मोदी और अरबपतियों की मुलाक़ात से क्या होगा?

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नामचीन अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार भारत उन देशों में शामिल है जहाँ समाज के हर तबके के विकास पर ध्यान कम है. वैसे डब्लूईएफ़ की ये रिपोर्ट भारतीय अर्थव्यवस्था के थोड़े बेहतर समय पर आती, तो बहस आगे बढ़ाने में मुश्किल होती.

एनडीए नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार को 'भारत का विकास कराने' के वादे पर वोट मिला था और भारतीय उद्योग ने इस नीति पर मुहर भी लगाई थी. लेकिन मंगलवार को दिल्ली में उद्योग जगत से जुड़ी कम से कम 40 हस्तियों ने मोदी और उनके वित्त मंत्री अरुण जेटली की सुनी और फिर अपनी चिंताएं बताईं.

लुढ़कती अर्थव्यवस्था

चीन की डगमगाती अर्थव्यवस्था और गिरे हुए बाज़ारों ने भारत को भी प्रभावित किया है.

ऊपर से रुपए की साख कमज़ोर होने से भारतीय उद्योगपतियों और निवेशी संस्थाओं की चिंताओं का बाँध भी टूटता दिख रहा है. वजह है आर्थिक नीतियों में सुस्ती और सरकार के काम-काज पर राजनीतिक ग्रहण. बाज़ार भरोसे और समर्थन पर चलते हैं और निवेशकों समेत उद्योगपतियों को भी मोदी सरकार से यही आस है.

क्यों हुई पकड़ ढीली

ज़मीन अधिग्रहण बिल और गुड्स और सर्विसेज़ टैक्स (जीएसटी) जैसे क़ानून अधर में लटके हुए हैं.

गैस की कीमतों पर सरकारी रुख और सब्सिडी के मामले पर अब भी कयास ही लग रहे हैं. मोदी सरकार को इस बात पर भी सफ़ाई देनी पड़ सकती है कि अभी तक कॉरपोरेट टैक्स के मसले पर स्थानीय और विदेशी निवेशकों को कितनी राहत मिलेगी.

अमरीका में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और पिछले कुछ महीनों में सरकार और आरबीआई गवर्नर के बीच ब्याज दरें बढ़ाने या घटाने पर समान राय तक नहीं दिखी है.

उम्मीद की किरण?

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प्रधानमंत्री मोदी ने चीन की डगमगाती अर्थव्यवस्था को भारत के लिए एक निर्णायक मौके की तरह ही देखा है.

लेकिन भारतीय उद्योगपतियों को चिंता इस बात की भी है कि विदेशी निवेश लाने के लिए व्यापार के नियमों में ढील बढ़नी चाहिए. भारतीय रियल एस्टेट में भी निरंतर आ रही मंदी के दौर को संभालने के लिए भी बैंकों, उद्योगों और शेयर बाजार को सरकार से ठोस कदमों की दरकार है. उद्योग जगत ने मोदी सरकार से कृषि पर ध्यान देने के अलावा खपत बढ़ाने की ओर भी इशारा किया है.

इस असमंजस वाली स्थिति में भारत में निचले स्तर पर मौजूद समावेशी विकास संबंधी डब्लूईएफ़ की चिंताएं भी वाजिब ही जान पड़ती हैं.

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