यूएन में भारत की स्थाई सदस्यता की राह के रोड़े

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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में स्थायी सदस्यता को लेकर भारत की कोशिशें एक क़दम और आगे बढ़ी हैं.

संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) ने नवंबर में सुरक्षा परिषद में सुधार और विस्तार के लिए लिखित समझौता वार्ता का निर्णय लिया है.

खुले वर्किंग ग्रुप में अभी तक इस पर कोई नतीजा नहीं निकल पाया है.

यह गतिरोध उन लोगों के लिए मुफ़ीद था जो विस्तार का विरोध कर रहे थे, जिनमें सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य और सहमति के लिए एकीकृत ग्रुप (यूएफ़सी) शामिल हैं.

यूएफ़सी में पाकिस्तान (भारत की सदस्यता का विरोधी), इटली (जर्मनी का विरोधी), मैक्सिको और अर्जेंटीना (ब्राज़ील के विरोधी), कोरिया गणतंत्र (जापान का विरोधी), मिस्र (अफ़्रीका को दी जाने वाली दो सीटों में से एक का इच्छुक) और इसी तरह के कई अन्य देश हैं.

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इसमें कोई शक नहीं कि लिखित बातचीत की शुरुआत इस दिशा में कुछ प्रगति है लेकिन ऐसा मानना कि भारत अब स्थाई सदस्यता के बेहद क़रीब पहुंच गया है, ग़लत होगा.

ये लिखित बातचीत उन पांच मानदंडों पर एल-69, अफ़्रीका या कैरिकॉम ग्रुप्स या जी-4 जैसे विभिन्न समूहों के विभिन्न नज़रिए का 25 पन्नों वाला सारांश दस्तावेज है.

इनमें स्थायी और अस्थायी श्रेणियों में विस्तार के आकार, क्षेत्रीय वितरण, सुरक्षा परिषद के काम करने का तरीक़ा, यूएनजीए के साथ इसका संबंध और वीटो पावर के मुद्दे शामिल हैं.

ये ऐसे जटिल मुद्दे हैं जिन पर अभी तक कोई सहमति नहीं बनी है, यहां तक कि उन देशों के बीच भी, जो सुधार और विस्तार के समर्थक हैं.

बातचीत के लिए जो लिखित चिठ्ठी पत्री दी जा रही है वो सहमति दस्तावेज़ या ऐसी कोई चीज नहीं है जिसमें मौजूदा यूएनजीए बैठक में संभावित रूप से अंतिम रूप दिए जाने के लिए महज थोड़ी रद्दोबदल की ज़रूरत पड़े.

वास्तविकता ये है कि किसी सहमति पर पहुंचना एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है. मुख्य मुद्दा है कि 1945 में स्थापित वैश्विक शक्ति के इस ढांचे में बदलाव किया जाए ताकि वो आज की ज़रूरतों पर खरा उतर सके.

विस्तार हो पाएगा ?

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इस तंत्र में जिनके पास अपार शक्ति हासिल है वो इसे आसानी से नहीं छोड़ेंगे और इसमें शामिल होने की इच्छा रखने वाले नए सदस्यों को अपने प्रतिद्वंद्वियों के विरोध का सामना करना पड़ेगा.

इसलिए कुछ विश्लेषकों को इस बात पर गहरा संदेह है कि निकट भविष्य में सुधार या विस्तार हो पाएगा.

उनका मानना है कि भारत के अधिकारी हवाई उम्मीद पैदा कर रहे हैं और लिखित बातचीत को ऐसे दिखा रहे हैं मानो कोई बड़ी सफलता हाथ लग गई हो.

अगर मान भी लिया जाए कि लिखित बातचीत का नतीजा सफल रहता है तो भी इस तथ्य के प्रति सजग रहना चाहिए कि चीन, रूस और यूएफ़सी देशों ने इसे रोकने के लिए विभिन्न देशों की राजधानियों में इसके विरोध में लॉबिंग की थी.

यह दिखाता है कि इस क़दम को वे सुधार और विस्तार के अपने रुख़ के ख़िलाफ़ समझते हैं.

चीन-रूस का विरोध

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लिखित बातचीत में सहयोग न करने के चीन और रूस के फ़ैसले का मतलब है कि इस प्रक्रिया में रचनात्मक सहयोग देने की उनकी मंशा नहीं है.

लिखित बातचीत में अपने पत्रों को भी शामिल करने की मांग कर यूएफ़सी देश चाहते हैं कि उनके विचार भी जाने जाएं. लेकिन उन्होंने औपचारिक रूप से इस प्रक्रिया से अपना नाता तोड़ लिया है.

अमरीका ने तो इस कोशिश को नज़रअंदाज़ ही कर दिया है. केवल फ़्रांस और ब्रिटेन ने अपना नज़रिया पेश किया है, भारत को दोनों का ही समर्थन हासिल है.

लिखित बातचीत के ख़िलाफ़ रूस के सक्रिय विरोध ने भारत को हैरान कर दिया है.

रूस का तर्क

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रूस का तर्क है कि दो तिहाई से अधिक मतों से विस्तार का फ़ैसला करना संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का उल्लंघन है और इस मुद्दे पर लगभग पूरी सहमति हासिल करने में विफलता से संयुक्त राष्ट्र पहले से ज़्यादा विभाजित हो जाएगा.

उसका यह तर्क यक़ीन करने वाला नहीं है.

स्थायी सदस्यता के मसले पर द्विपक्षीय वार्ताओं में तो रूस भारत की उम्मीदवारी का समर्थन करता है लेकिन बहुपक्षीय स्तर पर विस्तार की प्रक्रिया का विरोध करता है, जो कि हमारे नज़रिए से अजीब बात है.

कुछ लोगों का तर्क है कि जी-4 का सदस्य होने के नाते भारत की उम्मीदवारी कमज़ोर है क्योंकि जहां भारत, ब्राज़ील और अफ़्रीका को स्थायी सदस्यता देेने पर व्यापक सहमति है, वहीं जापान और जर्मनी की उम्मीदवारी का तगड़ा विरोध भी है.

रूस और पश्चिमी देशों, तो चीन-जापान के बीच बढ़ते तनावों और अमरीका द्वारा जापान का समर्थन करने के कारण यह मुद्दा और विवादित हो सकता है.

भारत की उम्मीद

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भारत के पास कारण है कि अलग से अपनी निजी कूटनीतिक कोशिशों पर भरोसा करने की बजाय, जी-4 अपनी सामूहिक कोशिश के सहारे विस्तार की प्रक्रिया को असरदार ढंग से आगे बढ़ाने का दबाव बना सकता है.

सबसे बड़ी चुनौती है कि इस बात को सुनिश्चित किया जाए कि यूएनजीए की नवंबर में होने वाली बैठक में विभिन्न सरकारों के बीच लिखित बातचीत को शुरू कराया जाए.

चूंकि संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य यूएनएससी के विस्तार और सुधार का समर्थन करते हैं इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि गंभीर चुनौतियों के बावजूद इस दिशा में प्रगति होगी और आख़िरकार कोई नतीजा निकलेगा.

नहीं तो सुरक्षा परिषद अपनी वो साख भी गंवा देगा जो उसके पास इस समय है.

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