स्वच्छ भारत अभियान की चार ग़लतियां

सरकारी अभियान में बने शौचालय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्तूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी.

यह महत्वाकांक्षी योजना दरअसल पहले की सरकार के केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (1986-1999) और संपूर्ण स्वच्छता अभियान (1999) का बदला हुआ रूप है.

संपूर्ण स्वच्छता अभियान का नाम 2012 में बदल कर निर्मल भारत अभियान कर दिया गया था.

यह साफ़ है कि तमाम शोर-शराबे और जोश-ख़रोश के बावजूद इस कार्यक्रम में भी वे ग़लतियां दोहराई जा रही हैं जो इस तरह के पहले के कार्यक्रम में की गई थीं. चार ग़लतियां तो साफ़ दिखती हैं.

काम नहीं, सिर्फ़ बातें

निर्मल भारत अभियान की तरह ही स्वच्छ भारत मिशन को भी काफ़ी तड़क भड़क के साथ शुरू किया गया.

इसके तहत 2019 तक 9 करोड़ 80 लाख यानी प्रति मिनट 46 शौचालय बनाने का लक्ष्य तय किया गया है.

लेकिन 2014-15 के दौरान प्रति मिनट 11 शौचालय ही बनाए गए. इसका मतलब यह हुआ कि इसी रफ़्तार से काम चलता रहा तो साल 2032 से पहले लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा.

मॉनीटर डेलोइट की 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, निर्मल भारत अभियान के तहत 2001 से 200 अरब रुपए आबंटित किए गए, पर वास्तव में सिर्फ़ 115 अरब रुपए ही खर्च हो सके.

वास्तविक इस्तेमाल की निगरानी नहीं

तमाम सरकारी आंकड़ों में ज़ोर बस इस पर है कि कितने शौचालय बनाए गए. नियंत्रक और महालेखाकार (सीएजी) ने अपने एक हालिया रिपोर्ट में कहा है कि निर्मल भारत अभियान के तहत छत्तीसगढ़ में बनाए गए टॉयलेट में से क़रीब 60 फ़ीसदी बेकार पड़े हुए हैं.

मैंने 'इंडिया स्पेंड' के लिए स्वच्छ विद्यालय अभियान के तहत बनाए गए शौचालयों का मुआयना करने पर पाया था कि कई नए बने शौचालय तो सिर्फ़ इसलिए बेकार पड़े थे कि उन तक पानी पंहुचाने का कोई इंतज़ाम ही नहीं किया गया था.

एकाउंटिबिलिटी इनीशिएटिव के वरिष्ठ शोधकर्ता अवनि कपूर का कहना है, " नए शौचालय बनाने की निगरानी करने के बदले ज़ोर इस पर होना चाहिए कि वास्तव में इन शौचालयों का क्या हुआ, उनका क्या असर पड़ा."

व्यवहार में बदलाव पर ध्यान नहीं

निर्मल भारत अभियान का पूरा ध्यान शौचालय बनाने पर ही था.

इस बात के पक्के सबूत हैं कि आदतों की वजह से गांवों में लोग शौचालय होने के बावजूद खुले में शौच करना पसंद करते हैं. स्वच्छता पर शोध करने वाली एक जानी मानी संस्था राइस ने अपनी एक रिपोर्ट में पाया है कि पांच राज्य (बिहार, हरियाणा, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) में 44 फ़ीसदी घरों में शौचालय होने के बावजूद कम के कम एक व्यक्ति खुले में शौच करते हैं.

आंध्र प्रदेश के पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभाग ने निर्मल भारत अभियान की ऑडिट रिपोर्ट में पाया है कि 15 सालों से भी ज़्यादा समय से चल रही इस स्कीम के बावजूद गांव के लोगों में खुले में शौच करने की आदत बदलने के उद्देश्य में हम पूरी तरह असफल रहे हैं.

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स्वच्छ भारत अभियान में भी यह ग़लती दोहराई जा रही है. स्कूल में देखा गया है कि शौचालय बनाने पर सारा ध्यान है, पर उनके वास्तविक इस्तेमाल की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

आंकड़ों में एकरूपता की कमी

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स्वच्छ विद्यालय कार्यक्रम के आंकड़ों का 'डाउन टू अर्थ' ने विश्लेषण किया. इसके मुताबिक़ अगस्त 2014 और मार्च 2015 के बीच सात महीनों में 109 शौचालय प्रतिदिन की दर से कुल 22,838 शौचालय बनाए गए.

वहीं दूसरी ओर इस साल 27 जुलाई और 11 अगस्त के बीच यानी कुल 15 दिनों में ही 89 हज़ार शौचालय बना दिए गए यानि प्रतिदिन 5,933 शौचालय बनाए गए. यह 5,343 फ़ीसदी की वृद्धि है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय का कहना है कि मार्च 2011 तक 7 करोड़ 80 लाख लाख शौचालय बनाए गए. लेकिन, मार्च 2011 की जनगणना के मुताबिक़ केवल सिर्फ़ 5 करोड़ 10 लाख घरों में ही शौचालय थे.

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