बिहारः चुनावी मुद्दा बनेगा एएमयू का अधूरा कैंपस?

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आज़ाद भारत की राजनीति के 62 वर्ष में मुसलमान एक संवेदनशील मुद्दा बने रहे.

सत्तारूढ़ दलों ने उनका वोट बैंक के रूप में बख़ूबी इस्तेमाल किया, लेकिन इस क़ौम की तालीम और तरक़्क़ी पर कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी.

केंद्र में 10 साल तक (2004-2014) चली यूपीए सरकार बिहार के किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) का कैंपस आठ साल में भी नहीं बनवा सकी.

किशनगंज ज़िले में मुसलमानों की आबादी लगभग 67 प्रतिशत है.

यहाँ की 17 लाख आबादी में क़रीब 12 लाख मुसलमानों की हिस्सेदारी है.

किशनगंज संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व कांग्रेस के सांसद मौलाना असरारुल हक़ कासमी करते हैं.

कैंपस के लिए ज़मीन

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किशनगंज ज़िले में चार विधानसभा क्षेत्र हैं- किशनगंज, ठाकुरगंज, बहादुरगंज और कोचाधाम.

इनमें से दो में कांग्रेस और दो में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड के विधायक हैं.

2006 में सच्चर समिति की अनुशंसा पर तत्कालीन मानव संसाधन मंत्रालय ने बिहार में एएमयू की एत शाखा स्थापित करने की सलाह दी.

नवम्बर, 2008 में एएमयू के तत्कालीन कुलपति डॉ. पीके अब्दुल अज़ीज़ ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कटिहार में ज़मीन उपलब्ध कराने के लिए पहली चिट्ठी लिखी.

केंद्र सरकार को एएमयू के वीसी से बिहार सरकार को पहली चिट्ठी भिजवाने में दो साल लग गए.

नीतीश सरकार को एएमयू कैंपस के लिए किशनगंज में 224.4 एकड़ ज़मीन खोजने और उसका एग्रीमेंट करने में तीन साल (2011) लग गए.

आवंटित धन नहीं मिला

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लैंड एग्रीमेंट के दो साल बाद भी न केंद्र सरकार पैसे दे पाई और न ही कोई निर्माण कार्य शुरू हो सका.

आख़िरकार 2013 में बिहार सरकार के अल्पसंख्यक छात्रावास के दो भवनों में अस्थायी अकादमिक ब्लॉक, स्टडी सेंटर और छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग छात्रावासों की कामचलाऊ व्यवस्था शुरू हुई.

यूपीए सरकार के नीतिगत फ़ैसले को ज़मीन पर उतरने में आठ साल लग गए.

30 जनवरी, 2014 को यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी ने एएमयू कैंपस की इमारत का शिलान्यास किया.

कैंपस के लिए 137 करोड़ रुपये मिलने थे लेकिन, ये पैसे अब तक नहीं मिले.

कैंपस चलाने के लिए एएमयू और इसके केरल कैंपस से मदद लेनी पड़ी.

बड़ी मशक़्क़त के बाद 2013 में दो विषयों में अकादमिक सत्र शुरू हो सका.

सुविधाओं का टोटा

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Image caption किशनगंज कैंपस के निदेशक डॉ राशिद नेहाल.

एएमयू के किशनगंज कैंपस में देश भर से आए 135 छात्र (103 छात्र और 32 छात्राएं) हैं लेकिन, सीमांचल का सिर्फ़ एक छात्र ही है.

कैंपस के निदेशक डॉ. राशिद नेहाल के अनुसार, "चकला में स्थायी परिसर बन रहा है. एक ओर नदी होने की वजह से फेंसिंग की जा रही है. निर्माण कार्य के लिए मिलने वाले 137 करोड़ अब तक नहीं मिले."

एमबीए द्वितीय वर्ष के छात्र ओसामा बताते हैं कि, "हम यूनिवर्सिटी के मुख्य सेंटर से कटा महसूस करते हैं.

कैंपस दूरदराज़ के क्षेत्र में होने और पुख़्ता आधारभूत संरचना के अभाव में कारगर नहीं हो पा रहा है. बिजली की भी समस्या बनी रहती है इससे पढ़ाई में दिक़्क़त आती है."

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