ये हौसला कैसे झुके, ये आरज़ू कैसे रुके..

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लख़नऊ की मशहूर भूलभूलैया से 10 किलोमीटर दूर मोहान रोड पर सरोसा गांव के बबूल के जंगल में सिर्फ जज़्बे और जुगाड़ के सहारे एक अनोखा ट्रेनिंग सेंटर चल रहा है.

यहां दलित और पिछड़े परिवारों के क़रीब 40 लड़के देसी स्टाइल के कोच सोनू रावत से जिम्नास्टिक्स की ट्रेनिंग लेने आते हैं. साथ ही डांस और मार्शल आर्ट्स की भी प्रैक्टिस चलती है.

बिना संसाधनों के इनके प्रदर्शन का स्तर काफी अच्छा है, मौका मिले तो बड़े शहरों में होने वाली बड़ी प्रतियोगिताओं में कमाल दिखा सकते हैं.

इन करतबबाजों की उम्र सात से 27 साल के बीच है जो मोहान रोड के किनारे बसे भरोसा, बुद्धेश्वर, नरौना, काकोरी, फतेह खेड़ा आदि गांवों के बेहद ग़रीब परिवारों के रहने वाले हैं.

इनमें से ज्यादातर काम करते हैं. कोई छत ढालने से पहले सरिया बिछाने का काम करता है, कोई बढ़ई है, कोई पारचून की दुकान में लगा है और कोई बारातों में जनरेटर खींचते और सिर पर लाइटें ढोते हैं.

रंजीत और अतुल यहां जिम्नास्टिक्स की प्रैक्टिस के साथ टीवी के डांस शो से सीखते हुए उम्दा डांसर बन गए हैं जो स्टेज शो करते हैं और गांव के बच्चों को डांस सिखाने लगे हैं जिसका ज़बरदस्त जुनून है.

सदमे से शुरुआत

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इस अनोखे ट्रेनिंग सेंटर की शुरूआत सोनू को गरीबी से लगे सदमे के कारण हुई थी. सोनू को जिम्नास्टिक्स का शौक था. वह किसी के कहने पर इलाहाबाद के जिम्नास्टिक्स ट्रेनिंग सेंटर गए.

वहां की फीस बहुत ज़्यादा थी. थोड़े दिन बाद वह मायूस होकर लौट आए और गांव में ही प्रैक्टिस करने लगे.

लोग मज़ाक उड़ाने लगे तो उसने जंगल में प्रैक्टिस शुरू कर दी जहां आसपास के गांवों के लड़के पहले देखने के लिए जुटने लगे फिर खुद भी खेलने लगे.

अब उनकी छोटी सी पलटन हाथ के बल चलती है, कलाबाज़ियां खाती है और जंगल में स्टंट करती और नाचती है.

जुगाड़ का सहारा

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सोनू बताते हैं, जिम्नास्टिक्स ट्रेनिंग के साजोसामान खरीदने के लिए पैसे नहीं थे इसलिए जुगाड़ का सहारा लिया गया.

बांस बल्लियों से पैरलल बार बनाया गया, बैक डिप्स करने के लिए गड्ढे खोद कर किनारे पर ईंटे जमा दी गईं, गद्दे का काम अखाड़े की भुरभुरी मिट्टी करती है, वेट ट्रेनिंग के लिए प्लेट के बराबर वजन के सीमेंट के गोले ढाल कर डंडों में लगा दिए गए, मार्शल आर्टस में किक प्रैक्टिस के लिए बैनरों और फ्लेक्स बोर्डों से पैड बन गए.

वाल्टिंग टेबल पर समरसाल्ट करने के लिए स्प्रिंगबोर्ड चाहिए, उसकी जगह बसों के खराब टायर का इस्तेमाल किया जाता है जिससे काम भर की उछाल मिल जाती है.

खुद खोदा अखाड़ा

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यहां हर सुबह और शाम पांच से सात बजे तक ट्रेनिंग होती है. ख़िलाड़ी अपने साथ फावड़ा लेकर आते हैं जिससे पहले अखाड़ा खोदा जाता है.

वॉर्म अप के बाद समरसॉल्ट, किकिंग और पैरलल बार पर सोनू रावत के निर्देशन में ट्रेनिंग होती है. ये ग्रामीण खेलों के ब्लॉक लेवल की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने और ईनाम जीतने लगे हैं और खुद भी प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं.

लड़कों ने तय किया है कि वे अपना क्लब बनाएंगे और बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेंगे. उनका हौसला देखकर आसपास के गांवों के लोग प्रभावित हुए हैं.

उनमें से कई ने आश्वासन दिया है कि अगर कोई लड़का राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में जाता है तो वे चंदा करके उसे भेजेंगे.

सोनू कहते हैं, "कुछ और हो न हो लड़के जुआ खेलने और फालतू घूमने से बचे रहेंगे. जो सुबह शाम दो ढाई घंटे अभ्यास करेगा उसमें इतनी ऊर्जा ही नहीं बचेगी कि फालतू घूमे और कुसंगति में पड़ कर बर्बाद हो."

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