे में बताया और भारत के जनतंत्र की तारीफ़ करते हुए अपना उदाहरण दिया कि इसी जनतंत्र की खूबी है कि एक साधारण गाँव का बच्चा राष्ट्रपति भवन तक पहुँच गया! प्रधानमंत्री कई बार कह चुके हैं कि उन जैसा चाय वाला प्रधान मंत्री बन सका तो जनतंत्र की बदौलत!

जनतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह नहीं कि कोई साधारण आदमी सबसे शक्तिशाली स्थिति में पहुँच जाए. जनतंत्र वह है जहाँ नागरिकों के पास स्वतंत्र सवाल करने की आज़ादी, सबसे ताक़तवर व्यक्ति की आलोचना करने की आज़ादी (फिर वह राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री), इंसाफ़ पर बराबरी से दावेदारी करने की ताक़त है.

लेकिन जो सरकार नकारात्मक ख़बरों के लिए संचार माध्यमों से जवाब-तलब करे, जन अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों के लाइसेंस ज़ब्त कर ले, वह जनतंत्र के ऐसे नए-नए गुण ही बता सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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