वो जो सिर्फ़ गायिका नहीं थीं

एमएस सुब्बालक्ष्मी. इमेज कॉपीरइट www.msstributes.org

तीस साल के सेंथिल सालों से चेन्नई के एक घर में पीने का पानी पहुंचाते रहे हैं. लेकिन एक अहम सवाल जो उन्हें लंबे समय से परेशान कर रहा था उसे पूछने का मन उन्होंने हाल में ही बनाया.

घर के ड्राइंग रूम में बहुत ही शान से लगाई गई एक तस्वीर की ओर इशारा कर सेंथिल ने घर के महिला से पूछा, यह औरत आपकी कौन लगती हैं?

सेंथिल के सवाल पर सीता रवि ने जल्दी से कहा, ''वो मेरी माँ की माँ हैं.''

लेकिन साथ ही वो ये पूछने से न रह सकीं कि सवाल करते वक़्त सेंथिल इतने विनम्र क्यों रहे.

शांति देने वाला संगीत

इसका जवाब सेंथिल ने बीबीसी हिंदी से बातचीत के दौरान दिया.

उनका कहना था, ''मैंने कहा कि जब मेरा मन भारी होता है तो मैं उन्हें सुनता हूँ. उनका संगीत ऐसा है कि मानो आवाज़ कहीं खो जाती है. उनके गाने का अंदाज़ आपको समस्याएं भुलाकर ख़ुशी और शांति देती है.''

इमेज कॉपीरइट www.msstributes.org

16 सितंबर 1916 को पैदा हुईं एमएस सुब्बालक्ष्मी एमएस आ एमएस अम्मा के नाम से मशहूर हैं. उनके संगीत ने संगीत के जानकारों के साथ-साथ सेंथिल जैसे लाखों लोगों के दिलों को छुआ है.

सेंथिल जैसे लोगों के लिए वो दैवी थीं, तो बड़े ग़ुलाम अली ख़ान ने उन्हें 'शुद्ध स्वरों की देवी' तो भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें 'संगीत की रानी' बताया था.

अब जबकि बुधवार से भारत रत्न एमएस सुब्बालक्ष्मी जन्मशताब्दी समारोह मनाने की तैयारी हो रही है, ऐसे मौक़े पर ये सवाल ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि आख़िर उनमें क्या ख़ास था कि वो असधारण आवाज़ वाली एक युवती से कर्नाटक संगीत के सबसे बड़े नाम होते हुए एक राष्ट्रीय प्रतीक बन गईं.

उन्होंने 1926 में अपना पहला गाना रिकार्ड कराया था जब उनकी उम्र सिर्फ़ 10 साल थी.

एमएस के पोते की बीवी और मशहूर बांसुरी वादक सिक्की माला चंद्रशेखर कहती हैं, ''उनके स्वर के हर उतार चढ़ाव में एक अनोखी कला छिपी है. जिस तरह से वो हर स्वर को पद से जोड़ती थीं, उस पर हमें विचार करने की ज़रूरत है. उनके स्तर को कोई छू नहीं पाया.''

दिलकश आवाज़

इमेज कॉपीरइट www.msstributes.org

मद्रास संगीत अकादमी के अध्यक्ष एन मुरली कहते हैं, ''उनके पास प्रतिष्ठित संगीतकार होने के लिए, मधुर और दिलकश आवाज़, संगीत का आला दर्जे का ज्ञान, मंच पर मंत्रमुग्ध कर देने वाली दिव्य मौजूदगी जैसी सभी ज़रूरी योग्यताएं थीं.''

गायक और लेखिका सविता नरसिम्हन कहती हैं, "उनका संगीत और जीवन दो अलग-अलग चीज़े नहीं थीं. वो प्रवाह के साथ ढलती गईं. इसलिए कोई भी संगीतकार उनके साथ किसी भी भाषा में आसानी से काम कर सकता था. उनके मन में किसी तरह की कोई सीमा नहीं थी. वह केवल स्वर और राग थीं."

एमएस के साथ क़रीब 16 साल तक मंच पर गायन कर चुकी गौरी रामनारायण कहती हैं, ''उनका झुकाव देशभक्ति की ओर हो गया. जो कि आजकल एक बहुत ही घिसा-पिटा शब्द है. इसका मतलब देशभक्ति तो है. लेकिन हमारे दादा के ज़माने में यह केवल अंध राष्ट्रभक्ति नहीं थी. उस समय इसका मतलब देश की भलाई और लोगों के विकास के लिए ख़ुद को समर्पित कर देना था.''

अभिनय से कमाई

रामनारायण कहती हैं, ''वो अपने पति पी सदाशिवम से बहुत प्रभावित थीं, जो कि एक स्वतंत्रता सेनानी थे.''

कल्की नाम की पत्रिका के प्रकाशन की शुरुआत उस पैसे से हुई जिसे उन्होंने फ़िल्मों में अभिनय से कमाया था. यह दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने का एक सार्वजनिक प्रयास था. उनके संगीत का जन्म ऐसी ही जगहों से होता था.

इमेज कॉपीरइट www.msstributes.org

यही कारण है कि उनकी सारी कमाई परोपकार चली गई. उन्होंने न केवल मंदिरों को पैसा दिया बल्कि शंकर नेत्रालय और कस्तूरबा स्मृति कोष को भी दान दिए.

रामनारायण कहती हैं, ''उन्होंने संगीत का प्रयोग देश की सेवा के लिए किया और उन्होंने कभी इसे सेवा नहीं माना.''

इन्हीं वजहों से एमएस एक बहुत ही असाधारण इंसान थीं. सीता रवि बताती हैं, ''उनकी अलमारी में कभी सात-आठ से अधिक साड़ियां नहीं रहीं. अगर कभी उनके पास होती भी थीं तो वो उसे किसी और को दे देती थीं.''

एमएस के पोते वी श्रीनिवासन कहते हैं, "उनके पति का सबसे बढ़िया फ़ैसला फ़िल्मों में काम जारी न रखने का था. ये उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ.''

श्रीनिवासन की बेटी ऐश्वर्य एमएस की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं. )

संबंधित समाचार