सेना पर बढ़ेगा कश्मीरियों का विश्वास?

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साल 2010 में उत्तरी कश्मीर के माछिल में तीन युवकों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारने के मामले में सेना के छह जवानों को उम्र क़ैद दिए जाने की पुष्टि नॉर्दर्न आर्मी कमांडर ने कर दी है.

इसके बाद कश्मीर के कुछ हलक़ों में उठ रही आशंकाएं शांत हो गई हैं.

पिछले साल नवंबर में कर्नल दिनेश पठानिया, कैप्टेन उपेंद्र, हवलदार देवेंद्र कुमार, लांस नायक लक्ष्मी, लांस नायक अरुण कुमार और राइफ़लमैन अब्बास हुसैन को समरी जनरल कोर्ट मार्शल (एजीसीएम) ने दोषी पाया था और उम्रक़ैद की सज़ा दी थी.

एसजीसीएम के सज़ा सुनाए जाने के बावजूद स्थानीय लोगों को इस फ़ैसले पर अमल किए जाने को लेकर भारी संदेह था.

स्वागतयोग्य फ़ैसला

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अब उत्तरी कमांड के कमांडिंग अधिकारी लेफ़्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा के एसजीसीएम के फ़ैसले की पुष्टि किए जाने के बाद तीनों युवकों (जो फ़र्ज़ी एनकाउंटर में मारे गए थे) के परिजनों और आम लोगों ने राहत की सांस ली है कि आख़िरकार इंसाफ़ हो गया है.

मारे गए युवकों के परिजन मौत की सज़ा की मांग कर रहे थे. उनका कहना था कि इस मामले के अभियुक्त अधिकारियों ने अपनी आधिकारिक ताक़त का इस्तेमाल करते हुए जानबूझकर उनके बच्चों की हत्या की है.

अपनी तरह के इस पहले फ़ैसले का आम लोगों ने स्वागत किया जिन्होंने पहले मानवाधिकार उल्लंघन में शामिल सैनिकों और सुरक्षाकर्मियों को आज़ादी से घूमते देखा है.

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सीपीआईएम के राज्य सचिव और कुलगाम के विधायक एमवाई तारिगामी कहते हैं, "यह बहुत स्वागतयोग्य फ़ैसला है. आख़िरकार सेना को यह अहसास हो गया कि 2010 में माछिल में कुछ बहुत ग़लत हुआ था. यह फ़ैसला आम आदमी की नज़रों में सेना की विश्ववसनीयता को बढ़ाएगा."

'खंडित न्याय'

तारिगामी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हर संस्था को क़ानून के दायरे के भीतर रहकर काम करना चाहिए और हर हाल में इंसाफ़ मिलना चाहिए.

वे उम्मीद करते हैं कि कई और मामलों (जिनमें पथरीबल मुठभेड़ शामिल है) को उनकी तार्किक परिणति तक ले जाना चाहिए और इंसाफ़ मिलना चाहिए.

हालांकि कुछ लोग यह भी मानते हैं कि यह फ़ैसला 'खंडित न्याय' भर है.

अवामी इत्तेहाद पार्टी के अध्यक्ष और लांगेट के विधायक शेख अब्दुल राशिद कहते हैं, "मैं मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ हूं लेकिन अगर यह प्रचलन में है तो इन छह हत्यारों को फ़ांसी की सज़ा क्यों नहीं मिली."

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राशिद का मानना है कि छह लोगों को उम्रक़ैद की सज़ा से यह साबित हो गया है कि इन्होंने माछिल के तीन युवकों की हत्या की थी इसलिए ये दया के पात्र नहीं हैं.

वो कहते हैं, "अगर आप अफ़ज़ल गुरु और याक़ूब मेमन को फ़ांसी दे सकते हैं जिनकी उन मामलों में सीधी संलिप्तता नहीं थी जिनमें वह गिरफ़्तार थे तो इन छह सैनिकों को क्यों नहीं."

"इन सैनिकों से लोगों की रक्षा करने की उम्मीद की जाती है, और अगर ये लोगों की जान लेने लगते हैं तो अपराध ज़्यादा जघन्य हो जाता है."

माछिल फ़र्ज़ी मुठभेड़

ये मामला 30 अप्रैल, 2010 को सामने आया था जब सेना ने तीन युवकों की लाशें दिखाईं और दावा किया कि वो चरमपंथी थे जो हथियार और गोला-बारूद के साथ उत्तरी कश्मीर के माछिल के पहाड़ी इलाक़ों से घाटी में घुसने की कोशिश कर रहे थे.

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बाद में यह दावा भी किया गया कि वो पाकिस्तानी चरमपंथी थे.

बाद में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने यह साबित कर दिया कि वो बारामुला ज़िले के नादीहाल के रहने वाले बेरोज़गार युवक मोहम्मद शफ़ी, शहज़ाद अहमद और रियाज़ अहमद थे.

उन्हें नौकरी देने के नाम पर इन सैनिकों ने बहका कर लाया था और बाद में गोली मार दी गई थी.

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पुलिस ने जुलाई 2010 में चार्जशीट दायर की जिसमें सेना के छह जवानों समेत नौ लोगों को अभियुक्त बनाया गया था.

लेकिन बाद में यह जांच सेना को सौंप दी गई जिसने इस मामले की विस्तृत जांच का भरोसा दिलाया था.

इस फ़र्ज़ी मुठभेड़ के बाद कश्मीर घाटी में ज़बरदस्त प्रदर्शन हुए जिनमें 123 लोगों की मौत हो गई थी.

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