कांग्रेस गणेश परिक्रमा की संस्कृति छोड़े!

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भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस दिल्ली में किसान रैली का आयोजन कर रही है.

किसान आंदोलन के सामने झुकते हुए मोदी सरकार को भूमि अध्यादेश वापस लेना पड़ा. पार्टी का कहना है कि रैली का मक़सद किसानों के साथ एकजुटता दिखाना और बधाई देना है.

कांग्रेस कई महीनों से लगातार ऐसे मुद्दे की तलाश में है जो उसे राजनीति की मुख्यधारा में फिर से ला सके.

नाराज़गी का फ़ायदा

कांग्रेस की निगाह किसानों के मुद्दे पर टिक गई है. इसके कई कारण है. एक तो किसानों की तादाद बहुत बड़ी है.

दूसरी ओर किसानों की स्थिति ख़राब है और मानसून के कारण उनकी हालत बिगड़ती जा रही है. इससे उनमें पनपे असंतोष और नाराज़गी का वो फ़ायदा उठाना चाहती है.

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तीसरा एनडीए सरकार को जो भूमि अधिग्रहण विधेयक वापस लेना पड़ा है उसे वो अपनी जीत मान रही है.

कांग्रेस किसान रैली के ज़रिए इन तीनों मुद्दों के आधार पर अपना खोया हुआ जनाधार पाना चाहती है.

कोई विज़न नहीं

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल शनिवार को बिहार में थे. बिहार विधानसभा चुनावों के लिए चंपारण में कांग्रेस की रैली में राहुल गांधी मोदी सरकार पर जमकर बरसे. लेकिन उनके पास कोई नया मुद्दा नहीं था.

विरोधियों के अलावा राहुल गांधी के बारे में पार्टी के अंदर भी यही धारणा बन रही है कि उनके पास अपना कोई विज़न नहीं है.

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उनके सलाहकार जो मुद्दे, जुमले देते हैं वे उन्हीं के आधार पर बोलते हैं. और वो बड़ा ही सतही और नक़ली सा लगता है.

पार्टी के नेता किसान रैली कर के किसानों का समर्थन और उनमें अपना विश्वास तभी जगा पाएंगे जब संगठन में बदलाव हो.

गणेश परिक्रमा

संगठन में बदलाव तभी होगा जब पार्टी में जो गणेश परिक्रमा की संस्कृति है वो ख़त्म हो और ज़मीन से जुड़े नेताओं को आगे लाया जाए.

अगर केवल नेहरू परिवार के साथ वफ़ादारी ही एकमात्र पैमाना होगी तो फिर पार्टी का उठ पाना मुश्किल होगा.

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पार्टी को अब सोचना होगा कि पिछले 15-20 साल से चल रही ये संस्कृति उन्हें कहां लेकर आई है.

आज़ादी के बाद 55-56 सालों तक कांग्रेस का राज रहा. आज उनके पास इस बात का जवाब नहीं है कि उन सालों में उन्होंने उन कमियों के लिए क्यों कुछ नहीं किया जिन्हें आज दूसरों की कमियां बता रहे हैं.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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