अमिताभ को बुलाने पर ऐतराज़ ग़लत

इमेज कॉपीरइट KBC

आदर, आदाब, अभिनंदन, आभार, मैं हूँ अमिताभ बच्चन और ये है सप्तकोटि महासम्मान कौन बनेगा महाकरोड़पति.

टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति की शुरुआत में आप सब ‘देवियों और सज्जनों’ का स्वागत करने का अमिताभ बच्चन का अंदाज़ लोगों में कितना मशहूर है, इसकी झलक मैंने कई बार पार्क में खेलते बच्चों में देखी है- जहाँ छोटे बच्चे बच्चन के अंदाज़ में केबीसी के उनके जुमले दोहराते हैं.

बीबीसी में हमारे उर्दू सेवा के साथियों के साथ बातचीत में गाढ़ी हिंदी के शब्द ज़बान पर आ जाते हैं. लेकिन इसके पहले कि हम शब्दों का उर्दू अनुवाद ढूँढे उधर से जवाब आता है, रहने दीजिए हम तो अमिताभ बच्चन का अभिनंदन भी समझ लेते हैं.

इमेज कॉपीरइट AMITABH BACHCHAN FB PAGE

इस लंबी चौड़ी भूमिका बाँधने का मतलब ये है कि हिंदी की हालत पर छिड़ी बहस के बीच हिंदी को बनाए रखने में हिंदी फ़िल्मों, टीवी सीरियलों और कुछ गिने चुने कलाकारों के रोल पर बात करना.

इसमें अमिताभ बच्चन का ख़ास ज़िक्र इसलिए कि आज की तारीख़ में वो उन चुनिंदा फ़िल्मी कलाकारों में से हैं जो हिंदी में सहज महसूस करते हैं, हिंदी परिवेश में पले बढ़े हैं, हिंदी में सवाल पूछने पर हिंदी में जवाब देते हैं.

वरना पिछले 10 साल के पत्रकारिता के करियर में ऐसा बहुत कम हुआ जब किसी हिंदी फ़िल्मी हस्ती से हिंदी में सवाल पूछा हो और पहली बार में ही हिंदी में जवाब मिला हो -जब तक कि बीच में टोकते हुए हिंदी में बात करने की गुज़ारिश न की हो.

हिंदी समाज ने हिंदी के लिए क्या किया?

इमेज कॉपीरइट VIPUL GUPTA

भोपाल में हिंदी सम्मेलन पर अमिताभ बच्चन को बुलाए जाने पर सवाल उठ रहे हैं.

पर क्या इस पर सोचने की ज़रूरत नहीं है कि क्यों और कब हिंदी साहित्य युवा पीढ़ी से दूर होता गया कि उसे फ़िल्मी सितारे की ज़रूरत आ पड़ी. हिंदी फ़िल्मों में इस्तेमाल होने वाली हिंदुस्तानी भाषा ने शायद अनजाने में ही सही पर इस खाई को भरने की कोशिश की है.

इसमें फ़िल्मों के संवाद लेखक, गीत के बोल लिखने वाले सैकड़ों नामी और गुमनाम गीतकार शामिल हैं. सिर्फ़ अमिताभ बच्चन का नाम शायद इसलिए सामने आता है क्योंकि वो बड़ा चेहरा हैं जो पर्दे पर दिखता है और लोकप्रिय हैं.

हिंदी को बचाना शायद सिनेमा या किसी एक कलाकार की ज़िम्मेदारी नहीं है फिर चाहे वो हरिवंश राय बच्चन के बेटे ही क्यों न हों. ऐसा होता तो अमिताभ शायद कवि या लेखक होते. लेकिन उनका काम मनोरंजन करना है.

हिंदी को बॉलीवुड का सहारा

इमेज कॉपीरइट yash raj films

मुझे नहीं याद जब किसी फ़िल्मी कलाकार ने या अमिताभ बच्चन ने आकर कहा हो कि मेरा मक़सद आपको हिंदी सिखाना है.

लेकिन अनजाने में ही सही पर वो ऐसा कर रहे हैं. जब वो केबीसी में धाराप्रवाह हिंदी बोलते हैं, जब सुबह फ़ेसबुक या ट्विटर खोलो तो अक्सर हिंदी में लिखी कविताएँ, दोहे, पंक्तियाँ अमिताभ बच्चन के पेज पर दिखती हैं. आज की सोशल मीडिया जेनरेशन को हिंदी से जोड़ने का ये कहीं उम्दा तरीक़ा है बजाए कि हिंदी पर उबाऊ तरीक़े से सेमीनार करना.

हिंदी दिवस पर साहित्यकारों को नज़रअंदाज़ किए जाने से नाराज़गी अपनी जगह जायज़ है.

इमेज कॉपीरइट srbachchan

हिंदी के प्रचार-प्रसार में साहित्य और साहित्यकारों की जगह से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन पूछने वाले फिर ये भी पूछेंगे कि नई पीढ़ी तक पहुँचने के लिए आपने क्या किया और अगर किया तो उसमें कहाँ कमी रही जो नई पीढ़ी इससे दूर जाती दिखती है.

हाँ ये सवाल ज़रूर है कि अमिताभ बच्चन की जगह शायद नंदिता दास जैसे नाम को भी बुलाया जा सकता था जो ख़ुद बहुत अच्छी हिंदी बोलती हैं. पर मक़सद अगर नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने का है तो बच्चन इस खाँचे में फिट बैठते हैं- फ़िलहाल उनकी जैसी लोकप्रियता कम ही लोगों को हासिल है.

उनको बुलाने में राजनीति का कितना घालमेल है वो अलग बहस का मुद्दा हो सकता है.

बच्चन नहीं हिंदी है मुद्दा

इमेज कॉपीरइट amitabh bachchan fb

अगर व्यक्ति विशेष से ऊपर उठकर हिंदी पर लौटें तो हिंदी को बोलचाल में बनाए रखने का श्रेय हिंदी फ़िल्मों के अलावा हिंदी ख़बरिया चैनलों को भी जाता है. भयानक, औपचारिक, आरोप-प्रत्यारोप, प्रकोप- ये सब आपके लिए सामान्य हिंदी के शब्द हो सकते हैं लेकिन इमोजी, लोल जैसे शब्दों में बात करने वाली नई पीढ़ी इस लहजे और शब्दों में बात नहीं करती.

लेकिन एक तब्दीली मैंने पिछले कुछ समय से देखी है जहाँ युवाओं को हिंदी के इन शब्दों का इस्तेमाल करते सुना. पूछने पर कइयों ने मुझसे कहा, "आप लोग दिन पर न्यूज़ चैनलों पर इन्हीं शब्दों से हमारा सर खाते हैं, वहीं से सीखा है." किसी ने मुझे ये नहीं कहा कि उन्होंने ये हिंदी किताबों से सीखी है.

यहाँ तक कि इडियट बॉक्स पर एकता कपूर के सास-बहू सीरियलों ने भी थोड़ा बहुत योगदान दिया है युवा पीढ़ी में हिंदी को बनाए रखने में .

जहाँ तक अमिताभ बच्चन की बात है तो उन्हें लेकर कई तरह के सवाल पहले भी उठते रहे हैं लेकिन यहाँ मुद्दा बच्चन नहीं है.

मुद्दा हिंदी को सजाने, संवारने का है. पर क्या हिंदी समाज इसमें सफल रहा है? अगर ‘तुमसे न हो पाएगा’ की तर्ज़ पर पूछें तो जो तरीक़ा फ़िलहाल कारगर साबित हो रहा है उस पर अमल करने से ऐतराज़ क्यों जब तक कि इससे कारगर तरीक़ा आपके पास न हो.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)