'नेशनल हेरल्ड अभी पीछा नहीं छोड़ेगा'

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जब मेरी किताब '24, अकबर रोड' प्रकाशित हुई थी तो उसके कुछ समय बाद ही एक पत्रकार मित्र ने मुझसे कहा था, "आप एक किताब क्यों नहीं लिखते 'जवाहरलाल नेहरू का स्थापित किया और सोनिया गांधी का ज़मींदोज़ कियाः नेशनल हेरल्ड का संक्षिप्त इतिहास'.

उसके तीन साल बाद जब नेशनल हेरल्ड को लेकर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस के कुछ अन्य दिग्गजों पर केस दर्ज किया गया तो मैंने सोचा कि क्या 1938 में शुरू नेशनल हेरल्ड ने नेहरू-गांधी परिवार को कभी कोई प्रतिष्ठा दिलवाई भी?

आख़िर आज के ऑर्गेनाइज़र, पांचजन्य या गणशक्ति की तरह नेशनल हेरल्ड का प्रसार न तो कभी बहुत ज़्यादा था और न ही पार्टी से जुड़े लोग इसे उत्सुकता से पढ़ते थे.

बहुत सारे ट्रस्टों और ट्रस्टियों की वजह से अख़बार का मालिकाना और संपादकीय नियंत्रण हमेशा जटिल रहा. वित्तीय रूप से नेशनल हेरल्ड पहले दिन से ही विफल रहा है.

आज़ादी से पहले जवाहरलाल नेहरू इसमें बेहद सक्रिय थे तब अख़बार तीन साल तक बंद रहा. इसका बहाना तो ब्रितानी सेंसरशिप थी लेकिन कहा जाता है कि असली वजह पैसे की कमी थी.

नेहरू ने एक बार लखनऊ में नेशनल हेरल्ड के कर्मचारियों के सामने स्वीकार भी किया था, "हमें बनियागीरी नहीं आई."

नेहरू का जुड़ाव 1938 में स्थापित इस अख़बार से इतना ज़्यादा था कि उन्होंने ऐलान कर दिया था, "मैं नेशनल हेरल्ड को बंद नहीं होने दूंगा चाहे मुझे आनंद भवन (इलाहाबाद में मौजूद पारिवारिक घर) बेचना पड़े".

नेहरू के जीवनी लेखक बेंजामिन ज़कारिया ने लिखा है, "कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान के कारण उलझनों में घिरे नेहरू ने पत्रकारिता में शरण ली थी. 1936 में उन्होंने अपना अख़बार चलाने पर विचार किया. नौ सितंबर, 1938 को नेशनल हेरल्ड का पहला औपचारिक अंक लखनऊ से आया."

ज़कारिया दावा करते हैं कि नेहरू ने अपना नाम इस्तेमाल किए बिना 72 पाठकों के लिए कुछ एडिटोरियल भी लिखे थे जो उन सिद्धातों पर आधारित थे जिन पर वह सार्वजनिक जीवन में बात नहीं कर सकते थे.

आज़ादी के बाद नेशनल हेरल्ड तब तक आराम से चला जब तक फ़िरोज़ गांधी इसके महाप्रबंधक थे और इसे नेहरू का समर्थन हासिल था.

कई बार नेहरू ने बतौर प्रधानमंत्री अपने विचार स्पष्ट रूप से कहने के लिए नेशनल हेरल्ड का इस्तेमाल किया.

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जाने माने पत्रकार इंदर मल्होत्रा के अनुसार अप्रैल, 1954 में जब अमरीका ने बिकिनी द्वीपसमूह में परमाणु परीक्षण किए तो लखनऊ में मौजूद नेहरू ने किसी भी रिपोर्टर के सामने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और सीधे नेशनल हेरल्ड के कार्यालय पहुंचे.

उन्होंने "अपने नाम से एक तीखा लेख लिखा, जिसका शीर्षक था 'मौत का सौदागर'".

अख़बार ने एम चलपति राव के नेतृत्व में उच्च पेशेवर स्तर का काम किया.

राव न सिर्फ़ कमाल के संपादक थे बल्कि प्रेस काउंसिल और पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड बनाने में उनकी सक्रिय भूमिका थी. 1983 में जब उनकी मृत्यु हुई तो वह काफ़ी हताश हो चुके थे क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नज़दीक माने जाने वाले कई लोगों के साथ उनके झगड़े चल रहे थे.

दिल्ली में तब इस तरह की अफ़वाहें उड़ती थीं कि कांग्रेस ने संदिग्ध तरीकों से जो पैसा कमाया है, उसे अख़बार में झोंका जा रहा है.

यह ऐसा आरोप था जो अक्सर लगाया जाता था लेकिन कभी साबित नहीं हो सका. 22 मई, 1991 को नेशनल हेरल्ड राजीव गांधी की हत्या की ख़बर को ब्रेक नहीं कर पाया क्योंकि एक रात पहले श्रीपेरंबदूर में उनकी हत्या के बाद मायूसी की भावना छा गई थी.

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राजीव गांधी की मौत के बाद नेशनल हेरल्ड का पतन बहुत तेजी से हुआ.

नेशनल हेरल्ड लखनऊ की 'नेहरू मंजिल' से प्रकाशित होता था. 1998 में नेहरू मंजिल में सरकारी अधिकारियों ने नेशनल हेरल्ड की संपत्तियों को नीलाम कर दिया जबकि वहां लगा नेहरू का एक बड़ा पोट्रेट जैसे घटना को उदासी से देख रहा था.

दिल्ली के ऑफ़िस में एक मज़ाक हमेशा चलता था कि अख़बार की वास्तविक बिक्री की संख्या अख़बार में काम करने वालों की संख्या से भी कम है.

एक बार सैम पित्रोदा बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग स्थित हेरल्ड हाउस के दफ्तर में, वहां की प्रेस में छप रही चुनाव सामग्री के सिलसिले में गए थे. वह तेज़ी से जा रहे थे कि उन्होंने किसी से नेशनल हेरल्ड की प्रसार संख्या के बारे में पूछा.

एक ज़िम्मेदार आदमी ने तुरंत बोला 90. पित्रोदा, जो ज़्यादातर ज़िंदगी अमरीका में बिताने वाले एक टैक्नोक्रेट थे, इस संख्या से ज़ाहिराना तौर पर प्रभावित दिखे, क्योंकि उन्हें लगा कि यह संख्या 90,000 है.

उस समय नेशनल हेरल्ड 5,000 प्रतियां छापता था लेकिन उनमें से ज़्यादा 'कॉम्पलीमेंट्री' की मुहर लगा कर इंडियन एयरलाइंस के यात्रियों, आईटीडीसी होटलों में ठहरने वालों, कांग्रेस सांसदों, प्रधानमंत्री कार्यालय, एआईसीसी पदाधिकारियों और अन्य लोगों को भेज दी जाती थीं. वास्तविक बिक्री आश्चर्यजनक रूप से बेहद कम थी.

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पहले यह लखनऊ में बंद हुआ और एक अप्रैल, 2008 को इसके अंतिम संस्करण में एक घोषणा थी कि इसका 'संचालन अस्थाई रूप से रोक दिया गया है'.

1991 से 2008 की यात्रा दरअसल कष्टप्रद थी. अख़बार से जुड़े कई पेशेवर और अच्छे पत्रकारों को पैसा नहीं दिया गया. अंततः 40 करोड़ रुपए में जो समझौता हुआ उससे उम्मीद के विपरीत बहुत कम लोगों को फ़ायदा हुआ.

स्तंभकार सिदिन वादुकुट के अनुसार, भले ही नेशनल हेरल्ड मज़बूत राजनीतिक इरादों के साथ शुरू हुआ हो लेकिन बहुत सी अन्य नेहरूवादी परियोजनाओं के तरह यह भी अपने उद्देश्य से ज़्यादा समय तक बना रहा.

उनके मुताबिक अख़बार अपनी ही छवि के मोह का शिकार हो गया, जिसके पास अपनी हालत सुधारने के लिए आर्थिक प्रेरणा का भी अभाव था.

राजीव गांधी के बाद के समय में पीवी नरसिम्हा राव, सीताराम केसरी और सोनिया गांधी को नेशनल हेरल्ड की, पार्टी के विचारों को अभिव्यक्त करने की, क्षमता में बहुत कम या ज़रा भी यकीन नहीं था.

90 के दशक से अब तक आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर विचारधारा के अभाव की वजह से अख़बार जैसे मंच की ज़रूरत भी नहीं थी. शायद यही वह मुख्य वजह थी जो 2008 में अख़बार के अंतिम रूप से बंद होने (अस्थाई रूप से काम रोके जाने की आड़ में) की वजह बनी.

हालांकि कहा जाता है कि 2011 में सोनिया गांधी की बीमारी और राहुल गांधी की अनुभवहीनता की वजह से ट्रस्ट और ट्रस्टियों के कुछ कट्टर सलाहकारों ने इसे पुनर्जीवित करने की बड़ी योजना बनाई.

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अख़बार से जुड़ी देश भर में फैली कई कथित संपत्तियों और ज़मीन को ख़रीदने और बेचने वाले बहुत सारे थे और कई उलझाने वाले मुक़दमे थे. यह तो नहीं कहा जा सकता कि नई व्यवस्था पूरी तरह ग़ैरकानूनी थी लेकिन इनसे अनुचित काम की गंध आती थी.

ऐसा लगता है कि नेशनल हेरल्ड का मुद्दा कुछ और वक़्त तक नेहरू-गांधी परिवार और कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ने वाला. शायद उन्हें अख़बार के कारोबार में हाथ डालने के बारे में नेहरू की पुरानी टिप्पणी पर फिर विचार करना चाहिए कि 'हमें बनियागीरी नहीं आई'.

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