'मुसलमानों, ईसाइयों को दबाने का हथियार'

भारत, मुर्गा इमेज कॉपीरइट AFP

मैं दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा के नज़दीक एक अच्छी ख़ासी आवासीय कॉलोनी में रहता हूँ.

करीब 13 साल में जबसे हम यहां आए हैं हमने महसूस किया है कि स्थानीय दुकानों में नवरात्र के दौरान अंडे तक नहीं बेचे जाते हैं.

हमने तो कभी यह पूछने की हिम्मत तक नहीं की कि दूसरी मांसाहारी चीज़ें, कच्ची या पकाई हुई मिलती हैं या नहीं.

इसके बजाय हम दिल्ली से लौटते हुए अपनी ज़रूरत का सामान ले आते हैं.

हालांकि हमारा परिवार नास्तिक नहीं है, लेकिन हम कर्मकांडी भी नहीं है.

पिछले कुछ सालों में हमारी कॉलोनी विभिन्न समूहों का निवास बनती गई है. इसलिए अंडे हमेशा उपलब्ध रहने लगे हैं, हालांकि चिकन और गोश्त पर प्रतिबंध बना हुआ है.

रूढ़िवाद की लहर

मांसाहारी भोजन परोसने वाले रेस्त्रां साल में दो बार दस दिन के लिए बंद रहते हैं और हम जैसे लोग बाहर के शानदार खाने से दूरी बना लेते हैं.

त्योहारों के मौसम के लौटने के साथ ही यह तय है कि पुराना वक़्त भी लौट आया है. ये इसलिए क्योंकि रूढ़िवाद की एक लहर पूरे भारत में फैल रही है.

जहां एक ओर ज़्यादातर समाज आधुनिकतावाद की ओर बढ़ रहे हैं, भारत वापस असहिष्णुता के अंधेरे में गिर रहा है. सरकारी अनुमति के साथ 'गोश्त पर प्रतिबंध लगाओ' अभियान की लहर रोज़ नए राज्यों और क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले रही है.

ये न तो उन समुदायों को संबल दे रही है जिनकी संवेदनाओं को चोट पहुंचने से बचाने की यह कोशिश कर रहा है और न ही देश की साख को बढ़ा रही है.

इस अभियान को सरकारी सरंक्षण इसलिए दिया जा रहा है ताकि जैनियों को ख़ुश किया जा सके.

उनकी संवेदनाएं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं मुसलमानों या ईसाइयों या मेरे जैसे हिंदुओं के मुक़ाबले जो ऐसी संस्कृति में पला-बढ़ा है, जहां कुछ त्योहारों के दौरान पशु बलि अनिवार्य होती है.

जैनी आर्थिक रूप से समृद्ध हैं और एक घिरी हुई सरकार हर वह समर्थन ले लेना चाहती है जो वह हासिल कर सकती है. लेकिन यह भी त्रासदी ही है कि दुनिया को अहिंसा का विचार देने वाले धर्म को अपना पक्ष रखने के लिए चरमपंथी ब्राह्मणवाद की ज़रूरत पड़ रही है.

'गोश्त खाना हिंदू विरोधी'

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

जैनियों के पर्यूषण पर्व के दौरान गोश्त पर पाबंदी की मांग करने वाले लोग यह भूल गए कि ज़बरदस्ती भी हिंसा का ही एक प्रकार है.

जैनियों को एक तरह की सुविधा के रूप में शुरू हुआ प्रावधान चरमपंथी हिंदू पहचान और मुसलमानों, ईसाइयों को दबाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा जिन्हें भारत में गोश्त खाने वालों के समूहों के रूप में चित्रित किया जा रहा है.

यह भुला दिया गया कि वैदिक काल में गोश्त खाया जाना आम था. और मैं तो प्राचीन भारत में बीफ़ खाए जाने के विवाद को हवा भी नहीं दे रहा हूँ.

लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस-नीत सरकारों पर 'गुलाबी क्रांति' को बढ़ावा देने और केंद्र पर गोश्त के निर्यातकों को सब्सिडी देने का आरोप लगाया था.

लेकिन उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि गुजरात गोश्त का सबसे बड़ा निर्यातक था.

गोश्त पर प्रतिबंध को सरकार एक उपमा के रूप में इस्तेमाल कर रही है. क्योंकि गोश्त खाने को अब ज़्यादा से ज़्यादा हिंदू-विरोधी के रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है.

इमेज कॉपीरइट Reuters

इस पर 'प्रतिबंध' का अप्रत्यक्ष अर्थ यह हुआ कि मुसलमानों और ईसाइयों के अधिकारों को 'सीमित किया जा रहा है'.

इंदिरा के रास्ते पर मोदी

सोशल मीडिया पर कड़े विरोध के बावजूद राजनीतिक पार्टियों के बीच यह भावना है कि जानवरों को काटने और गोश्त की बिक्री पर प्रतिबंध 'न्यायसंगत' क़दम है.

इसी का परिणाम है कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार भी इसी राह पर चल पड़ी है, हालांकि मुंबई हाईकोर्ट ने महानगर में मांस पर प्रतिबंध के आदेश को पलट दिया.

इससे एक असुविधाजनक तथ्य भी ज़ाहिर होता हैः भारत के दो मुख्य राजनीतिक दलों में से एक तो एक विशेष संप्रदाय के साथ वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध है, लेकिन दूसरा व्यावहारिक वजहों से एक सांप्रदायिक रुख अख़्तियार कर लेता है.

मुझे यकीन है कि भारतीय कभी नहीं भूल सकते कि राजीव गांधी ने सोचा था कि वह शाह बानो पर फ़ैसले को पलटकर मुसलमानों को संतुष्ट कर देंगे और बाबरी मस्जिद/ राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुलवाकर हिंदुओं को.

आज भारत में जो भी हो रहा है उससे इसका ज़रा भी भला होगा.

जब भी मुझसे कहा जाता है कि मोदी के एक साल और कुछ महीनों के कार्यकाल का आकलन किया जाए, तो मैं यही कहकर बात शुरू करता हूँ कि एक जीवनी लेखक के रूप में मैं निराश हूँ. मैंने उन्हें चतुर आदमी के रूप में दिखाया जो भारतीय इतिहास में अपने आपको अमर करने की कोशिश में हैं.

इस तरह तो वह इंदिरा गांधी से अलग रास्ता बनाने में कामयाब नहीं हो पाएंगे.

याद करें कि इंदिरा गांधी को 1971 और 1980 में भारी बहुमत मिला था, लेकिन दोनों ही बार दो साल की अवधि में उनकी लोकप्रियता का क्षरण हो गया.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार