अगर बिहार ने नीतीश को झटका दिया, तो..

लालू, नीतीश और मोदी इमेज कॉपीरइट AFP PRASHAN RAVI

बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजे आने में तक़रीबन छह हफ़्ते लगेंगे, तब तक हमें बिहार राजनीति की छोटी-बड़ी कहानियों की डोज़ पिलाई जाती रहेगी.

बिहार में मुक़ाबला कमोबेश दोतरफ़ा है. गणित एकदम साफ़ है एक विजेता होगा और दूसरे के हिस्से आएगी हार. मुश्किल है ये समझना कि जीतने वाला आख़िर जीतेगा कैसे और हारने की वजह क्या होगी?

बिहार में 243 विधानसभा सीटें हैं और हार जीत के इतने कारण गिनवाए जाएंगें कि वो भी आख़िरकार उतने ही लगेंगे - 243.

ख़ैर नतीजा कुछ भी रहे ज़ाहिर है नतीजों का अनुमान लगाना बेहद मुश्किल है. लेकिन ये अंदाज़ा तो लगाया ही जा सकता है कि 8 नवंबर के बाद हमें किस तरह के लेख पढ़ने को मिलेंगे.

पढ़ें, विस्तार से

1. नरेंद्र मोदी पर

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अगर भाजपा चुनाव जीतती है, तो मोदी के समर्थक और उनसे सहानुभूति रखने वाले कहेंगे कि ये इस बात का सबूत है कि लोगों ने प्रधानमंत्री के रूप में उनके कामकाज पर मुहर लगा दी है.

अगर भाजपा पराजित होती है तो मोदी के आलोचक कहेंगे कि उनकी लोकप्रियता घट रही है.

अगर भाजपा जीतती है, तो कहा जाएगा कि पार्टी ने चुनावों से पहले मुख्यमंत्री की घोषणा नहीं कर सही कदम उठाया था और दिल्ली से सही सबक़ सीखा.

अगरा भाजपा हारती है तो कहा जाएगा कि ये भाजपा के लिए सबक़ है कि उसे चुनावों से पहले मुख्यमंत्री पद की घोषणा करनी चाहिए थी.

बिहार का चुनाव निश्चित तौर पर बिहार की जनता के बीच मोदी की लोकप्रियता का पैमाना होगा. क्योंकि चुनाव सीधे-सीधे मोदी के नाम पर लड़ा जा रहा है.

यहाँ ये कहना ज़्यादा सही होगा कि ये चुनाव केंद्र में मोदी के प्रदर्शन का आईना होंगे. साथ ही बिहार की जनता के बीच उनका 'करिश्मा' भी दांव पर होगा.

अगर मोदी ऐसा करने में कामयाब रहे, तो ये बिहार की राजनीति में बड़ा फेरबदल होगा, क्योंकि बिहार में कभी भी भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं रहा है.

2. नीतीश कुमार पर

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अगर ये चुनाव नीतीश कुमार जीतते हैं, तो उन्हें अरविंद केजरीवाल के बाद दूसरे व्यक्ति के तौर पर पेश किया जाएगा, जिसने नरेंद्र मोदी को मात दी है.

कहा जाएगा कि नीतीश भाजपा के ख़िलाफ़ इसलिए जीत दर्ज कर सके हैं क्योंकि वह अच्छे प्रशासक हैं. कहा जाएगा कि ये सबूत है कि लोगों ने सुशासन के लिए वोट किया है.

अगर नीतीश कुमार हार जाते हैं, तो भाजपा समर्थक कहेंगे कि वह अच्छे प्रशासक थे, लेकिन इसलिए हारे क्योंकि उनकी नरेंद्र मोदी के साथ निजी कटुता थी. ये भी कहा जाएगा कि अहंकार राजनीति के लिए ख़राब है, ये भी कि बिहारी जनता ने लालू के साथ हाथ मिलाने की उनकी मौक़ापरस्ती को ख़ारिज कर दिया है.

हालाँकि भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों में बिहार में 40 में से 32 लोकसभा सीटें जीती थी. सीएसडीएस के एक सर्वे में भाजपा से नाता तोड़ने के बावजूद 64 प्रतिशत लोगों ने बतौर मुख्यमंत्री नीतीश के काम पर संतोष जताया था.

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भाजपा समर्थक अगड़ी जातियों के मतदाताओं को छोड़कर बिहार के लोगों के पास नीतीश के बारे में कहने के लिए कई अच्छी बातें हैं, लेकिन कुछ वजहें हैं कि जिनके कारण ये ‘अच्छी बातें’ शायद वोटों में न बदलें. हो सकता है कि नीतीश को दो कार्यकाल देने के बाद जनता भाजपा को एक मौक़ा देना चाहती हो.

इस सभी कारणों के बावजूद, नीतीश चुनाव जीत सकते हैं, क्योंकि वे जनता के बीच लोकप्रिय हैं. अगर वो हारते भी हैं तो ये सच नहीं बदल जाएगा कि बिहार की जनता के बीच नीतीश विरोधी हवा नहीं थी.

3. केंद्र सरकार पर असर

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कुछ लोग फिर राग अलापने लगेंगे कि राज्यों के चुनाव में जीत नरेंद्र मोदी को राज्य सभा में बहुमत दिलाएगी और फिर वो मनमाफिक़ क़ानून बना सकेंगे. लेकिन सच्चाई ये है कि इस लोकसभा के कार्यकाल में तो ऐसा नहीं होने वाला.

अन्य शब्दों में, बिहार चुनावों के नतीजे, नीतियां या विधेयक पारित कराने में केंद्र सरकार के हाथ को मज़बूत नहीं करेंगे. हरियाणा और महाराष्ट्र की जीत भी केंद्र में कुछ ख़ास नहीं बदल सकी है. शेयर बाज़ारों में ज़रूर कुछ उथल-पुथल मचेगी, लेकिन सेंसेक्स का न तो ‘सेंस’ है और न ही ‘सेक्स’.

जबकि बिहार में हार से नरेंद्र मोदी राजनीति में कमज़ोर पड़ेंगे, हालाँकि इससे उनके प्रधानमंत्री पद पर किसी तरह की आंच आने की आशंका नहीं है.

कुछ लोगों को ये भी डर है कि मोदी अगर बिहार चुनाव हारते हैं, तो वो विकास को एक किनारे रखकर हिंदुत्व की राजनीति पर आक्रामक रूप से आगे बढ़ सकते हैं. ऐसा होना भी मुश्किल है, क्योंकि 2019 अभी दूर है.

4. भारतीय जनता पार्टी पर

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बिहार में जीत का मतलब लंबी अवधि में भाजपा के लिए बहुत कुछ है. बिहार में भाजपा खुद को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित करेगी.

अब तक बिहार की राजनीति में उसे जदयू के जूनियर पार्टनर के रूप में जाना जाता है.

बिहार में जीत से उत्तर प्रदेश और अन्य राज्य विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2019 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा को फ़ायदा होगा. बिहार का मौजूदा चुनाव मोदी के बजाय अमित शाह की स्थिति पर अधिक असर डालेगा. बिहार में हार से आरएसएस पार्टी पर और अधिक हावी हो सकता है.

5. जातीय राजनीति पर

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पत्रकार और विश्लेषक इस मुद्दे पर सबसे अधिक लिखेंगे. अगर भाजपा जीतती है तो राजनीतिक पंडित लिखेंगे कि लोगों ने जाति से ऊपर उठकर विकास के लिए वोट दिया है.

अगर नीतीश का गठबंधन विजयी रहता है तो यादव एक बार फिर सत्ता में लौट आएंगे. बिहार में लालू के कथित ‘जंगलराज’ की बातें अभी अधिकतर लोग ख़ासकर अगड़ी जातियां नहीं भूली हैं.

अगर भाजपा सत्ता में आती है तो सत्ता अगड़ी जातियों के हाथों में होगी और निचली जातियों को फिर से डर सताने लगेगा.

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