नशीले पदार्थों का 'ट्रांजिट प्वाइंट है भारत'

नशीले पदार्थों का सेवन और तस्करी पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती है क्योंकि एक बड़ी आबादी इसकी चपेट में है.

विश्व में यह कारोबार फैल रहा है और इससे चिंतित अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बयान जारी किया गया था, जिसमें 21 देशों को नशीले पदार्थों के उत्पादन और तस्करी के मुख्य केंद्रों के रूप में चिन्हित किया गया है.

व्हाइट हाउस के बयान में बोलीविया, बर्मा और वेनेज़ुएला को ऐसे देशों के रूप में चिन्हित किया गया है जिन्होंने नशीले पदार्थों के उत्पादन और तस्करी को रोकने के लिए तय किए गए मानदंडों का पालन नहीं किया है.

संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स और क्राइम संस्था की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार जहाँ कोलंबिया, पेरू और बोलीविया कोकीन के सबसे बड़े उत्पादक हैं, वहीं अफ़ग़ानिस्तान विश्व का सबसे बड़ा अफीम का उत्पादक है.

अफ़ग़ानिस्तान में हो रहे अफीम के उत्पादन को भी एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले 15-16 सालों से अफ़ग़ानिस्तान विश्व का सबसे बड़ा अफीम का उत्पादक बना हुआ है.

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नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो यानी एनसीबी के महानिदेशक रहे राजीव मेहता कहते हैं कि ऊपर अफ़ग़ानिस्तान और बग़ल में नेपाल और बर्मा की वजह से भारत नशीले पदार्थों की तस्करी का 'ट्रांजिट प्वाइंट' बना हुआ है.

हलाकि उनका कहना है कि पूरे विश्व की अगर बात की जाए तो भारत में नशे का प्रचलन उतना नहीं है जितना कि दूसरे देशों में खास तौर पर अमरीका में.

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फिलहाल मेघालय के पुलिस महानिदेशक के रूप में तैनात राजीव मेहता कहते हैं, "भारत ट्रांजिट प्वाइंट भी है और यहाँ खपत भी होती है. लेकिन यहाँ उतनी खपत नहीं होती है. अगर दूसरे देशों से तुलना करें तो चिंता वाली कोई बात नहीं है. लेकिन अलग थलग करके सिर्फ भारत को देखा जाए तो यह चिंता का विषय ज़रूर है."

मेहता के अनुसार वर्ष 2000 में जब तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा किया था तो उसने अफीम की खेती को ग़ैर इस्लामिक घोषित कर उस पर प्रतिबंध लगा दिया था.

अफ़ीम की खेती बिलकुल बंद हो गई थी. लेकिन उनका कहना है कि बाद में पैसों और हथियारों की वजह से तालिबान ने अफ़ीम की खेती को फिर से शुरू करवा दिया था.

फिर अमरीका के नेतृत्व में विदेशी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे. लेकिन उन्होंने अफ़ीम की खेती को बदस्तूर जारी रहने दिया.

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हलांकि दूसरे देश की सेनाओं ने इस पर आपत्ति जताई. लेकिन पेंटागन का कहना था कि अगर अफ़ीम की खेती रुकवा दी जाती है तो फिर अफ़ग़ान तालिबान की शरण में चले जाएँगे.

अब जबकि अमरीकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से लौट रहे हैं, मेहता ने आंकड़ों के हवाले से बताया कि अफ़ीम की खेती में गिरावट देखी जा रही है.

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एनसीबी के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान और बर्मा में पैदा होने वाली अफ़ीम और उससे बनने वाली कोकीन ज़्यादातर यूरोप, अमरीका और दक्षिण उत्तर एशिया में भेजी जाती है.

भारत में सख्त अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की वजह से इसकी तस्करी का मुख्य रास्ता समुद्र ही है.

हलांकि सरहद से भी बड़े पैमाने पर तस्करी होती आ रही है लेकिन उसकी तादात उतनी नहीं है जितना माल इन देशों से यूरोप और अमरीका या दक्षिण पूर एशिया में भेजा जा रहा है.

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