मोदी अब विदेश नीति पर यू टर्न लेने वाले हैं?

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अंतरराष्ट्रीय मामलों में लिखित शब्दों के अलावा कही गई बातों का अपना महत्व होता है. बैठकों, बातचीत और नीति का ऐलान करते वक़्त इसकी अहमियत और बढ़ जाती है.

पर भारतीय उप-महाद्वीप में महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलते समय भी लोग कुछ ज़्यादा ही लापरवाह हो जाते हैं और अपने विरोधियों के जाल में फँस जाते हैं.

लेकिन इससे भी बुरा तो यह है कि लोग बढ़-चढ़ कर बात करते हैं और फिर अपनी ही बात से पलट जाते हैं. मसलन, वे कह देंगे, "हम मुँहतोड़ जवाब देंगे", पर वे कभी कोई जवाब देते ही नहीं. या वे कह देंगे, "आप दोस्त तो चुन सकते हैं, पड़ोसी नहीं. लिहाज़ा हमें बातचीत फिर शुरू करना ही होगा."

इस समस्या की एक वजह तो भारतीय परंपरा में है. यहां लोग अपने विदेशी मेहमान के लिए दोस्ताना और सुखद वातावरण बनाने के लिए कुछ ज़्यादा ही कर बैठते हैं. हमारी संस्कृति में होता यह है कि विदेशी मेहमान सहज महसूस करे, इस चक्कर में लोग बहुत ही ज़्यादा बात करते हैं.

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विदेशी मेहमान के सामने भद्र बनने की कोशिश में राष्ट्रीय मुद्दों पर समझौता हो जाता है और मेहमान को लगता है कि भारत पहले जैसा कड़ा रवैया नहीं अपना रहा है. नतीजतन, भारत क्या चाहता है, इस पर साफ़, संक्षिप्त और छोटे संदेश के बजाय उलझन भरा, ढुलमुल और ढीला-ढाला संदेश जाता है.

इसी तरह नुक़सानदेह होता है विदेश और सुरक्षा नीतियों पर दिया गया राजनीतिक बयान, जो निहायत ही भोला-भाला और सच्चाई से दूर होता है.

हाल-फ़िलहाल, पाकिस्तान के साथ रिश्तों में दो बार इस तरह की गल़तियां हुई हैं. पहली भूल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संयुक्त महासचिव दत्तात्रेय हसबोले ने की और दूसरी पाकिस्तान रेंजर्स के साथ बैठक में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने.

हसबोले ने पाकिस्तान से रिश्ते सामान्य करने की अपील की और कहा कि "यह देश तो कभी हमारे देश का ही हिस्सा" था. उन्होंने यह भी कह दिया कि पाकिस्तान "हमारे ही परिवार का हिस्सा" है और एक 'संवेदनशील' भाई की तरह भारत को अपने रूठे हुए भाई के साथ संबंध निश्चित ही मज़बूत करना चाहिए. उन्होंने पाकिस्तान जैसे देशों के साथ सांस्कृतिक संबंध सुधारने की बात भी की.

इसके एक दिन पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तानी अधिकारियों से कहा कि "भारत की तरह ही पाकिस्तान भी चरमपंथ का शिकार" रहा है. उन्होंने तो यह भी कह दिया कि भारत, पाकिस्तान से ज़्यादा "इस्लामी" है क्योंकि यहां उस देश से अधिक मुसलमान रहते हैं.

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साफ़ है, ये दोनों महानुभाव ग़लत थे, या मोदी सरकार के मज़बूत और कड़ी विदेश नीति से एक और यू-टर्न लेने के लिए ज़मीन तैयार कर रहे थे. मामला जो हो, इनकी बातें पाकिस्तान की सच्चाई से परे हैं. इसने भारत के इस निश्चय को नुक़सान पहुँचाया कि पाकिस्तानी ख़तरे से सख़्ती से निपटा जाएगा.

इससे भी बुरी बात यह है कि इन बयानों ने उस मामले को कमज़ोर किया जिसके तहत भारत पाकिस्तान को चरमपंथ का प्रायोजक मानता रहा है.

पाकिस्तान हमेशा ही चरमपंथ के कार्ड का इस्तेमाल करता रहा है और उस पर यक़ीन करने वाले पश्चिमी देशों से इसका फ़ायदा लेता रहा है, पर भारत ने उसे कभी चरमपंथ का शिकार नहीं माना.

इसकी वजह साफ़ है. चरमपंथ को अपनी नीति का हिस्सा बनाने का नतीजा पाकिस्तान भुगत रहा है जबकि भारत इस नीति का शिकार रहा है. भारत और अफ़ग़ानिस्तान जिहाद की आग भड़काने की पाकिस्तान नीति का शिकार रहे हैं, इनके बराबर पाकिस्तान को नहीं रखा जा सकता, जो अपनी ही लगाई आग में झुलस रहा है.

दूसरी बात, भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और यह पाकिस्तान से अधिक इस्लामी सिर्फ़ इसलिए नहीं हो सकता कि यहां पकिस्तान से ज़्यादा मुसलमान रहते हैं.

जहां तक आरएसएस के बयान की बात है, यह अविश्वसनीय और हास्यास्पद है. आरएसएस ने अपने इस बयान से अखंड भारत का भूत खड़ा कर दिया है, जिससे पाकिस्तान चिढ़ता है. इसके अलावा इसने दोनों देशों के बीच की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास की खाई को नज़रअंदाज़ कर दिया.

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आसान शब्दों में कहा जाए तो भारत और पाकिस्तान समान नहीं हैं. किसी समय वे एक ही देश का हिस्सा थे, पर सात दशकों के बाद वे अब बिल्कुल एक दूसरे से अलग हो चुके हैं. उनकी भाषा, उनके मुहावरे एक नहीं हैं और संस्कृति तो बिल्कुल भी समान नहीं हैं.

भारतीय संस्कृति की कई चीज़ें पाकिस्तान के बजाय पश्चिमी देशों के अधिक नज़दीक हैं. सच तो यह है कि पाकिस्तानी अब भारतीयों के भाई नहीं हैं और दोनों एक ही परिवार के भी नहीं हैं. भारत का एक ही परिवार है और वह है भारतीयों का, भले ही उनकी भाषा और धर्म अलग-अलग हों.

शरीर का जो हिस्सा काट कर अलग कर दिया गया, उसे छोड़ देना और भूल जाना ही बेहतर है. मनोवैज्ञानिक रूप से मानव शरीर को ऐसा लगता रहता है कि कटा हुआ अंग अब भी शरीर का हिस्सा ही है. पर शरीर के इस हिस्से को काट कर अलग इसलिए कर दिया गया कि इससे पूरे शरीर को नुक़सान हो सकता था.

इसलिए जीव विज्ञान के हिसाब से हो या सामरिक दृष्टिकोण से, कटे हुए अंग से शरीर को ताक़त मिलना नामुमकिन है.

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शायद इससे भारतीयों को एक बार फिर शिक्षित करने का मामला बनता है. अधिकारी, राजनेता और आम जनता पाकिस्तान से कैसे पेश आए और पाकिस्तान से क्या कहे, यह सीखना ज़रूरी है.

यह समझना निहायत ही ज़रूरी है कि भारतीयों की ओर से दिखाए गए इस तरह के बेकार के प्रेम और दरियादिली से न तो पाकिस्तानी प्रभावित होते हैं न ही उनका दिल पसीजता है. वे इस तरह की चीज़ों को गंभीरता से नहीं लेते हैं और कई बार इन्हें भारत की कमज़ोरी मानते है या समझते हैं कि भारत उनसे घटिया है.

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Image caption भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन.

इसलिए भारत को पाकिस्तान के साथ काम की ही बात करनी चाहिए, उसे अनावश्यक रूप से अधिक दोस्ती या प्रेम नहीं दिखाना चाहिए. दूसरे शब्दों में, मूर्खता किए बग़ैर अपनी बात सही तरीक़े से कहनी चाहिए. किसी भी सूरत में यह तो नहीं ही कहना चाहिए कि "हम लोग एक समान हैं."

यह तथ्यामक रूप से तो ग़लत है ही, पाकिस्तानियों को बुरा भी लगता है और वे इसे अलग पाकिस्तान राष्ट्र पर सवाल खड़ने करने की भारत की चाल के रूप में देखते हैं.

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