'काग़ज़-गत्ते खा कर रहा ज़िंदा, भजन किया'

सुरंग से बचाए गए मज़दूर

हिमाचल प्रदेश में किरतपुर-मनाली रोड पर बनाई जा रही सुरंग में नौ दिनों से फंसे दो मज़दूरों को सुरक्षित निकाल लिया गया है.

जबकि हृदयराम नाम के एक और मज़दूर के बारे में पता नहीं चल सका है.

बचाए गए मज़दूरों का नाम सतीश तोमर और मनीराम है.

बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने सतीश तोमर से दुर्घटना और उसके बाद नौ दिनों तक बिताए गए अनुभवों पर बात की.

पढ़ें सतीश की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी

उस दिन सुबह आठ बजे इंजीनियर ने बोला कि मशीन की सफ़ाई कर दो. हम सुरंग के अंदर गए. मेरे साथ एक और वर्कर मनीराम थे.

मैंने अपने साथी से कहा कि मशीन की सफ़ाई करो तब तक मैं सामान रख कर आता हूँ. सामान रखकर मैं आगे हो रहे काम को देखने लगा.

तभी पीछे से भागो-भागो की आवाज़ आई.

मैंने और मनीराम ने दौड़कर निकलने की कोशिश की, लेकिन अभी आधे रास्ते में ही थे कि मलबा गिरने से सुरंग बंद हो गई.

जब मौत सामने हो तो डर तो लगता ही है, लेकिन हमने हौसला नहीं छोड़ा. उस समय सिर्फ़ भगवान का ही भरोसा था.

इन नौ दिनों में मैंने और मेरे साथी मनीराम ने भगवान के बारे में बातें कीं और भजन-कीर्तन किए. हमने एक-दूसरे के ग्राम देवता से मनोकामना भी मांगी कि अगर जीवित निकले तो मैं मनीराम के ग्राम देवता के पास जाऊंगा और मनीराम मेरे ग्राम देवता के पास जाएंगे.

इस तरह हमने एक दूसरे की हिम्मत नहीं टूटने दी.

'काग़ज़ और गत्ते खाए'

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शुरूआत के एक-डेढ़ दिन तो हमने सोचा कि बाहर के लोग निकालने के लिए कुछ कर रहे होंगे, लेकिन मशीन या कोई और आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी इसलिए ख़्याल आया कि शायद उन लोगों ने सोचा हो कि हम लोग जीवित नहीं बचे हैं.

लेकिन हमने एक बात ठान ली थी कि हौसला बनाए रखना है. बाहर के लोग 10-15 दिन या महीने-भर बाद ही सही कभी तो इस टूटी सुरंग को साफ़ करेंगे और तब हमें निकालेंगे.

तीन-दिन तक तो हमने कुछ नहीं खाया. लेकिन इस दौरान हमने काग़ज़, गत्ते आदि इकट्ठा कर लिए थे कि अगर कुछ न मिले तो इसे ही खाकर अपनी भूख मिटा सकें और ज़िंदा बचे रह सकें.

चौथे दिन हमने वही किया, काग़ज़ और गत्ते खा कर किसी तरह भूख मिटाई. पांचवें दिन तक सुरंग में सुराख़ बनाकर हम तक खाना और ड्राइ फ़्रूट्स वग़ैरह पहुंचाया गया.

मशीन पर सो बिताई रातें

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जिस तरफ़ हम फंसे थे वहां अंधेरा और बिल्कुल शांत माहौल था. हमने सोचा जान तो ख़तरे में है ही लेकिन ऐसी शांति कहां मिलती है, क्यों न हम भगवान को याद करें. तो हम अधिकतर समय भगवान का नाम लेते रहे.

शुरू में तो हम ज़मीन पर ही सोते थे लेकिन वहां भी पानी भर गया इसलिए हम दूसरी तरफ़ खड़ी मशीन पर चढ़ गए और वहीं पर खाना खाने और सोने का इंतज़ाम किया.

जब मैं नौ दिन बाद सुरंग से बाहर निकला तो लोग मुझे गले लगाने लगे लेकिन मैंने कहा कि पहले मैं धरती मां को नमस्कार करूंगा, जिन्होंने मुझे ज़िंदा बाहर आने दिया.

मैं इस समय पूरी तरह ठीक हूँ और किसी तरह की कोई दिक़्क़त नहीं है.

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