कहाँ है आपके दिमाग़ का 'रीसेट बटन'?

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कामकाजी दुनिया की रोज़ाना की दौड़-धूप लोगों को इतना परेशान कर सकती है कि उनकी शारीरिक और मानसिक तंदुरुस्ती को प्रभावित कर सकती है.

लेकिन कुछ विशेषज्ञों के सुझाए रास्ते पर चलकर अनेक लोग समय-समय पर न केवल अपनी तंदुरुस्ती बरक़रार रख रहे हैं, बल्कि शरीर और दिमाग़ में नई ऊर्जा का संचार कर रहे हैं.

इन नए रास्तों में ध्यान, योग, दिन की शुरुआत ग़ैर-पारंपरिक तरीकों से करना शामिल है.

कैलिफ़ोर्निया का डेब्रेकर

दक्षिण कैलिफोर्निया में हफ़्ते के बीचोंबीच, गुरुवार को कई लोग तड़के साढ़े पांच बजे, नींद में अनमने से समुद्र तट पर एकत्र हुए मिलेंगे. ये सब लोग एक नाव पर योग करने के लिेए जमा हुए हैं.

नाव पर योग 45 मिनट का है. इसमें ध्यान, गहरी सांसें लेना-छोड़ना शामिल हैं. इसके बाद दो घंटे तक ये डेब्रेकर नामक रेव म्यूज़िक कार्यक्रम में शामिल होते हैं.

ये गर्मियों की छुट्टियों में मौज मस्ती का अहसास कराता है. लेकिन इसमें शामिल कई लोग महीने में दो बार अपने कामकाजी दिन की शुरुआत इसी तरह से करते हैं.

डेब्रेकर से मतलब सुबह में आपकी उस गतिशीलता से है जिसके साथ आप अपने दिन की शुरुआत करना चाहते हैं.

यह केवल लॉस एंजलिस का चलन नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत न्यूयार्क सिटी के यूनियन स्कॉवयर के कॉफी शॉप के बेसमेंट में हुई थी.

दो साल के अंदर यह दुनिया के आठ प्रमुख शहरों में फैल गया है, जिनमें तेल अवीव, लंदन, साओ पाउलो शामिल हैं.

आप 30 डॉलर (लॉस एंजिलिस में) देकर योगाभ्यास और डांस पार्टी दोनों में शामिल हो सकते हैं.

दिन की शुरुआत पार्टी से क्यों?

इसमें शामिल लोग इसे एक्सट्रीम वेक-अप कॉल बताते हैं जिसमें ख़ूब सारे अभ्यास, कॉफी का सेवन शामिल है लेकिन ये लोग सुबह की जल्दी शुरुआत के बाद भी ख़ुद को बाक़ी के दिन में बहुत ऊर्जावान महसूस करते हैं और दफ़्तर में उनका दिन प्रोडक्टिव होता है.

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डेब्रेकर के सह निर्माता आंद्रे हर्ड इसका मक़सद बताते हुए कहते हैं, "इसका लक्ष्य दिन की रूटीन को पलट देना है. दिन भर की व्यस्तताओं और बैठकों से पहले कुछ मौज मस्ती और ऊर्जा का अनुभव हासिल करना ही इसका उद्देश्य है."

रेव-स्टाइल की एक दूसरी पार्टी मॉर्निंग ग्लोरीविल में भी योग और मसाज का इस्तेमाल किया जाता है. इसकी शुरुआत लंदन में हुई थी. डेब्रेकर की तरह से यह भी दिमाग़ और शरीर को नए सिरे से तरोताज़ा करने का नया उपाय माना जा रहा है.

इसी तरह से अमरीका में इंडोर साइक्लिंग फ़िटनेस चेन सोलसाइकिल (आत्मा का चक्र) कंपनी ने तो इस जुलाई में अपने शेयर भी बाज़ार में उतारे.

इस कंपनी का मिशन शरीर, दिमाग़ और आत्मा को फ़ायदा पहुंचाने का है.

इसकी वेबसाइट के मुताबिक बेहतर प्रशिक्षक, कम रोशनी, शानदार जगहों और संगीतमय वातावरण से लोग ख़ुद को सशक्त कर सकते हैं.

सुबह समय नहीं, तो ऐप कारगर

सुबह-सुबह होने वाले अभ्यास चाहे डेब्रेकर हों या फिर मार्निंग ग्लोरीविल, लोगों के बीच ख़ासे लोकप्रिय हो रहे हैं. हालांकि ज़्यादातर लोगों के पास सुबह दो घंटे फ़्री समय नहीं होता है.

ज़्यादातर लोगों की सुबह बस या ट्रेन में सफर करने, बच्चों को स्कूल पहुंचाने, कुत्ते को वॉक पर ले जाने जैसे व्यस्तताओं वाली होती है. उनके पास वक्त की कमी होती है.

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ऐसी ही व्यस्तताओं में घिरे, ध्यान लगाने वाले एक ऐप के संस्थापक हैं एंडी पुड्डीकोम्ब. स्मार्ट फ़ोन और टेबलेट में आसानी से डाउनलोड हो जाने वाला ये डिजिटल ऐप है हेडस्पेस. एंडी पुड्डीकोम्ब कहते हैं, "मैं ऐप इस्तेमाल करने वाले विचार के पक्ष में हूं क्योंकि मेरे लिए तो सुबह साढ़े पांच बजे उठना संभव ही नहीं है."

पुड्डीकोम्ब कहते हैं, "हेडस्पेस ऐप उन लोगों के लिए डिज़ाइन किया गया है जिनके पास ऐसे कार्यक्रमों में जाने का समय नहीं है."

पुड्डीकोम्ब ने एशिया में बौद्ध भिक्षुक के तौर पर प्रशिक्षण लिया है और कैलिफोर्निया के सांटा मोनिका इलाके में रहते हैं.

उनके मुताबिक इस ऐप के जरिए अभ्यास करने से 10 से 15 मिनट के अंदर आपका दिमाग तरोताजा हो जाता है और ये कहीं भी संभव है, ट्रेन या बस से यात्रा करते हुए भी.

कुछ ही पलों में तरोताज़ा

पुड्डीकोम्ब कहते हैं, "ध्यान को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी ये है कि यह शांत जगह पर ही संभव है. मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि ट्रेन में यात्रा करने के दौरान, व्यस्त एयरपोर्ट पर भी या फिर घर पर ध्यान किया जा सकता है."

पुड्डीकोम्ब के दावे के मुताबिक रात में ख़राब नींद के बावजूद दिन की शुरुआत करने से पहले ध्यान के कुछ पल ही आपको तरोताज़ा कर सकते हैं.

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उन्होंने अपने ऐप को 2012 में पेश किया और इसे अब तक 35 लाख बार डाउनलोड किया जा चुका है. ऐप डाउलोड और फाउंडेशन कोर्स तो मुफ्त में किया जा सकता है. लेकिन एडवांस गाइड के लिए आपको प्रति महीने करीब 13 डॉलर चुकाने होते हैं.

रोजाना के अभ्यास से दिमाग तो शांत होता ही है, साथ में कुछ ऐसे सेशन हैं जिनकी मदद से आपकी कामकाजी क्षमता बढ़ती है और आपकी एकाग्रता भी बढ़ती है.

हाल के दिनों में अध्यात्मिक अभ्यास और ध्यान की बढ़ती लोकप्रियता बड़ी है. इसकी वजह है ध्यान के सकारात्मक मनोवैज्ञानिक और शारीरिक असर के वैज्ञानिक सबूत मिले हैं.

लॉस एंजिलिस की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया के ब्रेन रिसर्चर डॉ फ्लोरियान कुर्थ कहते हैं, "जो लोग अध्यात्म या फिर ध्यान का सहारा ले रहे हैं, उन्हें एकाग्रता, यादाश्त, बोलचाल और कामकाजी गतिविधियों में फ़ायदा हो रहा है."

माइंड का 'रीसेट बटन' दबाएँ

कुर्थ आगे कहते हैं, "अगर आप ध्यान लगाते हैं तो रोजाना की कई गतिविधियों में कुशलता बढ़ जाती है."

हेडस्पेस ऐप के संस्थापक एंडी पुड्डीकोम्ब कहते हैं कि 10-15 तक भी ध्यान लगाना जैसे माइंट का रीसेट बटन दबाना है.

यूसीएलए ब्रेन मैपिंग सेंटर में कुर्थ ने सहयोगियों के साथ लंबे समय से ध्यान के दिमाग पर असर के बारे में अध्ययन किए हैं.

वो कहते हैं, "ध्यान करने पर छह से आठ सप्ताह के अंदर दिमाग पर असर दिखाई देने लगता है."

हाल के एक अध्ययन के मुताबिक ध्यान के अभ्यास से दिमाग में उम्र से होने वाले नुकसान, ग्रे मैटर के घटने की गति कम हो जाती है. ग्रे मैटर याददाश्त संबंधी गतिविधियों में अहम भूमिका निभाता है.

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वैज्ञानिकों ने सालों तक ध्यान करने वाले 50 लोगों और ऐसा नहीं करने वाले 50 लोगों का अध्ययन किया है. इसमें पाया गया कि ध्यान करने वाले लोगों में ग्रे मैटर का नुकसान धीमी रफ़्तार से होता है.

कुर्थ कहते हैं, "लोगों का मानना है कि ध्यान करते वक्त उन्हें अच्छा महसूस होता है. वैज्ञानिक अध्ययन और शोध के आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं."

बढ़ती लोकप्रियता

हालांकि ध्यान करने पर काम करने पर क्या असर होता है, इसे पूरी तरह से समझने के लिए विस्तृत अध्ययन की जरूरत है. इसके भी सबूत मिले हैं कि कुछ पलों तक कुछ भी नहीं करने और दिमाग को खाली रखने पर दिमाग की सेहत सुधरती है.

कुर्थ कहते हैं, "यह अचरज में डालने वाला है, लेकिन ऐसा है और ये शानदार है."

रोजमर्रा की भागदौड़ के बीच ध्यान से लाभ मिलता नजर आता है. ऐसे में योग की क्लास हो या फिर कामकाजी भागदौड़ करते हुए ऐप का इस्तेमाल हो, ध्यान तरोताज़ा रहने का अहम तरीका है.

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पुड्डीकोम्ब कहते हैं, "मुझे आज भी 10 साल पहले की बात याद है जब मैं मॉनेस्ट्री से निकला था और लोगों को अध्यात्म और ध्यान के बारे में बताता था तो ज्यादातर लोग मेरे ऊपर हंसते थे. लेकिन अब वे इसे गंभीरता से लेते हैं."

पुड्डीकोम्ब कहते हैं, "लंबे समय से हम शरीर को महत्व देते आए हैं. लेकिन अब विज्ञान भी ये मान रहा है कि शरीर के साथ दिमाग की देखरेख भी उतनी ही महत्वपूर्ण है."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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