भारत कैसे निपटेगा जलवायु परिवर्तन से

अमरीका का एक बिजली घर. इमेज कॉपीरइट

दुनिया के सभी देशों ने मिलकर तय किया है कि जलवायु परिवर्तन से जो तापमान बढ़ा है या बढ़ेगा, उसे दो डिग्री सेल्सियस या उसके नीचे रखेंगे.

इसके लिए सभी देशों को अपना लक्ष्य तय करना है. इन लक्ष्यों को इस साल दिसंबर में पेरिस में होने वाले संयुक्त राष्ट्र के जलवायु संकट पर होने वाले सम्मेलन में रखा जाएगा.

इस दौरान सभी देशो के लक्ष्यों को मिलाकर देखा जाएगा कि क्या यह लक्ष्य उस स्तर तक पहुंचेगा कि तापमान वृद्धि दो डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे रह सके, इस पर अभी संदेह है.

भारत को भी अपना एक लक्ष्य तय कर दुनिया के सामने रखना है.

भारत का लक्ष्य

जलवायु परिवर्तन का मामला जब पहले उठा तो यह माना जाता था कि विकासशील देशों को कोई लक्ष्य तय करने की ज़रूरत नहीं है, केवल विकसित देशों को ही लक्ष्य तय करना चाहिए. लेकिन अब 2015 में यह माना जा रहा है कि भारत, ब्राज़ील और चीन जैसे बड़े विकासशील देशों ने अगर कोई लक्ष्य नहीं तय किया तो यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा.

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पिछले सालों में हुए सम्मेलनों में भारत कहता रहा है कि वो 2025 तक कार्बन उत्सर्जन और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात को 25 फ़ीसदी कम करेगा.

भारत को अब 2030 तक का लक्ष्य रखना है. ऐसे में मुझे लगता है कि यह लक्ष्य 40 से 50 फ़ीसदी तक हो सकता है. मैं उम्मीद करता हूं कि भारत ऐसा लक्ष्य रखेगा.

भारत को करना यह चाहिए कि विकसित देशों पर इस बात का दबाव डाला जाए कि उन्होंने जो लक्ष्य तय किए हैं, उसे और बढ़ाएं, ख़ासकर अमरीका ने बहुत कमज़ोर लक्ष्य तय किया है.

सरकारी लक्ष्य

दुनिया के देशों की ओर से रखे जा रहे लक्ष्य को इंटेंडेट नेशनली डिटर्मिन कांट्रिब्यूशंस (आईएनडीसीएस) कहते हैं.

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लेकिन दुर्भाग्य से ये केवल सरकारी लक्ष्य बनकर रह गए है.

यह काम केवल सरकार ही नहीं कर पाएगी. इसके लिए सरकार, उद्योगों और आम लोगों को मिलकर लक्ष्य तय करना होगा.

अगर हमें प्रदूषण कम करना है तो बिजली और गाड़ियों से होने वाले कार्बन डॉई ऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करना होगा.

यह लक्ष्य तब तक पूरा नहीं किया जा सकता है, जबतक कि अमरीका और यूरोप अपने उत्सर्जन को कम नहीं करेंगे.

ऐसा होने पर ही भारत और चीन जैसे देश अपने लक्ष्य को थोड़ा बढ़ा सकते हैं.

ग़रीबों को बिजली

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Image caption पेरिस में होने वाले सम्मेलन में भारत को भी अपना एक लक्ष्य रखना है.

यही बात भारत में भी लागू होती है, हमारे यहां के भारी उद्योग, अमीर तबक़े और गाड़ियों से होने वाला उत्सर्जन तभी कम होगा, जब गाड़ियों की संख्या कम हो और लोग सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें.

देश के 30-40 फ़ीसदी लोगों तक बिजली नहीं हैं, अगर ऐसे लोगों तक बिजली पहुंचानी है, तो बिजली पैदा करनी होगी. लेकिन इससे प्रदूषण बढ़ेगा.

इससे बचने का उपाय यह हो सकता है कि दिल्ली जैसे शहरों के घरों में जहां 4-5 एयरकंडीशनर इस्तेमाल होते हैं, अगर लोग एयरकंडीशनर की संख्या कम कर दें तो हमारी ग़रीब जनता को भी बिजली मिल जाएगी.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से हुई बातचीत पर आधारित)

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