आप भी बीमारी में झट एंटी-बायोटिक खाते हैं?

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दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक अमरीका के प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के शोध में पिछले वर्ष बताया गया था कि भारत में चीन से भी ज़्यादा एंटी-बायोटिक दवाओं का इस्तेमाल हो रहा है. इस शोध के अनुसार भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका में पिछले 10 वर्षों में इन दवाओं के प्रयोग में 36% का इज़ाफ़ा हुआ है. इस शोध के लगभग एक वर्ष बाद भारत सरकार अब डॉक्टरों के एंटी-बायोटिक देने और उनकी 'बेलगाम' बिक्री पर रोक लगाने पर गंभीर दिख रही है.

जब ये नियम लागू होंगे तब दवा की दुकानों को एंटी-बायोटिक बेचने का हिसाब रखना होगा और बिना डॉक्टर के पर्चे इन्हें बेचने पर पाबंदी लगाई जाएगी.

डब्लूएचओ की चिंताएं

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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी बुधवार को भारत समेत सभी दक्षिण एशियाई देशों को एंटी-बायोटिक के अत्यधिक प्रयोग से बचने की चेतावनी दी है. डब्लूएचओ के अनुसार सामान्य बीमारियों के इलाज में एंटी-बायोटिक के बेलगाम प्रयोग से कैंसर जैसी बड़ी बीमारियों के इलाज में दिक़्क़त आ रही है.

बीबीसी हिंदी को दिए एक बयान में डब्लूएचओ की रीजनल डायरेक्टर पूनम खेत्रपाल सिंह ने कहा कि एंटी-बायोटिक दवाओं के असर में निरंतर गिरावट आ रही है.

उन्होंने कहा, "देशों को अपने अस्पतालों को इन्फ़ेक्शन रहित बनाना होगा और दवाओं के उपयुक्त प्रयोग को लेकर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है."

नए नियम

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स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार भारत में दवाओं की नियामक संस्था 'ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया' ने एंटी-बायोटिक की बेलगाम बिक्री और प्रयोग से निपटने के लिए नए नियम तैयार कर लिए हैं. जानकारों के अनुसार इससे निपटना अनिवार्य है क्योंकि जहाँ दूसरे देश दवाओं के कम होते असर से जूझ रहे हैं, भारत में समस्या एंटी-बायोटिक के गिरते असर की है जो घातक हो सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रति वर्ष दवाओं के कम होते असर से संबंधित मौतों की संख्या 700,000 पहुँच रही है.

दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ डॉक्टर के अनुसार भारत में एंटी-बायोटिक के घटते असर का सबसे ज़्यादा ख़मियाज़ा महिलाओं और बच्चों को भुगतना पड़ रहा है.

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