वाघा परेड: ऊंची नाक के लिए टूटते घुटने

भारत-पाकिस्तान सीमा पर बीटिंग रीट्रीट इमेज कॉपीरइट RAVINDER SINGH ROBIN

भारत-पाकिस्तान के बीच वाघा-अटारी सीमा पर रोज़ाना शाम को होने वाली ड्रिल का सैनिकों के स्वास्थ्य पर काफ़ी बुरा असर पड़ता है.

दोनों देशों के सैनिक सीमा पर अपने-अपने देश का झंडा उतारने की ड्रिल यानी बीटिंग रिट्रीट करते हैं.

इसे काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर किया जाता है और इसके ज़रिए एक तरह से ताक़त दिखाने की कोशिश की जाती है.

रोमांचक क्षण

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इसे देखने के लिए सीमा के दोनों ओर सैकड़ों लोग जमा होते हैं. यह उनके लिए काफ़ी रोमांचक क्षण होता है और वे अपने-अपने देश के सैनिकों का हौसला भी बढ़ाते हैं.

ज़ोर-ज़ोर से पैर पटकने और अपने पैरों को काफ़ी ऊंचाई तक उठाने से सैनिकों के घुटनों पर ज़ोर पड़ता है. कई बार उनके पैरों में चोट भी लग जाती है.

अमृतसर के अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉक्टर अवतार सिंह ने बीबीसी को बताया कि पैर में चोट लगने के बाद कई बार सैनिकों को इलाज के लिए उनके अस्पताल में दाख़िल कराया गया है.

पैरों में चोट

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डॉक्टर अवतार सिंह कहते हैं, "एक सैनिक जब अपने पैर काफ़ी ऊंचाई तक उठाने के बाद उसे तेज़ी से ज़मीन पर पटकता है तो उसका पैर टूटने की काफ़ी आशंका होती है. उसके घुटने ख़राब भी हो सकते हैं."

उन्होंने यह भी बताया कि ड्रिल के दौरान सैनिकों के पांव में मोच आना आम बात है.

इस तरह के लक्षणों को डॉक्टरी भाषा में 'पटेलो फ़ीमोरल पेन', 'टिबियल स्ट्रेस फ़्रैक्चर' और 'इलियोटिबियल बैंड सिंड्रम' कहते हैं.

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इस तरह की समस्याएं ज़्यादा दौड़ने, साइकिल चलाने, पहाड़ पर चढ़ने, ऊंचाई से तेज़ी से ज़मीन पर पांव पटकने और मिलिट्री ड्रिल से होती हैं.

कुछ सैनिकों के घुटने के जोड़ ख़राब हो गए और कुछ की रीढ़ की हड्डी में तक़लीफ हुई.

रबड़ की सड़क?

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इस ड्रिल में भाग लेने वाले बीएसएफ़ के एक जवान ने बीबीसी को बताया कि किसी सैनिक को चोट लगने पर उसे कुछ समय के लिए छुट्टी मिल जाती है और उसकी जगह दूसरा आ जाता है.

वे कहते हैं कि हर 10 दिन में एक-दो जवान घायल होते हैं. इसके साथ ही वे यह भी कहते हैं कि यह ड्रिल उनकी नौकरी का एक हिस्सा है और उन्हें इसमें भाग लेने से कोई गुरेज़ नहीं है.

बीएसएफ़ के जवान का यह भी मानना है कि जब सीमा पर जुटे लोग तालियां बजाते हैं और नारे लगाते हैं तो उनका मन ख़ुश हो जाता है. उन्हें लगता है मानो पुरस्कार मिल गया हो.

डॉक्टरों ने सेना को सलाह दी है कि सीमा पर जिस जगह यह ड्रिल होती है, वहां रबड़ की सड़क बनवा दी जाए. ऐसा होने से सैनिकों को चोट नहीं लगेगी.

'ड्यूटी का हिस्सा'

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पंजाब फ्रंटियर के इंस्पेक्टर जनरल अनिल पालीवाल का तर्क है कि हर देश की सेना इस तरह के ड्रिल करती है. यह उनकी ड्यूटी का हिस्सा है.

वे यह भी कहते हैं कि एक ही टीम साल भर वाघा पर नहीं रहती है, उनकी ड्यूटी बदलती रहती है. इसलिए किसी एक सैनिक या टुकड़ी पर ही सारा दबाव नहीं होता है.

बाघा-अटारी सीमा पर दर्शकों की सुविधा के लिए नई गैलरी बनाई जा रही है जो वर्ष 2016 तक पूरी हो जाएगी. लेकिन सड़क को मुलायम बनाने के लिए कुछ करने की योजना नहीं है.

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