श्रीनगर: हाफ़ मैराथन में 'आज़ादी' के नारे लगे

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भारत प्रशासित कश्मीर में रविवार को 'अंतरराष्ट्रीय हाफ़ मैराथन ' के शुरू होने के साथ ही कुछ युवकों प्रदर्शन किया और 'आज़ादी' के नारे लगाए.

लोगों ने हाफ़ मैराथन स्थल के नज़दीक पथराव भी किया जिसके बाद अफरा-तफरी मच गई. इसके बाद हाफ़ मैराथन में हिस्सा लेने आए लोग वापस जाने लगे.

वर्ष 2012 में ज़ुबिन मेहता के शो 'एहसास-ए-कश्मीर' का भी कश्मीर में विरोध किया गया था और एक दिन की हड़ताल भी हुई थी.

12 लोग हिरासत में

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पुलिस का कहना है कि जिन लोगों ने हाफ़ मैराथन के दौरान हंगामा किया वो लड़कियों को छेड़ रहे थे और इनके खिलाफ़ केस दर्ज किया गया है.

पुलिस ने अभी तक 12 युवकों को हिरासत में लिया है.

'अंतर्राष्ट्रीय हाफ़ मैराथन ' के आयोजक 97.2 श्रीनगर बिग एफ़ एम श्रीनगर के मुताबिक हाफ़ मैराथन के लिए तक़रीबन 20 से 30 हज़ार लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवाया था और 15 अंतरराष्ट्रीय हाफ़ मैराथन खिलाड़ियों ने भी हिस्सा लिया.

97.2 बिग एफ़ एम श्रीनगर स्टेशन के निदेशक मज़ाफर शाह ने बीबीसी को बताया," हम नहीं समझते कि हमारी पहल नाकाम हुई बल्कि सफल रही, ये अलग बात है कि कुछ शरारती लोगों ने प्रोग्राम के दूसरे भाग में हंगामा किया."

'कश्मीर में क्या सब कुछ ठीक है?'

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हाफ़ मैराथन में मची अफरा तफरी के दौरान नारे लगा रहे एक प्रदर्शनकारी ने बताया, " एक तरफ तो कश्मीर जल रहा है, दूसरी तरफ ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं, जिसका मक़सद सिर्फ दुनिया को ये बताना होता है कि कश्मीर में सब कुछ ठीक है. क्या कश्मीर में सब कुछ ठीक है, आप ही बतायें ?"

वहीं मैरथन में हिस्सा लेने आए 60 वर्षीय अली मोहम्मद का कहना था, "मैं पिछले सात साल से हर दिन दौड़ लगाता हूँ और जब मैंने सुना कि हमारे कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय हाफ़ मैराथन हो रहा है तो मैं भी आया. जबकि मेरा ऑपरेशन हुआ है. मैं चाहता हूं कि इस तरह के कार्यक्रम कश्मीर में होने चाहिए."

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भारत प्रशासित कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट कर कहा है कि वे भी हाफ़ मैराथन में हिस्सा लेना चाहते थे लेकिन उन्हें ऐसा न करने की हिदायत दी गई थी. उन्होंने कहा कि ये दुखद है कि ऐसे कार्यक्रम को लेकर राजनीति हुई.

'ऐसे कार्यक्रम गुस्सा दिलाते हैं'

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विश्लेषक कश्मीर में ऐसे कार्यक्रम करने को एक ऐसा क़दम बताते हैं जो कश्मीर की आम जनता को गुस्सा दिलाता है.

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक मक़बूल साहिल बताते हैं, " कश्मीर में इस तरह के शो करना दरअसल ये बताने की कोशिश होती है कि सब कुछ सामान्य है. ऐसा करना तो उन ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के बराबर है जो कश्मीरियों को पिछले 27 सालों में लगे हैं."

उन्होंने आगे कहा, "कश्मीर में आज भी काले क़ानून हैं तो फिर सब कुछ यहाँ ठीक कहाँ है? जो लोग ऐसे शो आयोजित करते हैं उनके पीछे सरकारें होती हैं और जो आज़ादी के नारे लगाते हैं उनको कौन आयोजित करता है?"

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