'गोमांस बेचकर पेट पालते हैं, भूखे मर जाएँगे'

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Image caption अबदुल रहमान पिछले चालीस सालों से गोश्त का कारोबार कर रहे हैं.

कश्मीर घाटी में अलगाववादी नेताओं ने गोमांस पर प्रतिबंध के खिलाफ 12 सितंबर को बंद का आह्वान किया है.

भारत प्रशासित कश्मीर में बुधवार को हाई कोर्ट ने गोमांस बेचने पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया था.

श्रीनगर के परिमपोरा में गोमांस की दुकान चलाने वाले अब्दुल रहमान पिछले 40 वर्ष से गोश्त का कारोबार कर रहे हैं.

रहमान कोर्ट के गोमांस पर प्रतिबंध के आदेश से बहुत निराश हैं.

वह कहते हैं, " मैं बचपन से देख रहा हूं कि यहाँ हर कोई गोमांस खाता है. ये हमारे धर्म में भी हलाल है, जैसे भारत में सूअर का गोश्त उनके लिए हलाल है, उसी तरह हमारे लिए गाय का गोश्त है. इस कारोबार से हम अपने परिवार को भी पालते हैं. हमारा कारोबार ही यही है. पाबंदी से न सिर्फ मेरा परिवार बल्कि जितने भी इस कारोबार से जड़े हैं, भूखे मर जाएंगे. इस कारोबार के साथ लोगों की बहुत बड़ी तादाद जुड़ी हुई है. अब हम देखते हैं कि हमारे लिये क्या सोचा जाएगा."

धर्म में दख़ल

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Image caption क़ाज़ी यासिर अहमद का मानना है कि गोमांस पर पाबंदी का मतलब है कि उनके धर्म में हस्तक्षेप किया जा रहा है.

अलगाववादी नेता और दक्षिणी कश्मीर के मीरवाइज क़ाज़ी यासिर अहमद ने बीबीसी हिंदी को बताया कि गोमांस पर जम्मू और कश्मीर में पाबंदी का मतलब है कि धर्म में हस्तक्षेप किया जा रहा है.

वे बताते हैं," हमारे लिए ये खबर हैरान कर देने वाली है कि जम्मू और कश्मीर में गोमांस पर प्रतिबन्ध लगाने का आदेश जारी किया गया है. अगर हमारे धर्म में शराब हराम है तो उस पर पाबंदी नहीं लगायी जाती. अगर हिन्दू धर्म में कोई चीज़ हराम है तो उस को हम पर क्यों लागू किया जाता है?

उन्होंने कहा, "जो चीज़ अल्लाह और क़ुरान ने हमारे लिये हलाल की है, उसे दुनिया की कोई ताक़त हम पर हराम नहीं कर सकती. यही वजह थी कि वर्ष 1996 में जब उस समय के गवर्नर ने किसी ख़ास दिन पर गौ हत्या को जुर्म क़रार दिया था तो मेरे शहीद पिता क़ाज़ी निसार ने गौ की हत्या भरे बाजार में की थी, जो क़दम बाद में एक आंदोलन की शक्ल में सामने आया. अब हमें भी मजबूर किया जा रहा है कि हम कश्मीर के हर चौक में एक जानवर ले के निकलें."

'हमारे धर्म में हराम नहीं'

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Image caption श्रीनगर के अब्दुल मजीद कहते हैं कि गाय का गोश्त ग़रीब लोग खाते हैं. इस पर पाबंदी नहीं होना चाहिए.

हालांकि श्रीनगर बमिना के रहने वाले अली मुहम्मद गोश्त नहीं खाते, लेकिन उन्हें भी जम्मू-कश्मीर में गोमांस पर पाबंदी के आदेश पर आपत्ति है.

वे कहते हैं," मुझे आज ये सुन कर दुख हुआ कि कश्मीर में गोमांस पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है. मैं खुद नहीं खाता, लेकिन मेरे घर में या दूसरे लोग खाते हैं. हमारा धर्म गौ वध की इजाज़त देता है, इस पर पाबंदी नहीं होनी चाहिए."

श्रीनगर के अब्दुल मजीद की नज़र में गोमांस पर पाबंदी उनके धर्म पर हमला है.

उनका कहना है, "हमारे धर्म में गाय का गोश्त खाना हराम नहीं है. हम क्यों नहीं खाएं? यहाँ के ग़रीब लोग गाय का ही गोश्त खाते हैं, क्योंकि ये सस्ता है. ग़रीब लोग शादियों में भी इसी गोश्त का इस्तेमाल करते हैं. हमारे लिए गोमांस खाना हलाल है, हम इसे बंद नहीं कर सकते."

अब्दुल मजीद का तर्क है, "मैं तो 40 साल से ये गोश्त खा रहा हूं. मुझ पर आज तक किसी बीमारी ने हमला नहीं किया. हमारे कश्मीर में तो हरेक चीज़ पर प्रतिबंध लग जाता है, ऐसा क्यों?"

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