अमरीकी एंकरों में वो बात कहां!

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ज़रूरत है: अमरीका में काम करने के लिए भारत के टीवी एंकरों की, पाकिस्तान के हों तो भी चलेगा.

कामयाब कैंडिडेट वो होगा जो चिल्ला सके, टीवी पर हो रही बहस में शामिल लोगों को डांट सके, उन्हें बता सके कि "नेशन वांट्स टू नो", जो ख़ुद ही ज़्यादा बोले और उन्हें कम बोलने दे.

अगर वो लाइव टीवी पर गाली-गलौज करवा सके तो उसे शाबाशी की चिठ्ठी मिलेगी और हाथापाई करवा सके तो उसके लिए हर बार अलग से बोनस मिलेगा.

इस तरह के एंकरों की ज़रूरत ख़ासतौर से बुधवार को रिपबलिकन पार्टी की तरफ़ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की रेस में शामिल लोगों की तीन घंटे चली टीवी बहस के बाद महसूस की जा रही है.

ग्यारह उम्मीदवार एक स्टेज पर हों, उनमें से एक महिला हो, पूरा देश देख रहा हो और उसके बाद जो बातें याद रखने लायक हैं वो हैं:

- मैंने चालीस साल पहले गांजा पिया था. मां मुझे माफ़ कर देना.

- अरे कितने लोग हैं इस स्टेज पर? वो जो ग्यारहवां है उसे किसने बुला लिया, उसकी रेटिंग तो एक फ़ीसदी से आगे बढ़ ही नहीं रही है.

- (एक उम्मीदवार ने एकमात्र महिला उम्मीदवार के बारे में कहा था - उसकी शकल देखी है, कहीं से लगता है कि वो राष्ट्रपति बन सकती है?)

उसके जवाब में महिला उम्मीदवार ने कहा, "पूरे देश की महिलाओं ने सुना है कि एक महिला के बारे में किस तरह की बातें कही गई हैं."

बयान देनेवाले उम्मीदवार का झेंपते हुए जवाब था, "अरे तुम तो बहुत सुंदर हो. सचमुच."

- एक उम्मीदवार, "तुमने मेरी बीवी के बारे में ऐसी बातें कही हैं. माफ़ी मांगो."

- दूसरा उम्मीदवार, "मैने सुना है तुम्हारी बीवी के बारे में. बहुत ही अच्छी महिला है लेकिन मैंने जो कहा था उसमें कुछ ग़लत नहीं था."

मौक़ा नहीं निकलने देते

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अब ये जो बातें हैं मैं हिंदी में लिख रहा हूं तो फिर भी थोड़ी सी जान आ गई बहस में. अंग्रेज़ी में तो उन्हें सुनकर, 'हेलो, हाउ डू यू डू' जैसा लग रहा था.

अमरीकी एंकरों में पोटेंशियल तो है लेकिन उन्हें मौक़े पर चौका लगाना ही नहीं आता.

जब रंग-रूप को लेकर बहस चल रही थी तो ज़रा सोचिए अपने देसी ऐंकर उस मौके को हाथ से निकलने देते? हाथा-पाई नहीं तो कम से कम कुछ यादगार गालियां तो ज़रूर निकलवा लेते.

अब पिछले दिनों भारत के एक टीवी चैनल पर साधु बाबा और महिला ज्योतिषी की क्या शानदार थप्पड़बाज़ी देखी थी हमने.

इसे कहते हैं टेलीविज़न. जर्नलिज़्म के स्कूलों में वो वीडियो बार-बार दिखाया जाना चाहिए, एंकरों के इस हुनर के बारे में किताबें लिखी जानी चाहिए.

यहां के अख़बार और टीवी वाले तो बस इतने से ही खुश हो गए, देखा, कैसे घूरा था उस महिला उम्मीदवार ने उसकी शक्ल-सूरत पर बयान देनेवाले उम्मीदवार को. उसके बोलती बंद कर दी थी.

और यही वजह थी कि तीन घंटे चली बहस में ऐंकर नहीं बल्कि उसके पीछे बैठा हैंडसम सा नौजवान ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा. हैशटैग था #hotdebateguy.

हुनर की बात

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बेचारे उम्मीदवार घंटों सज-संवर कर आए थे, कैमरे को अपने चेहरे का कौन सा ऐंगल दिखाएं उसकी तैयारी की थी और बात किसकी हो रही है तो हॉट दिखनेवाले एक नौजवान की. अपने ऐंकर कभी होने देते ऐसा?

लोग ट्विटर पर उसका नाम पता करने की कोशिश कर रहे थे और जब नाम पता चला तो एक महिला ने तो ट्विटर पर ही इज़हार-ए-मोहब्बत कर डाला.

कहा मेरे नाम के आगे तुम्हारा सरनेम लग जाएगा तो लगेगा जैसे संगीत पैदा हो रहा हो.

इसे कहते हैं बोरियत की इंतहा. ग़लती किसकी? ज़ाहिर है ऐंकर की. वैसे बेचारा कोशिश कर रहा था लड़वाने-भिडवाने की. लेकिन ये देसी हुनर तभी आता है जब भारत-पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर काम करें.

मेरी सलाह तो उसके लिए यही होगी कि अपनी कंपनी से कहे कि एक साल भारत के "योर चैनल"..(हां हां वही नेशन वांट्स टू नो चैनल) में काम करने का मौका दिया जाए.

वर्ना अगर एक बार अमरीकी जनता को देसी एंकरों की लत लग गई तब तो फिर शायद बेचारे को टाटा बाय-बाय कहने का भी वक्त नहीं मिलेगा.

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